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भद्र पुरुष

कहानी

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चित्रांकन संदीप जोशी
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दुकानदार ने ऊंचे स्वर में कहा, ‘इस बाबू को घी में चुपड़ी दो रोटियां और सब्जी दे दो।’ आदेशानुसार थोड़ी देर में एक साफ-सुथरी तश्तरी में खालिस देशी घी में चुपड़ी हुई गर्मागर्म रोटियां और एक कटोरी गोभी की सब्जी मेरे सामने थी। मैं खाने लगा। इसी बीच एक कारिंदा दो और रोटियों के साथ मेरे पास आया और पूछा, ‘और लेंगे?’ मैंने कहा, ‘दे दो।’ इस तरह छह रोटियां खाने के बाद मैं तृप्त हुआ। फिर उठकर वॉश बेसिन में हाथ धोए और दुकानदार के पास आकर जेब से पर्स निकाला। दुकानदार उस समय अपने रुपए-पैसे गिनने में व्यस्त था। मैने उसकी और एक नोट बढ़ाते हुए कहा, ‘अपने पैसे काट लीजिए और बकाया दे दीजिए। दुकानदार ने कहा, ‘कैसा बकाया? इस खाने के पैसे नहीं लूंगा।’

हमेशा की तरह इस बार भी दिल्ली से लौट रहा था। एक ही कमरे में बहुत देर तक समय बिताने के फलस्वरूप जैसा कि अक्सर होता है, मिस्टर रामलिंगम से मेरी घनिष्टता हो गई। ऐसा कोई भी विषय नहीं रहा, जिस पर हमारी बातचीत न हुई हो। वे एक शिक्षित व्यक्ति थे। सिर्फ शिक्षित कहना भी जायज़ नहीं होगा। भारतवर्ष में जिन्हें विद्वान की श्रेणी में रखा जाता है, वे उनमें से ही एक थे।

बातों ही बातों में मुझे ज्ञात हुआ कि उन्होंने ऑक्सफोर्ड से पीएचडी की है। इन दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय में सेवारत हैं। इसके पहले पंद्रह वर्षों तक कलकत्ता विश्वविद्यालय से जुड़े रहे। विश्वभर के विभिन्न देशों की यात्रा और कई पुस्तकों को पढ़ने के पश्चात तरह-तरह की जानकारियां एकत्रित कर अब वे ज्ञानवृद्ध हो चुके हैं।

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‘दरअसल] विश्वविद्यालय का ज्ञान मात्र किताबी है। शायद इससे नौकरी पाने में सुविधा ही जाती हो, परंतु प्रज्ञा में कितनी वृद्धि होती है, वह संदेहास्पद है। अलबत्ता प्रमाणपत्र की एक कीमत तो है ही।’ मिस्टर रामलिंगम ने कहा- ‘प्रमाणपत्रों का शायद कोई मोल नहीं। मुझे अक्सर ऐसा लगता है।’

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मैंने कहा, ‘यह आप क्या कह रहे हैं? ...और क्यों?’ मैं उनका आशय समझ नहीं पाया था।

‘जानते हैं, एक दिन किसी ने मुझे थप्पड़ रसीद कर दिया था।’

‘कौन था वह?’ मुझे हैरानी हुई।

वे बोले, ‘अक्सर हम जिन्हें छोटा समझते हैं, उन्हीं में से एक था वह।’ फिर उन्होंने सविस्तार बतलाना शुरू किया, ‘मैं पंद्रह वर्षों तक कलकत्ते में रहा हूं। कलकत्ता के बारे में या फिर बंगालियों के प्रति गैरबंगालियों की क्या राय है, मैं जानता हूं। कलकत्ते के बारे में नेहरू जी ने यहां तक कहा था- ए सिटी आफ द डेड। पटेल जी ने बंगालियों के बारे में कहा था कि यह फफक कर रोने वाली कौम है। मैंने बंगालियों की निंदा बहुत सुन रखी है। उनके प्रति कई अभियोग भी सुने हैं। फिर भी कलकत्ते की मैं रिस्पेक्ट करता हूं। पूरे इंडिया में कलकत्ता ही ऐसा एकमात्र शहर है जहां इस युग में भी प्राण स्पंदित होते हैं। ऐसा बंबई में नहीं है और दिल्ली में तो बिल्कुल ही नहीं। मैं अकारण ही आपकी खुशामद नहीं कर रहा हूं। मैं ऐसे कई बंगालियों को जानता हूं जो अर्थ-स्वार्थ सबका नुकसान सहकर भी सारी रात मित्रों के साथ गपशप में रमे रहते हैं। क्या आप बंबई में यह पा सकते हैं या फिर दिल्ली में? हरगिज नहीं। बंगाली के जीवन में पैसे से कहीं अधिक आनंद का महत्व है। इसीलिए तो वे बड़ा बाजार में मारवाड़ियों को बसाकर स्वयं किरानी या फिर वकील-बैरिस्टरों के मुहल्ले में आ गए हैं और निश्चिंत होकर मजे का कारोबार कर रहे हैं। आनंद के कारोबार में बंगाली ही श्रेष्ठ हैं। इस तेल-नून और मसालों के बाजार में आनंद का मोल क्या कुछ कम है?’

मिस्टर रामलिंगम बहुत अच्छी कहानी गढ़ना जानते हैं। एक प्रसंग पर बोलते हुए साथ में कई प्रसंग जोड़ लेते हैं।

मैंने पूछा, ‘आपने उस घटना का जिक्र नहीं किया। थप्पड़ वाली।’

वे बोले, ‘आपके लिए शायद वह घटना मामूली होगी परंतु मेरे जीवन की वह एक अविस्मरणीय घटना है।’

‘किस तरह?’

‘उस घटना को बताने के लिए ही मैंने यह प्रसंग छेड़ा। अब देखिए, मैं नौकरी करता हूं दिल्ली यूनिवर्सिटी में। छुट्टी मिलने पर मैं अपने कोचीन शहर में जा सकता हूं, परंतु वहां न जाकर मैं कलकत्ते चला जाता हूं। वहां मेरे बंधु-बांधव हैं। उनके संग छुट्टी बिताकर आनंद उठाता हूं। क्या आप कभी खिदिरपुर से अलीपुर वाली ट्राम पर सवार होकर स्टॉर्नडेल रोड के मोड़ पर उतरकर नेशनल लाइब्रेरी की ओर गए हैं?’

मैंने कहा, ‘हां, गया हूं।’

‘फिर तो आपने देखा ही होगा। ठीक उसी मोड़ पर एक दुकान है। मैं जिन दिनों की बात कर रहा हूं, तब यही एकमात्र मिठाई की दुकान थी वहां। एक बंगाली की दुकान। उस मोड़ से पूरब की ओर जाने पर एक मील तक कोई भी खाने-पीने की दुकान नहीं मिलेगी। मैं साधारणतया शाम को लाइब्रेरी जाया करता था और वहां रात नौ-साढ़े नौ बजे तक रहता। उन दिनों लाइब्रेरी के अंदर भी कोई कैंटीन नहीं थी।’

मिस्टर रामलिंगम कुछ देर की चुप्पी के बाद फिर से कहने लगे, ‘दुकान का नाम ऊपर लिखा हुआ था। कोई एक मिष्टान्न भंडार, पर अंदर चाय भी मिल जाती थी। मैं उन दिनों मिल्टन पर रिसर्च कर रहा था। यूनिवर्सिटी से निकलकर सीधा वहां चला जाता था। वहीं से एक कप चाय और समोसा खाकर लाइब्रेरी पहुंचता था। दुकान का मालिक नंगे बदन एक लकड़ी का कैश-बॉक्स लेकर बैठा रहता और उसके कारिंदे ग्राहकों को निपटाते रहते। दरअसल वह व्यक्ति पैसे का पीर था। महंगा बेचता और चीजें घटिया देता। कुछ कहने पर उसके कान पर जूं तक नहीं रेंगती। कहता, ‘आपकी इच्छा हो तो खाएं या फिर यहां से चलते बने।’

मुझे यह सुनकर बहुत बुरा लगता। व्यवसायी होकर इस तरह की बदतमीजी शोभा नहीं देती। उसकी इस अभद्रता का कारण भी मैंने ढूंढ़ निकाला। वह जानता था कि उसके आसपास एक मील के दायरे में कोई खाने की दुकान नहीं हैं। सो वह जो भी बेचेगा, ग्राहक को खरीदना ही पड़ेगा। पर मुझे क्या पता था कि एक दिन उसी अशिक्षित अभद्र दुकानदार के हाथों मुझे थप्पड़ पड़ेंगे? सचमुच बड़ा ही बेहूदा था। एक दिन टूटा प्याला दिखाकर मैंने गुस्से में कहा, तुम लोग यह टूटा कप बदल नहीं सकते क्या? इस पर उसने कहा, हम में नया कप खरीदने का सामर्थ्य नहीं। आपको ठीक नहीं लगता है तो यहां आकर चाय न पीया करें। मैं उसकी इस बात का क्या जवाब देता। उस दुकान को छोड़कर कहां जाता? मजबूरन वहीं कुछ खाना पड़ता। एक तो यह नंगा बदन, उस पर कपड़े भी मैले। जिन्हें हम अशिक्षित, घटिया व्यक्ति कहते हैं, वही था वह। रुपया-पैसा, आना-दुआना छोड़कर और कुछ नहीं समझता। जब भी वहां जाता, देखता कि वह रुपये-पैसे गिनने में मगन है। चारों और तेज नजरें टिकाए देखता रहता कि कौन क्या खा रहा है और पैसे कम तो नहीं दे रहा। उसे देखकर मुझे ऐसा लगता मानो पैसे के अलावा इस दुनिया की किसी चीज की समझ उसमें नहीं है। कितनी समस्याएं लोगों के समक्ष मुंह बाये खड़ी हैं, उनके कितने सपने हैं, कितना आनंद चारों ओर बिखरा पड़ा है, उसके पास यह सब देखने का क्षण भर समय नहीं था। हम उन्हें छोटे लोग क्यों कहते हैं? छोटा होना गरीब होना तो नहीं। छोटे लोग वे हैं जिनकी दृष्टि नीचे की ओर होती है, जिनकी निगाहें संसार के तुच्छ प्रयोजनों की और नहीं उठतीं। खैर, चाहे जो भी हो, इस धरा पर सिर्फ ऐसे ही लोग हों, यह भी जरूरी नहीं। सभी तरह के लोग हैं, तभी तो इतनी विविधता है।

एक दिन एक घटना घटी। शीतकाल का समय था। उस दिन यूनिवर्सिटी से निकलने में थोड़ी देर हो गई। शाम के पांच बजे के बाद से चारों और अंधियारा फैलने लगता है। हमेशा की तरह धर्मतल्ला से ट्राम बदलकर अलीपुर के ट्राम पर सवार होकर स्टॉर्नडेल रोड पर आकर उतरा। अचानक ऐसा महसूस हुआ कि जोरों की भूख लगी है। लाइब्रेरी में समय बिताते समय यदि भूख और तेज हो गई तो समस्या खड़ी हो जाएगी। तब शायद पढ़ने में पूरा ध्यान भी नहीं दे पाऊंगा। इससे अच्छा कि थोड़ी भूख मिटा ली जाय, यह सोचकर मिठाई की उस दुकान के अंदर चला गया।

मेरे दुकान में प्रवेश करते ही दुकानदार ने विरक्त होकर कहा, ‘चाय नहीं मिलेगी अब। समय हो चुका है।’

ग्राहक भगवान का रूप होता है, ये सभी दुकानदार अच्छी तरह जानते हैं परंतु यह तो मुझे देखकर झल्ला रहा है। मैंने कहा, ‘भले चाय न हो, कुछ खाने को तो है।’ दुकानदार ने कहा, ‘रसगुल्ला, गुलाब जामुन, राजभोग, मिहीदाना है।’

सचमुच मुझे बहुत भूख लगी थी परंतु फिर भी इस ठंड के मौसम में उन मिठाइयों को खाने की तनिक भी इच्छा नहीं हो रही थी। पूछा, ‘कुछ गर्मागर्म नमकीन मिल सकता है?’ एक कर्मचारी ने न कह दिया। ‘देखो, मैं दक्षिण भारतीय हूं। बंगालियों की तरह मीठे का इतना शौकीन नहीं। कुछ नमकीन मिल जाने पर ही हमारी संतुष्टि हो जाती है।’

क्या करूं, कुछ समझ नहीं पा रहा था। बस वहां चुपचाप कुछ देर खड़ा रहा। सोचा, तो क्या अब कोई मिठाई खाकर ही पेट भर लूं? इसके अलावा कोई चारा भी नहीं था। आसपास दूसरी कोई दुकान थी ही नहीं।

अचानक दुकानदार ने पूछा, ‘क्या आप रोटी खाएंगे? गर्म-गर्म रोटी और गोभी की सब्जी मिल सकती है।’

मैं खुशी से झूम उठा। फिर कहा, ‘इतनी देर से बता क्यों नहीं रहे थे। दीजिए, दो रोटी और सब्जी।’ कहकर अंदर जाकर एक मेज के सामने बैठ गया। दुकानदार ने ऊंचे स्वर में कहा, ‘इस बाबू को घी में चुपड़ी दो रोटियां और सब्जी दे दो।’ आदेशानुसार थोड़ी देर में एक साफ-सुथरी तश्तरी में खालिस देशी घी में चुपड़ी हुई गर्मागर्म रोटियां और एक कटोरी गोभी की सब्जी मेरे सामने थी। मैं खाने लगा। इसी बीच एक कारिंदा दो और रोटियों के साथ मेरे पास आया और पूछा, ‘और लेंगे?’ मैंने कहा, ‘दे दो।’

इस तरह छह रोटियां खाने के बाद मैं तृप्त हुआ। फिर उठकर वॉश बेसिन में हाथ धोए और दुकानदार के पास आकर जेब से पर्स निकाला। दुकानदार उस समय अपने रुपए-पैसे गिनने में व्यस्त था। मैने उसकी और एक नोट बढ़ाते हुए कहा, ‘अपने पैसे काट लीजिए और बकाया दे दीजिए। दुकानदार ने कहा, ‘कैसा बकाया? इस खाने के पैसे नहीं लूंगा।’

‘नहीं लेंगे, क्या मतलब?’

दुकानदार ने रुखाई से कहा, ‘यह भोजन हमारे लिए बन रहा था। देखा कि आपको बहुत भूख लगी है, इसलिए दे दिया। इस दुकान में रोटी-सब्जी नहीं बेची जाती।’

कहकर वह फिर से अपने कैश-बॉक्स के पैसे गिनने में व्यस्त हो गया। उसके पास अब मेरी ओर देखने की फुर्सत तक नहीं थी।

मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे उस व्यक्ति ने मेरे गाल पर जोरदार थप्पड़ जड़ दिया हो। मैं ऑक्सफोर्ड का पीएचडी, मिल्टन पर रिसर्च करने वाला शख्स एक अशिक्षित- निरक्षर व्यक्ति के सामने मानो बहुत छोटा हो गया था।

मिस्टर रामलिंगम ने कहा, ‘विश्वास कीजिए। मैं फिर उसके सामने खड़ा न रह पाया। इससे अच्छा तो यह होता कि वह सचमुच मुझे थप्पड़ मार देता। यही मेरे लिए उचित सजा होती।’

मूल बांग्ला से अनुवाद : रतन चंद ‘रत्नेश’

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