बाल कहानी

दादी का घर

दादी का घर

अर्चना त्यागी

स्कूल से घर लौटी गुन्नू आज चहक रही थी। बहुत दिनों बाद इतनी खुशी मिली थी उसे। क्योंकि स्कूल में मैडम ने बताया कि गणतंत्र दिवस पर स्कूल में कार्यक्रम होगा। ऑनलाइन-ऑफलाइन के फेर ने सब फीका-फीका जो कर रखा था। गुन्नू को मैडम ने पंजाबी डांस में लिया था। आज वह इतनी खुश थी कि घर पहुंचते ही डांस करने लगी। मम्मी ने खुशी का कारण पूछा तो 'मम्मा, इतने दिनों बाद स्कूल में प्रोग्राम होने वाला है। मुझे मैडम ने पंजाबी डांस में लिया है,' कहकर वह मम्मी से लिपट गई।

अब तो गुन्नू स्कूल से लौटते ही डांस की प्रैक्टिस में लग जाती। फिर थककर सो जाती और शाम को उठकर पढ़ाई करती। दिसंबर में स्कूल बंद होने से पहले मैडम ने आधा डांस सिखा दिया था। बाकी छुट्टियों के बाद सिखाना था। इसी बीच, लुधियाना से गुन्नू की दादी का फोन आया कि उसके दादाजी का बच्चों से मिलने का बहुत मन है इसलिए छुट्टियों में आ जाओ। दादा की तबीयत भी थोड़ी खराब थी। गुन्नू दादा से मिलने की बात पर तो खुश थी, लेकिन वह अपने डांस प्रैक्टिस की भी सोच रही थी। चाचा भी अपने बच्चों के साथ बेंगलुरू से आने वाले थे। उनके दोनों बच्चे गुन्नू से छोटे थे और बहुत शरारती भी थे। डांस प्रैक्टिस वाली बात गुन्नू ने मां के सामने रखी तो मां बोली, ' चिंता मत कर। प्रैक्टिस नहीं छूटेगी। वहां सबको पंजाबी डांस आता है। वैसे भी लोहड़ी आने वाली है।' गुन्नू को याद आ गया। पिछले साल स्कूल नहीं खुल पाए थे इसलिए लोहड़ी पर सब लोग दादी -दादा के पास ही थे। सबने नए कपड़े पहनकर खूब डांस किया था और फिर छोले-भटूरे भी खाए थे।

लुधियाना में कुछ दिन रुककर चाचा बेंगलुरू लौट गए। गुन्नू के पापा भी जयपुर चले गए। दादी ने उन्हें लोहड़ी पर आ जाने को कह दिया। अब गुन्नू ने मम्मी से पूछा, ‘मम्मा, क्या मेरी प्रैक्टिस करवा दोगे?' परमीत ने गुन्नू को समझाया, 'दादाजी की तबीयत ठीक होगी तभी हम 26 जनवरी को जयपुर में रहेंगे नहीं तो यहीं से तुम अपनी क्लास ऑनलाइन कर लेना। पापा स्कूल में बात कर लेंगे।' गुन्नू उदास होकर बाहर को निकली ही थी कि दादाजी ने बुला लिया और उसे डांस सिखाने लग गये। ताली बजाती हुई दादी भी आ गयी और बोलीं, ' गिद्दा भी सीख लो गुन्नू।' दादी ने गुन्नू की मम्मी को खींचा और साथ में डांस करने लगीं। गुन्नू का तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा, बोली, 'दादी मेरी मैडम भी इतना अच्छा डांस नहीं करती।' तभी दादाजी बोले, 'परमीत, बच्ची का प्रोग्राम कैंसिल मत करना। मैं भी अपनी पोती को स्टेज पर डांस करते देखूंगा।' तभी लोहड़ी का त्योहार आ गया। लोहड़ी पर सब तैयार हुए। गुन्नू तो एकदम परी लग रही थी। मोहल्ले के सभी लोग सज-धज कर दादाजी के घर के गार्डन में इकट्ठे हो गए। ढोल बज रहे थे। सब नाच रहे थे। वहीं पर आग जली थी। नाच-गाना खत्म हुआ तो रेवड़ी और मूंगफली सबको बांटी गई। रात को खाना खाते वक्त दादाजी ने बच्चों को बताया, 'बेटा ये जो गेहूं की रोटी है, इसी का त्योहार है लोहड़ी। खेतों में जब गेहूं के पौधे पर बालियां आ जाती हैं तब उसकी खुशी मनाने के लिए लोहड़ी का त्योहार मनाया जाता है।' हंसी-खुशी त्योहार संपन्न हो गया। सब लोग जयपुर आ गये। छब्बीस जनवरी पर गुन्नू के डांस को देखकर अतिथि महोदय ने बहुत सराहना की। दादी के लिए तालियां भी बजीं। गुन्नू ने बता जो दिया था कि दादी ने ही उसकी प्रैक्टिस करवाई थी। दादाजी तो बिल्कुल स्वस्थ हो गये।

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