किताबें आ रहीं,
किताबें आ रहीं
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आलस से कुंद
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पड़े जेहन
सर्द मौसम और
जर्द पड़े चेहरों को
दमकाने
किताबें आ रहीं।
शिकवे-शिकायतों
के ग़िलों
मिटाने को
किताबें आ रहीं।
ख़्वाबों, ख्यालों को
अपनी सोहबत से
सहलाने, दुलारने,
पुचकारने को
मां सी
किताबें आ रहीं।
ज़िंदगी में एक और
नए साल का पुख्ता
और पुरजोर आग़ाज़
करने को,
ज्ञान और अनुभव
की जुगलबंदी में,
मेले के रेले की रौ में
समंदर की मौजों सी
मलय समीर सी
इल्म की झीनी भीनी सी
फुहार में
सराबोर करने
किताबें आ रहीं।
पाक साफ-सी
इंसा को ‘उसकी रज़ा’
का पैगाम देने को
किताबी बयार आ रहीं।
सियासत को भी अपने
रथ पर बिठा,
सलाहियत,
आपसी अख़लाक़ की
रूहानी मसर्रत
देने को तुम्हारी और हमारी
किताबें आ रहीं।
आज के आत्मनिर्भर
भारत और उसके
नए नए मुकाम को
बताने, जताने, समझाने
को सुनो, सुनो,
खूब सारी, ढेर सारी
किताबें आ रहीं।
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