चार विधाओं के संगम का अभिनव प्रयोग : The Dainik Tribune

पुस्तक समीक्षा

चार विधाओं के संगम का अभिनव प्रयोग

चार विधाओं के संगम का अभिनव प्रयोग

योगेन्द्र नाथ शर्मा ‘अरुण’

बहुमुखी विधाओं के रचनाकार अमृतलाल मदान की पुस्तक ‘विधा विविधा’ हिन्दी साहित्य की ‘चार विधाओं’ में रचित उनकी रचनाओं का संचयन है। मदान ने इस संचयन में आठ नाटक, चौबीस कविताएं, सोलह लघुकथाएं और सत्ताईस पत्र संकलित किए हैं, जो हिन्दी-साहित्य में सर्वथा नया और विलक्षण प्रयोग कहा जा सकता है।

‘अपनी बात’ में मदान ने कहा भी है, ‘साहित्य जहां जीवन के विविध यथार्थ की उपयुक्त शब्दों द्वारा अभिव्यक्ति है, वहां विविध यथार्थ के साथ विधागत प्रयोग भी है कि अभिव्यक्ति में निहितार्थ को किस परिप्रेक्ष्य में देखा, ढाला अथवा अनुभूत किया जाए। अपनी सृजनधर्मितावश प्रस्तुत इस संग्रह में मैंने कुछ नये प्रयोग और रूढ़िगत विधाओं में छेड़छाड़ करने का दु:साहस किया है।’

रचनाकार मदान का यह ‘दुःसाहस’ पाठकों को सुखद और रुचिकर लगेगा, ऐसा विश्वास मुझे हुआ है, जब मैंने ‘नाटक-खण्ड’ में उनके ‘जननी’ भाव-नाट्य को पढ़ा है। हिन्दी और दूसरी भाषाओं में भी ‘मां’ को केंद्र में रखकर खूब लिखा गया है, लेकिन अमृतलाल मदान का ‘काव्य स्वर नाटक’ के रूप में रचा गया ‘जननी’ भाव- नाट्य पाठक को भीतर तक कुरेदता है। कवि मदान लिखते हैं :-

‘मेरे डी.एन.ए. के सब नमूने/ फेल हो गये यह बताने में/ कैसी थी मेरी मां, मेरी जननी/ मां का चित्र भी तो नहीं खींचा/ किसी ने पुरुष वर्चस्व के उस ज़माने में।

नाट्य-विधा के इस सर्वथा नए प्रयोग में पाठकों को कोई भाषण न देकर भी रचनाकार अमृत-संदेश देता है :-

‘मिल गई मां/ हां, मिल गई मां/ सर्वव्याप्त इस जगती में/ मां, तुम मेरे पास ही हो पल पल/ धूप, हवा, नभ, जल, धरती में।’

निःसंदेह, साहित्य-सृजन में विधागत प्रयोग की दृष्टि से रचे गए ‘काव्य नाटक’, ‘बाल नाटक’ और ‘नुक्कड़ नाटक’ आदि में श्री मदान ने विलक्षण और सार्थक प्रयोग किए हैं, जो पाठकों को बांधने में सक्षम अवश्य होंगे।

‘काव्य खण्ड’ में कुल चौबीस कविताओं में कवि अमृतलाल मदान का चिंतन भी पाठकों को आकर्षित करने में सक्षम है। ‘काबुली वाली’ कविता बच्चों को प्यारी लगेगी, ‘सपने’ शीर्षक से पांच कविताएं जीवन के इंद्रधनुषी अनुभवों को उकेरती हैं।

‘लघुकथा-खण्ड’ की सलाह रचनाएं भी पाठकों को बांधने में पूर्णतः सक्षम सिद्ध होंगी, यह मुझे आशा है। ‘कोविड बनाम क्यूपिड’ आज के दिखावटी संबंधों पर ऐसा करारा तमाचा है कि पाठक इसकी चोट को भूल नहीं पाएंगे। पुस्तक के अंतिम ‘पत्र-खण्ड’ में लेखक द्वारा विदेश-प्रवास के दौरान अपने पिता को लिखे गए पत्रों का संकलन किया गया है, जो संस्कारों के मिटते इस नए युग में सर्वथा नवीन प्रयोगों का परिचय पाठकों से कराते हैं।

पुस्तक : विधा विविधा लेखक : अमृतलाल मदान प्रकाशक : साहित्यभूमि, उत्तम नगर, नयी दिल्ली पृष्ठ : 160 मूल्य : रु. 595.

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