हिम्मत राखो! एक दिन नागरी का राज ही होगा

हिम्मत राखो! एक दिन नागरी का राज ही होगा

प्रताप नारायण मिश्र

सच है ‘परमेश्वर की परतीत यही, मिलो चाहिए ताहि मिलावत।’ जिस नागरी के लिए सहस्त्रों ऋषि वंशज छटपटा रहे हैं, उसका उद्धार न हो, कहीं ऐसा भी हो सकता है? जबकि अल्प सामर्थी मनुष्य को अपने नाम की लाज होती है तो क्या उस सर्वशक्तिमान को अपनी दीनबंधुता का पक्ष न होगा? क्यों नहीं। हमारे देशभक्तों को श्रम, साहस और विश्वास चाहिए, हम निश्चयपूर्वक कहते हैं कि यदि हमारे आर्य भाई अधीर न होंगे तो एक दिन अवश्य होगा कि भारत भर में नागरी देवी अखंड राज्य करेंगी। ...कुछ सच्चा रंग तो चढै़, दिनंतर हिंदी का प्रचार न हो तो हम जिम्मेदार। किसी प्रकार प्रयत्न से मुंह न मोड़ा जाए, अर्थात स्थान-स्थान पर सभा स्थापित हों, लोकल गवर्नमेंट से निवेदन किया जाए। यदि वहां से सूखा उत्तर मिले तो उसी निवेदन पत्र में यथोचित बातें घटा-बढ़ा के गवर्नर ज्यनेरल को भेजा जाए। वह भी निराश रक्खें तो फिर पार्लियामेंट की शरण ली जाए। न्याय, अन्याय, दुख, सुख, सब यथावत विदित किए जाएं इत्यादि-इत्यादि। इस विषय में जो कुछ धन की आवश्यकता हो, उसके लिए राजा व महाराजा, सेठ-साहूकार इत्यादि सब आर्य मात्र से सहायता ली जाए।

क्यों प्यारे पाठकगण! विचार के कहना, यदि पूर्ण रूप से ऐसा किया गया तो कोई भी सहृदय कह सकता है कि हिंदी न जारी होगी? हमारी समझ में ऐसा कोई विरला ही गया-बीता होगा जो यथा सामर्थ इस परमोत्तम कार्य में मन न लगावै। हां भाइयो! एक बार दृढ़ चित्त हो के, सेतुआ बांध कै पीछे पड़ौ तो देखै कैसा सुख और सुयश पाते हौ। देखौ कैसे शीघ्र हमारी-तुम्हारी नपुंसकता का कलंक (जो मुद्दत से लगा हुआ है) दूर होता है! देखो शुभ शकुन पहिले ही से जान पड़ने लगे कि रीवा के राज्य में नागरी प्रचलित हो गई। हम जानते हैं, अवश्य यह हमारे मान्यवर श्रीयुत पंडित हेतराम महोदय के उत्साह का फल है। तो क्या सब मित्रगण हमारी न सुनैंगे? क्या सक भर हिंदू समाज का साथ न देंगे? क्या पंडितवर हेतराम दीवान साहब का अनुसरण किंचित मात्र भी न करैंगे? कदाचित कोई महानुभाव कहैं कि हम तो सब करैं, पर किस बल से? सामर्थवानों की तो यह दशा है कि महाराज कहाते हैं, ललाई पर मरे जाते हैं, पर सवा आने महीना का ‘ब्राह्मण’ पत्र लेते सिकोड़बाजी करते हैं। क्या इन्हीं से धन की सहायता मिलैगा? हमारे पास द्रव्य ही कितना है? इसका सच्चा उत्तर यह है कि ‘सात पांच की लकड़ी एक जने का बोझ’ भी सुना है? सौ महा निर्धन भी यदि अपनी भर चंदा करते रहैं तो एक दो लखपति को पिड़ी बोलावै। दृढ़ता चाहिए फिर कोई काम होने को न रह जाएगा! ...अतएव हिम्मत रक्खो एक दिन नागरी का प्रचार ही होगा।

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