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मन से मन की बात

दोहे

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यह विकास का शाप है, या फिर यह वरदान।

मोबाइल ने छीन ली, चिट्ठी की पहचान॥

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वृद्ध पिता को डस रही, रात अंधेरी स्याह।

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महंगाई में किस तरह, हो बेटी का ब्याह॥

कैसे जीवन मूल्य का, बचा रहे अस्तित्व।

कदम-कदम पर हों सफल, जब दुहरे व्यक्तित्व॥

आशा के अनुरूप हो, आपस का व्यवहार।

फिर हर दिन परिवार में, बना रहेगा प्यार॥

शब्द रहित कुछ यूं हुई, मन से मन की बात।

भीतर भीषण बाढ़ थी, आंखों में बरसात॥

जहां नहीं होती कलह, सुबह-शाम, दिन-रात।

उस घर में होती सदा, खुशियों की बरसात॥

बिखर गये, फिर खो गये, यत्र-तत्र-सर्वत्र।

खुशियां, सुख, वो कहकहे, चलो करें एकत्र॥

तब तक ही अपनत्व की, घुलती रही मिठास।

जब तक रिश्तों में रहा, स्वार्थ रहित विश्वास॥

खिंची-खिंची-सी ज़िंदगी, नुचे-नुचे अरमान।

बिन मंज़िल की दौड़ में, दौड़ रहा इंसान॥

तभी बढ़ेगा आपसी, सम्बन्धों में प्यार।

घटे-मिटेगी जब सखे, कहन-सुनन तकरार॥

मन छोटा मत कर कभी, कभी न हिम्मत हार।

निश्चित होगा जोश से, हर सपना साकार॥

रहे हमेशा क़ैद में, बीती उम्र तमाम।

सपनों ने जी भर किया, नींदों को बदनाम॥

सच के रिश्तों को मिला, आजीवन वनवास।

आंख मूंदकर जब किया, कानों पर विश्वास॥

आये दिन यदि हो नहीं, आपस में तकरार।

मन के आंगन में कभी, उठे न फिर दीवार॥

इम्तिहान-सी ज़िन्दगी, हर दिन कठिन सवाल।

रो कर या खुश हो जिन्हें, हल करना हर हाल॥

जीवन भर उसका कभी, हो न सका अपमान।

पग-पग पर जिसने रखा, मर्यादा का मान॥

जीवन में होना नहीं, मन से कभी निराश।

मंज़िल से आगे नई, मंज़िल करो तलाश॥

छंटे निराशा का तमस, उगे नयी-सी भोर।

लक्ष्य प्राप्ति की कोशिशें, पड़ें न यदि कमज़ोर॥

बेशक पथरीली बहुत, संघर्षों की राह।

किन्तु सुगम करता उसे, भीतर का उत्साह॥

मिलती निश्चित सफलता, और नया उत्कर्ष।

जब अवसर की सीढ़ियां, चढ़ता है संघर्ष॥

चिड़िया फिर से उड़ चली, बुनियादों की ओर।

मन ने जब मन से कहा, होकर भाव-विभोर॥

पहले मन में झांक फिर, बस पल भर को सोच।

सम्बन्धों के पांव में, आयी कैसे मोच॥

चाहे हंसी-मज़ाक हो, या गम्भीर बयान।

काली-उजली सोच का, भाषा ही परिधान॥

उसका निश्चित अंत है, जिसका है आरम्भ।

पगले फिर क्यों पालता, भीतर इतना दम्भ।।

सच के रिश्तों को मिला, आजीवन वनवास।

आंख मूंदकर जब किया, कानों पर विश्वास॥

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