पारंपरिक रूप में कविता अपने काव्यात्मक और रागात्मक उद्वेलन के लिए प्रिय रही है, परंतु वैचारिक तत्व भी सदा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से विद्यमान रहता है। लेखक अमृतलाल मदान की नवप्रकाशित लंबी कविता ‘मैं समय का अमर पंछी-दो’ सृजन की एक अनूठी रचना है, जो भावनात्मकता के स्तर पर तो झकझोरती ही है, परंतु दार्शनिकता की दृष्टि से भी जयशंकर प्रसाद की कामायनी का आस्वाद स्मरण करवा देती है।
मिथकीय फीनिक्स पंछी के बिंब को लेकर बुनी गई इस कविता में ब्रह्मांड की समस्याओं की व्यापक झलक मिलती है। दिग्भ्रमित मनुष्य विकास की दौड़ में सारी सृष्टि को उलट-पुलट कर देने पर तुला हुआ है। युद्ध की विभीषिका सब ओर छाई हुई है। एक होड़ विभिन्न देशों को असंतुलित कर मानव जाति के विनाश का मार्ग प्रशस्त कर रही है। मदांध मनुष्य केवल स्वार्थ से प्रेरित होकर वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को धता जता कभी यूक्रेन को ध्वस्त कर देना चाहता है और कभी फलस्तीन का नामोनिशान मिटाने को आतुर है। ऐसा लगता है कि इंसान को शांति चुभने लगी है। वह सब कुछ हड़प जाना चाहता है।
कवि अमर पक्षी के प्रतीक को जीवन्त करता हुआ अपनी लंबी कविता में समकालीन समस्याओं को गंभीरता से महसूस करता हुआ बेबाक टिप्पणी करता चलता है। कवि की विशेषता यह है कि उसकी दृष्टि से समकालीन विश्व समाज की कोई भी विसंगति छूटती नहीं। वह शांति का उद्घाटक है, फिर भी महसूस करता है कि इंसान भ्रमित हो गया है। वह कभी अंतरिक्ष की ओर भागता है और कभी पाताल में कुछ नया खोजता है। फीनिक्स का प्रतीक यहां कवि के लिए भी सटीक बैठता है। अमर पक्षी अपनी राख में से पुनः जीवित हो उठता है और कवि का भी मृत्यु के बाद पुनर्जन्म होता है। वह अपनी रचनाओं में पुनः जी उठता है।
एक दृष्टि से देखें तो मदान साहब की लंबी कविता वर्तमान समय का शोकगीत भी है, जो बहुत ही प्रभावित बन पाई है। मन होता है कि कविता को बार-बार पढ़ा जाए क्योंकि यह लंबी कविता मानव मन के फफोले फोड़ती है। ऐसी कविता कभी-कभार ही लिखी जा सकती है। कवि की संतप्त आत्मा कविता में समाज की विसंगतियों को उघाड़ कर रख देती है।
कवि मानव जाति के भविष्य को बचाने के लिए भी प्रार्थना करता है—
कवि की कविता/ महादेव इक बार फिर से / नीलकंठ का दान कर दो/ वातावरण हुआ जहरीला/ फिर से आ विषपान कर लो। हे शंकर अब छोड़ हिमालय/ धरा का चिर कल्याण कर दो महादेव।
पुस्तक : मैं समय का अमर पंछी-दो लेखक : अमृत लाल मदान प्रकाशक : आधारशिला पब्लिशिंग हाउस, चंडीगढ़ पृष्ठ : 98 मूल्य : रु. 375.

