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प्रकृति की छाया में जीवन संरचना

पुस्तक समीक्षा

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हरियाणवी काव्य-संग्रह ‘कुदरत के रंग’ कवि रिसाल जांगड़ा की काव्य-यात्रा का एक उत्‌कृष्ट आयाम है। इस विशिष्ट संग्रह में अपना प्रौढ़ अनुभवी-आगार लेकर हाजिर हुए हैं, जिसके जरिये इन्होंने प्रकृति-कृत संपदा एवं जीव-जगत से जुड़ी विविध चीजों को शताधिक छोटी-छोटी कविताओं के रूप में पेश किया है।

इन रचनाओं में कवि ने जहां आज की विसंगतियों पर चोट करके विषमताओं पर रोष व्यक्त किया है, वहीं प्रकृति की सौगातों के गीत गाकर हमें आशाओं, स्वप्नों और जिज्ञासाओं का हरित प्रदेश भी दिखाया है। कुदरत के रंग कविता देखिये, जिसमें प्रकृति अपने जीवंत रूप में प्रस्तुत हुई है—‘मान्नूं सूं सपरा/ मैं देख-देख/ एक तै एक/ नया रूप कुदरत का/ लिकड्दा-छिपदा सूरज/ घटदा-बधदा चांद/ टिमटिमान्दे तारे नछत्तर/ पहाड़-नदी-समंदर/ हांसदे फूल/ हरे-भरे सजीले खेत।’

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पक्षियों की ज्यादातर नस्लें पेड़ों पर पलती हैं और उन्हीं के फल खाकर जिन्दा रहती हैं। मिसाल के तौर पर रूख पै संसार कविता देखें—‘घाल्ले सैं आलहणे/ रूख पै पंच्छी/ फुदकदे फिरैं सैं/ इसकी लचकदी डाहलियां पै/ भरै सैं पेट / पेड के फलां सेत्ती/ पाले सैं अपणे/ नान्हें नान्हें बच्चयां नै। चहक दे होए/ पत्त्यों के बीच/ अर फंणगियां के ऊप्पर।’

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वृक्षों के हम पर अनगिनत अहसान हैं। वृक्ष धरती की विषैली गैसों का अवशोषण करके जीवनदायिनी गैसों का उत्सर्जन करते हैं। क्रूरता से काटे जाने पर भी पेड़ हमें अपनी छाया से दूर नहीं करते। किंतु हम वनों समेत पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, और आकाश को मटियामेट करने पर तुले हैं। परदूसण नामक कविता में आज के कुहासे भरे आसमान को साफ देखा जा सकता है—‘सुआरथी माणस/ माड़े लच्छणां के कारण/ ज्हैरी होग्ये सैं/ पाणी, बाल, मांट्टी/ भरग्या धुंम्मां खाखल/ चारूं पास्सै/ परयाबरन महं/ फैलग्ये सैं दुनियां भर के रोग/ परदूसण तैं/ सांस्सां का पंच्छी ना रह्या उडण के जोग।’

मां और बच्चों समेत धरा से जुड़ी कविताएं भी रोचक हैं। फूलों, हवाओं, बादलों, पर्वतों और चांद-तारों से सम्बंधित कविताएं इस बात का प्रमाण हैं कि कवि की सोच और सरोकार बहुत बड़े हैं। ‘सोरण के खंडके’ कविता में प्रकृति नटी की सुन्दर अभिव्यक्ति हमें आकृष्ट किये बिना नहीं रहती—‘लाग्गै सैं/ गजब के सोहणे/ दूर लग/ फैल्ले होए/ सिरसम के खेत/ जनों खिंडा राक्ख्या हो/ खेत्ता महं गुलाल/ पीले रंग का/ अर पेड्‌डाँ नै/ ओढ राक्खे हों/ आपणे सिरां पै/ सोरण के खंडके।’ भाव और भाषा की दृष्टि से निश्चय ही पुस्तक पठनीय है।

पुस्तक : कुदरत के रंग (हरियाणवी काव्य संग्रह) लेखक : रिसाल जांगड़ा प्रकाशक : कुरुक्षेत्र प्रेस, कुरुक्षेत्र पृष्ठ : 132 मूल्य : रु. 200.

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