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तीन पीढ़ियों के सृजन से रूबरू होना

पुस्तक समीक्षा

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‘तीन पीढ़ियां साठ कविताएं’ संकलन स्वयं में निश्चित ही एक अनूठा प्रयोग कहा जा सकता है। इसमें एक ही परिवार की तीन पीढ़ियों के चार कवियों की साठ कविताएं संकलित हैं, जिसका संपादन समर्थ वाशिष्ठ और शैलेन्द्र शैल ने किया है। इस संकलन में शामिल चार कवि हैं—खुशीराम वाशिष्ठ, शैलेन्द्र शैल, जितेन्द्र वाशिष्ठ और समर्थ वाशिष्ठ। इस काव्य संकलन की भूमिका कवि और ग़ज़लकार दिनेश दधीचि ने लिखी है, जो इन चारों कवियों की मंशा को समझने में हमारी मदद करती है। दिनेश दधीचि की मानें तो ‘तीन पीढ़ियों की यह कविता, उनकी भाषा, भावभूमि और विषयों के भिन्न होने के बावजूद संवेदना, जीवन मूल्यों और सरोकारों के स्तर पर एक दृष्टिगत होती है।’

खुशीराम वाशिष्ठ का संबंध स्वतंत्रता से पूर्व के साहित्यकारों की उस पीढ़ी से है, जिसके प्रभाव ने उनके व्यक्तित्व को आकार दिया, और यह प्रभाव उनकी कविता में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उनके पांच प्रबंध काव्य ‘बुद्धचरित’, ‘मीराबाई’, ‘गुरु नानक’, ‘गुरु गोविन्द सिंह’ और ‘रण-निमन्त्रण’ हमें उपलब्ध हैं। उन्होंने ग़ज़लें भी लिखी थीं, जिनमें गीतों जैसी ताजगी विशेष रूप से दृष्टव्य है। उनकी एक ग़ज़ल की यह पंक्तियां काबिलेगौर हैं—’हम हृदय के साथ चिपकाए फिरे/ शूल जो पथ में बिछाए उम्र ने।’

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खुशीराम वाशिष्ठ के ज्येष्ठ पुत्र शैलेन्द्र शैल पर उत्तर आधुनिकता का प्रभाव साफ़ दिखाई देता है। उनकी कविता ऐन मुहाने पर वार करती है और पाठक की चेतना में गहरा उद्वेलन पैदा करती है। इस दृष्टि से उनकी चयनित कविताओं में से ‘आम आदमी के आसपास’ कविता की यह पंक्तियां दृष्टव्य हैं— ‘बड़ा मुश्किल है/ कविता को बाहर लाना/ जैसे मुश्किल है/ दुनिया के हर बच्चे के हाथ में/ दूध की एक बोतल थमाना।’

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शैलेन्द्र की ‘मजदूर एक फंतासी’ कविता अपनी बनावट और बुनावट में एक महत्वपूर्ण कविता है, जिसमें कथन की वक्रता देखते ही बनती है— ‘मैं आटा गूंथती हूं/ तू आग ले आ/ उसने बहुत ढूंढ़ा पर आग कहीं नहीं मिली/ दरअसल वह साहूकार के पास कैद थी।’

जितेन्द्र वाशिष्ठ पर अपने पिता का गहरा प्रभाव था। उन्हें छंदमुक्त और ग़ज़लें लिखने, दोनों विधाओं में महारत हासिल थी। उनकी ग़ज़ल का यह अश्‍यर काबिलेगौर है— ‘वो जो मलमल-सी चरागाहों की बातें करते/ हमने वो शख्स हकीकत में तो बंजर देखे।’ जितेन्द्र की छंदमुक्त कविता की यह बानगी भी गहरी मर्मस्पर्शिता लिए हुए है— ‘लंबे-लंबे पल/ छोटे-छोटे बरसों में/ बदल गए।’

हिन्दी और अंग्रेजी में एक साथ साधिकार लिखने वाले समर्थ वाशिष्ठ का एक कविता संग्रह हिन्दी में ‘सपने में पिया पानी’ शीर्षक से प्रकाशित हो चुका है, और दो कविता संग्रह उनके अंग्रेजी में उपलब्ध हैं।

पुस्तक : तीन पीढ़ियां साठ कविताएं कवि : खुशीराम वाशिष्ठ, शैलेन्द्र शैल, जितेन्द्र वाशिष्ठ, समर्थ वाशिष्ठ प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर पृष्ठ : 132 मूल्य : रु. 199.

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