‘अच्छा मैं चलती हूं। साधना गुलमोहर की छांव सीढ़ियों से जुड़ी यादें, किताबें और दोस्तों की स्मृतियों को लिए आगे बढ़ गई। साधना ने लंबे-लंबे कदम बढ़ाए और यूनिवर्सिटी से बाहर निकल गई। उसने महसूस किया कि एक जोड़ी आंखें उसकी पीठ से चिपक चुकी है। अखिल उसे जाता हुआ देख रहा था। साधना ने गहरी सांस ली और टेंपो वाले को हाथ दिखाकर रोक लिया। टेम्पो के हर झटके के साथ वह अपने अतीत से वर्तमान में लौट रही थी। जहां इसका बेटा, उसका परिवार उसकी दुनिया उसका इंतजार कर रही थी।
‘नकुल देख-देख मेरी यूनिवर्सिटी…’—साधना ने यूनिवर्सिटी के सामने से गुजरती अपनी कार के शीशे को नीचे उतारते हुए कहा—
‘वह देख रहा है न गेट नंबर दो के सामने वाला डिपार्टमेंट, इसी डिपार्टमेंट में मैं पढ़ा करती थी।’
इन बीते सालों में यह बात वह न जाने कितनी बार नकुल को बता चुकी थी। नकुल ने चिढ़कर कहा था।
‘मां। कितने सालों से सुन रहा हूं, अब तो मुझे याद भी हो गया है। नीता मौसी, रजनी मौसी, अमित अंकल आप सब साथ पढ़ते थे और आप यहां बैठकर घंटों उनसे बातें किया करती थीं। छीह आपको गंदा नहीं लगता था, इन गंदी सीढ़ियों पर बैठना!’
नकुल बदस्तूर बोलता जा रहा था पर साधना किसी और दुनिया में थी। यूनिवर्सिटी के सामने से गुजरते हुए उसकी आंखें उन सीढ़ियों पर रुक गईं। वह सिर्फ़ सीढ़ियां कहां थीं, यादों का पूरा पुलिंदा थीं। उन सीढ़ियों को देख यादों का पुलिंदा झरझरा कर गिर गया था। आखिर कैसे भूल सकती थी उन सीढ़ियों को…, उन सीढ़ियों से उसकी न जाने कितनी ही यादें जुड़ी हुई थीं। उन सीढ़ियों के किस्से और वह हंसी के ठहाके आज भी उसके कानों में गूंजते थे। वो उम्र ही कुछ ऐसी थी। जिंदगी की कोई फिक्र नहीं, बस दोस्तों का साथ पढ़ना-लिखना और और मौज मस्ती।
‘भैया जरा गाड़ी रोकिएगा।’
‘क्या हुआ साधना, तू ठीक तो है न! तुझे पेट्रोल की महक आज भी सूट नहीं करती है न। गाड़ी रोकूं क्या, उलटी आ रही?’
बगल में गाड़ी ड्राइव करते बड़े भाई आकाश ने चिंतित स्वर में कहा। एक साथ इतने सारे सवाल सुनकर साधना मुस्कुरा पड़ी। छोटी बहन कितनी भी बड़ी हो जाए बड़े भाई के लिए वह ताउम्र छोटी ही रहती है।
‘मैं ठीक हूं भैया, स्टेशन से घर तक पहुंचने में दिक्कत नहीं होती पर लंबे सफर में सिर घूमने लगता और जी मचलाने लगता है।’
भैया ने राहत की सांस ली पर एक बार फिर उनकी आंखों में सवाल उग आए।
‘तुमने गाड़ी रोकने को क्यों कहा?’
‘आप नकुल को लेकर घर पहुंचिए मैं थोड़ी देर में आती हूं।’
‘पर तू जा कहां रही है?’
‘भैया हर बार सोचती हूं यूनिवर्सिटी जाऊंगी पर हमेशा गर्मियों की छुट्टियों में ही आना हुआ। गर्मी की वजह से घर से निकलने का मन नहीं करता। इस बार आई हूं तो सोच रही हूं हो ही आऊं। घर पहुंचकर मां कहीं जाने नहीं देती, मां से कहिएगा खाना खा लेंगी मुझे थोड़ा वक्त लगेगा।’
‘पर तू वापस कैसे आएगी?’
भैया के स्वर में चिंता थी।
‘जैसे पहले यूनिवर्सिटी से आती थी। टेंपो जिंदाबाद…।’
नकुल आश्चर्य से साधना को देख रहा था। अपनी मां का यह रूप उसने पहली बार देखा था। साधना ससुराल में अपनी कार या पति के स्कूटर पर ही निकलती। टेंपों या रिक्शे पर चलने का मौका ही नहीं मिलता। वैसे भी साधना के पति निखिल को उसका टेंपो या रिक्शे पर चलना पसंद नहीं था। छोटा-सा शहर हर आदमी पहचानता था।
‘निखिल, भाभी जी बाज़ार में दिखी, मार्केटिंग करने गईं थी शायद…।’
छोटे शहर के जितने फायदे थे उतने ही घाटे भी… आप की एक छींक सारे मोहल्ले को पता चल जाती थी।
‘साधना कहां जाना है, मैं छोड़ देता हूं।’
आकाश भैया कहते पर वह मायके आकर टेंपो-रिक्शे जैसी चीज़ों से अपना अतीत जोड़ लेती अपना सुकून ढूंढ़ लेती। शादी के पहले वह जिन सड़कों पर पैदल, रिक्शे या टेंपो से चलती थी आज उनकी सूरतें बदल चुकी थीं। एक मंजिल वाले मकान सिर ताने दो-तीन मंजिलों में तबदील हो चुके थे। खाली पड़े प्लॉटों पर दुकानें खुल चुकी थीं। वह शादी के बाद जब भी टेंपो या रिक्शे से चलती उस अतीत से अपने आप को जोड़ती चलती। कितनी बातें, कितनी कहानियां और न जाने कितने किस्से थे उन रास्तों से जुड़े हुए।
‘बाय मां, जल्दी आना।’
नकुल का हिलता हुआ हाथ उसने काफ़ी दूर तक महसूस किया था। वह यूनिवर्सिटी की तरफ मुड़ी एक अर्धचन्द्राकार बोर्ड पर विश्वविद्यालय का नाम चमक रहा था। उसने अपने पर्स को खोला, चश्मा लगाया और शिफॉन का दुपट्टा अपने सिर पर रख लिया। अचानक यादों का झोंका उसके तन के साथ मन को भी सहला गया। यूनिवर्सिटी के कैंपस में एक डिपार्टमेंट से दूसरे डिपार्टमेंट तक पहुंचने में हालत खराब हो जाती थी। ऊपर से सूरज भगवान विद्यार्थियों के धैर्य की परीक्षा लेने से बाज नहीं आते थे। तब यही चश्मा और दुपट्टा उसका साथी बनता था।
गुलमोहर का पेड़ मानो आज भी उसका इंतजार कर रहा था। यूनिवर्सिटी में कदम रखते ही एक हल्की-सी हवा चली और गुलमोहर के लाल फूल उसके सिर को छूते हुए पैरों पर आकर गिर गए। एक नटखट गुलमोहर का फूल उसके कंधों पर आकर रुक गया। जैसे पूछ रहा हो, ‘कहां थी तुम…’ उसने मुस्कुराकर फूल को देखा और हौले से उठा लिया।
उसने सुर्ख गुलमोहर के फूल को अपनी उंगलियों में फंसाकर गोल-गोल घुमाया। गुलमोहर के फूलों के बीच की डंडियां दंभ से सिर ताने खड़ी थीं। गुलमोहर के साथ उसका बीता हुआ कल उसके सामने खड़ा था। दुपट्टे को हवा में फैला कर वह गुलमोहर के फूल इकट्ठा करती और अपने दोस्त के साथ खाली पीरियड में खेल खेलती थी। गुलमोहर की दंभ से खड़ी हुई डंडियों को आपस में टकराने की एक अजीब-सी प्रतिस्पर्धा होती। डंडी के मुकुट के टूट जाने पर प्वाइंट्स होते। इतनी सरल थी उसकी जिंदगी… छोटी-सी चीज में भी वह खुशियां ढूंढ़ लेती थी।
इसी गुलमोहर के पेड़ के नीचे उसकी अखिल से मुलाकात हुई थी। अखिल उसके अतीत का एक ऐसा हिस्सा था जिसे वह पढ़ना चाहती थी पर… उसे आज भी वह दिन याद है यूनिवर्सिटी का वह पहला दिन था।
‘एक्सक्यूज मी! हिस्ट्री डिपार्टमेंट किधर है?’
विद्यार्थियों का एक झुंड क्लास खत्म होने के बाद गुलमोहर के पेड़ के पास ही मिल गया था।
‘हिस्ट्री डिपार्टमेंट! …न्यू एडमिशन?’
लंबा कद, बड़ी-बड़ी आंखें कुल मिलाकर एक ऐसा व्यक्तित्व, जो किसी को भी सहज रूप में आकर्षित कर सकता था। अखिल से उसकी यह पहली मुलाकात थी।
‘जी।…’ साधना ने सकुचाते हुए कहा था।
‘वो सामने हैंड पाइप देख रही हो ना बस नाक की सीध में चली जाओ। किसी से पूछने की जरूरत नहीं है, बस वहीं से दाहिने तरफ मुड़ जाना।’
‘ओके… थैंक यू सो मच।’ साधना बस मुड़ी ही थी।
‘किसी से पूछने की जरूरत नहीं है।’
उस लंबे कद वाले लड़के ने जोर देकर कहा, उसने सिर झुकाया और उस अजनबी के आदेश का पालन किया। वह नाक की सीध में चलती चली गई और दाहिने तरफ जैसे ही मुड़ी सूखे पत्तियों का बड़ा-सा ढेर उसका स्वागत करता मिला।
‘हा-हा, हा-हा…।’
हंसी का मानो फव्वारा छूट गया, उसने पलट कर देखा विद्यार्थियों का वही झुंड उसे देख ठठ्ठा मारकर हंस रहा था जिस लड़के ने उसे रास्ता बताया था वह अजनबी उसे देखकर मुस्कुरा रहा था। उसकी आंखों में एक शरारत थी। वह अपने साथियों के साथ आराम से टहलते हुए उसके पास आया।
‘न्यू एडमिशन होना, सीनियर को सैल्यूट करो।’
उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया और आंखें भीग गई।
‘मैडम इस रैगिंग कहते हैं, आदत डाल लीजिए।’
अखिल ने बेफिक्र होकर कहा था। कॉलेज का पहला दिन कुछ इस तरह से बीता जिसे जीवन भर वह भूल नहीं पाई थी। उस वक्त तो उसे अखिल पर बहुत गुस्सा आया था पर आज सोचती है तो चेहरे पर एक मुस्कुराहट आ जाती है।
साधना ने सिर ऊपर उठाकर देखा। गुलमोहर की पंखुड़ियां उसके माथे पर बिखर रही थीं। साधना का मन वापस उन दिनों में लौट आया था। विश्वविद्यालय उसकी पूरी दुनिया हुआ करती थी। क्लास, किताबें कैफेटेरिया …और दोस्तों की मंडली। हर सुबह उत्साह से भरी होती और शाम स्मृतियों को समेटे खत्म होती। लाइब्रेरी में पढ़ाई से ज्यादा इस बात पर बहस होती कि कौन-सी किताब अच्छी है, किस किताब का कवर अच्छा है। कौन-सी डेस्क पर जोड़ा बैठा है, किसने किसे चुपके से प्रेम-पत्र थमाया…। आज सोचती है तो हंसी आती है पर शायद वह उम्र ही ऐसी थी। अखिल के साथ वह मुलाकात वह कभी नहीं भूल सकती थी। अखिल की गहरी आंखें अक्सर उससे बातें करतीं। जब भी उसकी नज़र टकराती, वह अपनी नज़रें घुमा लेती थीं। पता नहीं क्यों यह एक ऐसा राज था जो जीवनभर राज ही बना रहा।
साधना अखिल से कटी-कटी रहती। कहते हैं ना ‘फर्स्ट इंप्रेशन इस द लास्ट इंप्रेशन…’ उसका पहला इंप्रेशन ही अखिल के प्रति अच्छा नहीं रहा था पर अखिल हमेशा ही उसके लिए एक बेहतर सीनियर रहा। आज भी उसे वह दिन याद है। यूनिवर्सिटी में कल्चरल प्रोग्राम होने वाले थे। क्लास के कई बच्चे भाग ले रहे थे। वह उन्हें रिहर्सल करता देख रही थी।
‘यहां क्यों बैठी हो, तुमने पार्ट नहीं लिया!’
अखिल ने उसकी तरफ सवाल उछाला
‘मुझे नहीं लेना…।’
साधना ने मुंह बनाते हुए कहा था।
‘क्यों तुम क्या अजूबा हो?’
‘मैं क्या करूंगी।’
‘क्यों! बाकी सब पागल है। कुछ तो आता होगा तुम्हें…, नाचना-गाना, ताली तो बजा सकती हो।’
अखिल ने इस अंदाज में कहा साधना एक बार फिर चिढ़ गई थी।
‘ऊपर वाले ने तुम्हें कोरा ही भेज दिया क्या?’
साधना तिलमिला कर रह गई। वह अपनी जगह से उठी और सांस्कृतिक कार्यक्रम के हेड आशु की तरफ बढ़ गई।
‘आशु, मेरा नाम भी लिख लो।’
‘तुम! तुम क्या करोगी?’
मैं गाना गाऊंगी।’
‘तुम और गाना…।’
‘हां, इंटर स्कूल कॉम्पीटिशन में मुझे गाने के लिए फर्स्ट प्राइज मिला था।’
‘ओहो तो हमारे बीच तानसेन भी हैं।’
अखिल ने फिर एक जुमला कसा। साधना ने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया। कहने को तो उसने कह दिया पर स्कूल की बात कुछ और होती है, लड़कियों का स्कूल… पर यूनिवर्सिटी में तो लड़के भी होंगे। यह सोचकर उसके हाथ-पैर कांपने लगे, दिल जोरों से धड़कने लगा।
दर्शकों की भीड़ में अखिल पर जब उसकी नज़र गई तो उसका डर न जाने क्यों गायब हो गया शायद उसकी आंखों में ऐसा कुछ था या खुद को साबित करने की स्थिति इंसान के डर को दूर कर देती है। उसके गाने को सुन तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल बहुत देर तक गूंजता रहा।
साधना बहुत खुश थी क्योंकि उसने अखिल को गलत साबित किया था पर एक दिन शोभा ने कहा था।
‘साधना! तुम्हें नहीं लगता अखिल तुम्हें पसंद करता है।’
‘मुझे! वो भी अखिल…, तुम्हारी आंखें खराब हैं।’
साधना ने चिढ़कर कहा था। शोभा यहीं नहीं रुकी।
‘कभी-कभी मुझे लगता है शायद तुम भी उसे पसंद करती हो।’
‘मेरा दिमाग खराब है। अखिल जैसे लड़के को मैं पसंद करूंगी, दुनिया का आखिरी लड़का भी होगा तो भी मैं उसे पसंद न करूं।’
साधना ने बड़ी अदा से कहा था पर आज सोचती है तो लगता है शायद शोभा ठीक कहती थी। अखिल हमेशा उसके आस-पास रहने के बहाने ढूंढ़ता था। कभी नोट्स, तो कभी कल्चरल प्रोग्राम के लिए उसे भाग लेने के लिए उकसाता। कितनी बार टीचर से कहकर उसने साधना का नाम लिखवाया था। शायद वह अपने प्रेम को आगे बढ़ते देखना चाहता था पर शायद वही उसके प्रेम को समझ नहीं पाई थी।
दिन पंख लगाए उड़े जा रहे थे। वैसे भी वक्त कभी किसी के लिए रुका है। परीक्षाएं हुई रिजल्ट आए और सब बिखरते चले गए। सहेलियों की शादी होने लगी और दोस्त नौकरियों के लिए देश के अन्य भागों में चले गए। अखिल से वह आखिरी मुलाकात आज भी याद है।
‘साधना! जिंदगी चाहे जहां भी ले जाए पर याद रखना की गुलमोहर का पेड़ हमारे बीच हमेशा खड़ा रहेगा। उस दिन उसने महसूस किया था कि उसकी आंखें बहुत कुछ कहना चाहती हैं जिसे साधना उस दिन भी नहीं पढ़ पाई थी पर आज इतने वर्षों बाद गुलमोहर का पेड़ विश्वविद्यालय की सीढ़ियां और अखिल की वह मुस्कुराहट मन के किसी कोने में अब भी जस की तस खड़ी थी।
आज इतने बरस बाद जब साधना इस पेड़ के नीचे खड़ी थी तो उसे लगा मानो समय ने कोई गोल चक्कर काट लिया हो। गुलमोहर की पंखुड़ियां आज भी उसी तरह जमीन पर बिखरी हुई थीं। बस उसके अपने जीवन के फूल कहीं और खिल चुके थे। तभी…...
‘एक्सक्यूज मी! हिस्ट्री डिपार्टमेंट किधर है?’
किसी पुरुष की आवाज सुनकर वह पीछे की ओर मुड़ी। सामने उसका अतीत खड़ा था, उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसने अनजान बनते हुए कहा—
‘बस नाक की सीध में चले जाइए और दाहिने मुड़ जाइएगा।’
‘हा-हा, हा-हा…।’
उसकी हंसी अखिल की हंसी के साथ शामिल हो गई।
‘तुम और यहां…?’
‘मैडम! मेरी यहीं पर नौकरी लग गई है और तुम बताओ?’
‘मायके आई हुई थी।’
साधना अखिल को देख बहुत खुश थी, उसकी खुशी चेहरे से टपक रही थी।
‘और घर में सब कैसे हैं?’
‘पापा-मम्मी रहे नहीं, अकेला ही रहता हूं।’
अखिल की आवाज में एक उदासी थी।
‘और तुम्हारी पत्नी और बच्चे…?’
‘मैंने शादी नहीं की।’
‘क्यों?’ साधना से आश्चर्य से कहा
‘जिससे करना चाहता था वह मेरे प्रेम को कभी समझ ही नहीं पाई।’
अखिल ने मुस्कुरा कर कहा। साधना उसे देखते ही रह गई। गुलमोहर उसके प्रेम का साक्षी था। उसका अतीत उसे जी-भर कर देख लेना चाहता था पर वह अपने वर्तमान के साथ आगे बढ़ चुकी थी।
गुलमोहर की परछाइयां लंबी होकर जमीन पर बिछ गई थीं। अतीत धीरे-धीरे उसकी पकड़ से फिसल रहा हो उसे याद आया कभी यही रास्ता दौड़ते हुए तय किया था तो कभी दोस्तों के साथ हंसते-खिलखिलाते गुजरा था। आज वही रास्ता सूना और चुपचाप था। वह बहुत देर तक विश्वविद्यालय की सीढ़ियों और इमारत को देखती रही। कितना कुछ था जो यहीं रह गया था और दफन भी हो गया था। शायद भावनाएं और स्मृतियां भी…।
तभी फोन की घंटी बजी।
‘कहां हो साधना?’
‘आ रही हूं मां, बस थोड़ी देर और…...’
उसने अखिल की ओर देखा।
‘अच्छा मैं चलती हूं। साधना गुलमोहर की छांव सीढ़ियों से जुड़ी यादें, किताबें और दोस्तों की स्मृतियों को लिए आगे बढ़ गई। साधना ने लंबे-लंबे कदम बढ़ाए और यूनिवर्सिटी से बाहर निकल गई। उसने महसूस किया कि एक जोड़ी आंखें उसकी पीठ से चिपक चुकी है। अखिल उसे जाता हुआ देख रहा था। साधना ने गहरी सांस ली और टेंपो वाले को हाथ दिखाकर रोक लिया।
टेम्पो के हर झटके के साथ वह अपने अतीत से वर्तमान में लौट रही थी। जहां इसका बेटा, उसका परिवार उसकी दुनिया उसका इंतजार कर रही थी।
नकुल दरवाजे पर ही मिल गया।
‘मां कहां रह गई थी?’
उसने उसके गालों को थपथपाया और घर के अंदर प्रवेश कर गई।
‘कहां रह गई थी। हम कब से तेरा इंतजार कर रही थे!’
मां की आवाज़ में एक चिंता थी।
‘मां! अगली बार मैं भी आपके साथ आपके कॉलेज चलूंगा।’
‘जरूर ले चलूंगी नकुल ताकि तुझे समझ सकूं जिंदगी सिर्फ किताबों में या डिग्री में नहीं होती बल्कि उन पलों में भी होती है जो दिलों को छू जाए। वहीं हमारी कहानी बन जाते हैं।’
साधना की बड़ी-बड़ी बातें नकुल के पल्ले नहीं पड़ रही थी। साधना अपने कमरे में आ गई। उसकी आंखों में नमी थी पर चेहरे पर शांति पसरी हुई थी। खिड़की से बाहर देखते हुए उसे यूनिवर्सिटी के गुलमोहर के पेड़ के साथ अखिल की छवि याद आ गई। कहीं दूर जाने की आवाज आ रही थी, ‘जिंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है…...’

