साहित्य जगत की एक पीढ़ी धीरे-धीरे हमारा साथ छोड़ती जा रही है। पहले जाने-माने कवि विनोद कुमार शुक्ल और अब वयोवृद्ध कथाकार और पहल जैसी साहित्यिक पत्रिका के संपादक रहे ज्ञानरंजन। ज्ञानरंजन अक्सर कहते थे कि बड़े कहानीकार कभी बड़े शहरों में नहीं पैदा होते, वो हमेशा छोटे शहरों में होते हैं और बड़ी सोच, दृष्टि या रचना के पुरोधा होते रहे हैं। ज्ञानरंजन खुद जबलपुर में रहे 1960 से लेकर अब तक। दरअसल, 16 अगस्त, 1960 में जब उनकी नौकरी जबलपुर के एक कॉलेज में बतौर एक लेक्चरर लगी, तब उन्हें इलाहाबाद जैसी साहित्यिक नगरी छोड़ने का बहुत अफसोस रहा, वह ट्रेन में देर तक रोये भी, लेकिन नौकरी तो नौकरी होती है।
सो इस ज़िद के साथ जबलपुर चले गए कि वहां वह अपनी नई साहित्यिक दुनिया बनाएंगे। और आप देखिए, बनाई भी। हालांकि, वहां पहले से ही जाने-माने व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई, देशबंधु समूह के संपादक और साहित्यकार मायाराम सुरजन, सेठ गोविंन्द दास, भवानी प्रसाद तिवारी और कई सारे साहित्यकार थे ही। इसलिए ज्ञानरंजन अकेले नहीं रहे। हमेशा उनकी मंडली में इन साहित्यकारों का साथ रहा। वह अक्सर कहते कि इलाहाबाद तो उनके साथ है ही, अब जबलपुर भी उनकी नई दुनिया है। वह अक्सर सेठ गोविन्द दास के घर आते-जाते रहे। वही गोविन्द दास, जिनके सौ से भी ज्यादा नाटक हैं। बाद में ज्ञानरंजन ने दिल्ली जाकर एक बड़े प्रकाशक से मिलकर गोविन्द दास का समग्र संकलन भी छपवाया।
जबलपुर में जिस दिन ज्ञानरंजन कॉलेज पढ़ाने गए तो पहले ही दिन उनके पुराने मित्र रहे परसाई जी भी एक कार्यक्रम के लिए आए थे। तो शुरू से ही उन्हें वहां अच्छा लगने लगा। दरअसल, ज्ञानरंजन के पिता गांधीवादी थे, लेखक और संपादक रहे। मूलरूप से उनका खानदान तो था बिहार के आरा का, लेकिन वे बाद में बस गए बनारस। वहां से गए महाराष्ट्र के अकोला, जहां ज्ञानरंजन 21 नवम्बर, 1936 को पैदा हुए। तीन भाइयों वाले ज्ञानरंजन बीच वाले थे, लेकिन पिता का सबसे ज्यादा असर उनपर ही रहा। पिता ने लिखना-पढ़ना सिखाया, साहित्य की समझ पैदा की, भाषा का ज्ञान दिया, लेकिन मां के इलाज के सिलसिले में पहले दिल्ली और बाद में इलाहाबाद रहे। वह आज़ादी का दौर था, आज़ादी के बाद के भयानक दंगों के दौरान ज्ञानरंजन दिल्ली के मॉडल टाउन के पास एक दलित बस्ती में रहते थे। गांधी जी के कहने पर ही वे लोग इलाहाबाद गए और वहीं ज्ञानरंजन ने विश्वविद्यालय में दाखिला लिया।
स्कूली दिनों से ही लिखने-पढ़ने लगे थे, लेकिन इलाहाबाद तो साहित्यकारों की मंडली थी। निराला, महादेवी, केदार, हरिवंश राय बच्चन सब वहीं मिले। उपेन्द्रनाथ अश्क और उनके बेटे नीलाभ के घर आना जाना हुआ। बच्चन ने तब तक उनसे धर्मयुग में एक कॉलम लिखवाना शुरू कर दिया था। कहानियां भी वह लिखने लगे थे। यानी उनके भीतर का लेखक और साहित्यकार आकार लेने लगा था। स्वभाव से अक्खड़ और किसी भी तरह से समझौता न करने वाले ज्ञानरंजन जब तक इलाहाबाद में रहे उनकी चौकड़ी खासी मशहूर रही– उनके साथ होते दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह और रवीन्द्र कालिया। रवीन्द्र कालिया उनके अच्छे मित्रों में रहे। जबलपुर भी जब ज्ञानरंजन गए तो उनके इन मित्रों का वहां लगातार आना जाना रहा और तमाम साहित्यिक आयोजन ज्ञानरंजन ने वहां किए। 60 का दशक तो उन्होंने पढ़ाने, लिखने पढ़ने और जबलपुर में एक बेहतर साहित्यिक माहौल बनाने में बिता दिया।
हालांकि, तब तक ज्ञानरंजन अपनी कहानियों से पहचाने जाने लगे थे। मध्यवर्गीय जीवन को उन्होंने जैसे जिया, महसूस किया, अपनी कहानियां में अपने पात्रों के ज़रिए उतार दिया – चाहे उनकी कहानी अमरूद हो, उनकी प्रतिनिधि कहानियों का संग्रह हो, कबाड़खाना हो, फेंस के इधर उधर हो, पिता हो या फिर घंटा। हालांकि, ज्ञानरंजन धुआंधार लेखकों में नहीं रहे। केवल 25 कहानियां ही लिखीं लेकिन हर कहानी यादगार। ज्ञानरंजन ने अनुवाद का काम भी काफी किया और कुल मिलाकर देखें तो उनकी केवल 6 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। बेशक उनके परिवारवालों के पास उनकी कूछ पूरी तो कुछ अधूरी अप्रकाशित रचनाएं हो सकती हैं जो शायद अब पढ़ने को मिले। सपना नहीं नाम के संग्रह में आप उनकी सभी कहानियां पढ़ सकते हैं।
दरअसल, वैचारिक तौर पर प्रगतिशील माने जाने वाले ज्ञानरंजन अक्सर कहते थे कि उनके भीतर कहानी कहने की कला उनकी दादी की कहानियों से ज्यादा पनपीं। उनकी दादी बेशक खालिस देसी भाषा में उन्हें कहानियां सुनाया करती थीं, जिसमें देशज शब्दों का इस्तेमाल ज्यादा होता था और स्थानीय बोलियों में कुछ अश्लील शब्द भी होते थे, बावजूद इसके उनके भीतर का साहित्यकार उसे पकड़ता गया। अगर देखें तो ज्ञानरंजन को लोग पहल के संपादक के तौर पर ज्यादा जानते थे। तमाम मुश्किलों के बावजूद उन्होंने पहल 1973 से लगातार निकाली, इमरजेंसी से पहले तक मध्य प्रदेश सरकार से मदद भी ली, लेकिन कांग्रेस विरोध और वैचारिक प्रतिबद्धता की वजह से बाद में पहल जैसी पत्रिका किसी सरकारी मदद के बगैर ही निकलती रही। पहल की खासियत यह रही कि वह बेशक प्रगतिशील विचारों की पत्रिका रही। आखिरकार 125 अंक तक पहल निकालने के बाद इसे बंद करने का फैसला लेना पड़ा।
हालांकि, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार मिलने के बाद से लगातार ज्ञानरंजन पर वामपंथी होने के आरोप भी लगे, लेकिन उनका दावा था कि वो न तो कभी प्रगतिशील लेखक संघ के साथ रहे, न जनवादी लेखक संघ के साथ और न ही जन संस्कृति मंच के साथ। बेशक उनके रिश्ते सभी से बेहद अच्छे रहे। ज्ञानरंजन दावा करते रहे कि जब तक पहल का प्रकाशन हुआ उसमें हर तरह के लेखकों, कवियों, आलोचकों को जगह मिली। वैसे पहल में छपने का सम्मान इतना था कि लेखक खुद को तब ही साहित्यकार मानता था जब उसकी कोई रचना पहल में छपे।
उत्तर प्रदेश का साहित्य भूषण सम्मान, मध्य प्रदेश का शिखर सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, शब्द सम्मान समेत कई सम्मानों से नवाज़े गए ज्ञानरंजन साहित्य जगत में सबसे ज्यादा अगर किसी की आलोचना करते थे तो वे थे राजेन्द्र यादव और नामवर सिंह। ऐसे में बदलते वक्त के बीच ज्ञानरंजन जैसे अक्खड़, निर्भीक और वामपंथी रुझानों वाले साहित्यकारों का जाना बेशक नई पीढ़ी के ऊर्जा के खत्म होने जैसा है। उन्हें सादर नमन।

