‘बस भैया, बहुत सुन लिया। बाबूजी के गुजरने के बाद मां ने हमें भूखे रहकर पाला। आज वह मर गईं, तो तुम लोगों के पास जगह नहीं है। मैं ले जाऊंगा मां को। मैं करूंगा सब काम। हां, अगर तुम लोगों के पास वक्त हो तो आ जाना! वरना लोग कहेंगे कि चार बेटों ने मां की अर्थी को कंधा भी एक साथ नहीं दिया।’ गिरीश की आंखें छलक पड़ीं और वह फफक पड़ा।
रविवार का दिन, वह दिन जो आमतौर पर आराम और परिवार के साथ समय बिताने का होता है। शहर के कोने में बसा आयुष्मान नर्सिंग होम भी इस रविवार की शाम को शांत और सुस्त नजर आ रहा था। नर्सिंग होम का छोटा-सा रिसेप्शन, जिसमें एक पुराना टीवी चल रहा था, वहां वार्ड ब्वॉय और नर्सें समय काटने के लिए रविवार की फिल्म देख रहे थे। फिल्म के बीच-बीच में आने वाले विज्ञापनों से वार्ड ब्वॉय का मूड खराब हो रहा था। वह बड़बड़ाता, ‘ये विज्ञापन भी न, फिल्म का मजा किरकिरा कर देते हैं।’ पास में बैठे कुछ मरीजों के रिश्तेदार, जो मजबूरी में वहां थे, भी उसी टीवी पर नजरें टिकाए हुए थे। उनकी आंखों में थकान और बेबसी साफ झलक रही थी।
तभी बाहर सड़क पर एक ऑटो रिक्शा रुकने की आवाज आई। वार्ड ब्वॉय ने कांच की खिड़की से बाहर झांका। एक व्यक्ति, जिसके चेहरे पर घबराहट और चिंता साफ दिख रही थी, एक वृद्ध महिला को गोद में उठाए नर्सिंग होम के अंदर दाखिल हुआ। उसने महिला को सावधानी से बेंच पर लिटाया और रिसेप्शन की ओर बढ़ा।
‘डॉक्टर साहब हैं?’ उसने हांफते हुए पूछा।
‘आज रविवार है, डॉक्टर साहब नहीं आते,’ वार्ड ब्वॉय ने बिना नजरें टीवी से हटाए जवाब दिया।
‘मैं गिरीश वर्मा, डॉक्टर साहब का रिश्तेदार हूं,’ उस व्यक्ति ने अपनी पहचान बताई।
‘डॉक्टर साहब के सारे मरीज तो रिश्तेदार ही होते हैं। मैं आठ साल से यहां काम कर रहा हूं, आपको तो कभी नहीं देखा,’ वार्ड ब्वॉय ने अपना अनुभव बताया।
‘हम उनके दूर के रिश्तेदार हैं,’ व्यक्ति ने गलती सुधारते हुए कहा, ‘देखिए, यह मेरी मां हैं। बूढ़ी हैं, बाथरूम में गिर गईं, फिर से होश नहीं आया। रुक-रुक कर सांस ले रही थीं, अब अचेत हैं। छह महीने पहले इन्हें लकवा हुआ था। प्लीज, जल्दी से डॉक्टर साहब को बुला दें।’
‘मरीज की हालत देखकर लगता है कि डॉक्टर का इंतजार करने से बेहतर है कि तुरंत भर्ती कर लिया जाए। यहां डॉक्टर साहब का असिस्टेंट है। कहें तो भर्ती कर दूं?’ नर्स, जो अब तक चुप थी, ने स्थिति को समझते हुए कहा।
‘मैं अकेले कोई फैसला नहीं ले सकता। मेरे तीन और भाई हैं, उनके बिना मैं क्या करूं?’ गिरीश ने असमंजस में कहा।
‘ठीक है, जैसा आप उचित समझें। लेकिन जल्दी कीजिए, मरीज की हालत गंभीर है। कुछ भी हो सकता है।’ नर्स ने गंभीर स्वर में कहा।
कुछ ही देर में नर्सिंग होम में दो और लोग दाखिल हुए। एक पुरुष और एक महिला। पुरुष ने गिरीश को देखते ही पूछा, ‘क्यों रे गिरीश, मां को क्या हुआ?’
‘रमेश भैया,’ गिरीश की आवाज कांप रही थी, ‘मां बाथरूम में गिर गईं और बेहोश हो गईं। उनके हाथ-पैर ठंडे पड़ने लगे। मैं ऑटो में लेकर यहां आया। डॉक्टर साहब नहीं हैं, ये लोग कह रहे हैं कि भर्ती करा दो, वरना...’ गिरीश की बात पूरी होने से पहले ही वह फफक पड़ा।
‘भर्ती कराने में क्या दिक्कत है? मां को भर्ती क्यों नहीं कर लेते?’ रमेश ने वार्ड ब्वॉय की ओर देखते हुए पूछा।
‘दो हजार रुपये जमा कर दीजिए, मरीज को भर्ती कर लेंगे,’ वार्ड ब्वॉय ने टीवी से नजरें हटाए बिना जवाब दिया।
‘भाई, डॉक्टर साहब हमारे पहचान के हैं,’ रमेश ने जोर देकर कहा।
‘पैसे जमा कराने का नियम भी उन्हीं का है। पैसे जमा कर दीजिए, ताकि मरीज को दवा-दारू शुरू हो सके।’ वार्ड ब्वॉय ने दो टूक जवाब दिया।
‘क्यों रे, पैसे क्यों नहीं जमा किए?’ रमेश ने गिरीश की ओर देखकर पूछा।
‘रमेश भैया, चार महीने से मां मेरे पास हैं। उनकी देखभाल, दवा-दारू का खर्च मैं ही उठा रहा हूं। नगर निगम के मोहर्रिर को मिलता ही कितना है? हम चारों भाइयों ने मिलकर तय किया था कि तीन-तीन महीने मां को अपने पास रखेंगे।’ गिरीश ने लाचार स्वर में कहा।
‘शैलजा, तुम मां की देखभाल करो। मैं डॉक्टर साहब को लेकर आता हूं।’ रमेश ने एक पल सोचकर कहा और स्कूटर लेकर नर्सिंग होम से बाहर निकल गया। रास्ते में एक टेलीफोन बूथ पर रुककर उसने सबसे बड़े भाई शिवप्रकाश को फोन लगाया। ‘भैया, मां बहुत सीरियस हैं। गिरीश उन्हें आयुष्मान नर्सिंग होम लेकर आया है। आप जल्दी पहुंचें। और हां, तीन हजार रुपये भी साथ लाएं। मैं भी कुछ पैसे लेकर डॉक्टर साहब को लेते हुए पहुंच रहा हूं।’ इतना कहकर रमेश ने फोन काट दिया।
‘किसका फोन था?’ शिवप्रकाश की पत्नी सविता ने पूछा।
‘चलो, आयुष्मान नर्सिंग होम। मां भर्ती हैं। रमेश का फोन था। एक-दो हजार रुपये भी रख लो।’ शिवप्रकाश ने जवाब दिया।
‘पैसे रखना जरूरी है?’ सविता ने तंज भरे लहजे में पूछा।
‘बड़ा हूं, फर्ज तो निभाना पड़ेगा।’ शिवप्रकाश ने कहा।
‘रमेश के पास पैसे नहीं हैं?’ सविता ने फिर सवाल किया। शिवप्रकाश ने बिना जवाब दिए पैसे निकाले और सविता के साथ नर्सिंग होम के लिए निकल पड़ा।
नर्सिंग होम पहुंचते ही शिवप्रकाश ने गिरीश को देखकर पूछा, ‘क्यों रे, भर्ती के लिए पैसे नहीं थे तो फोन क्यों नहीं किया?’
‘भैया, रमेश भैया को फोन किया था। उन्होंने कहा था कि वे आपको फोन करेंगे, इसलिए मैंने आपको सीधे फोन नहीं किया।’ गिरीश ने सफाई दी।
‘तो क्या हुआ? तुम फोन कर देते तो क्या बिगड़ जाता?’ शिवप्रकाश ने सिगरेट जलाते हुए तल्खी से कहा।
‘भैया, आपके यहां जब भी फोन किया, हमेशा यही जवाब मिला कि आप नहीं हैं। भाभी से पूछ लीजिए।’ गिरीश ने जवाब दिया।
‘खैर, चिंता मत करो। मैं देखता हूं,’ शिवप्रकाश ने कहा और रिसेप्शन काउंटर पर पहुंचा। ‘मैडम, मां को भर्ती करना है।’
‘ठीक है, यह फॉर्म भर दीजिए और दो हजार रुपये जमा कर दीजिए,’ नर्स ने कहा।
‘हमें डॉक्टर साहब अच्छे से जानते हैं,’ शिवप्रकाश ने रौब झाड़ते हुए कहा।
‘सर, मरीज को भर्ती करने से पहले कन्सेंट जरूरी है।’ नर्स ने स्पष्ट किया।
शिवप्रकाश ने फॉर्म लिया और मां का नाम, पिता का नाम और उम्र जल्दी-जल्दी भर दी। लेकिन जब पते का कॉलम आया, उनकी कलम रुक गई। वह एक पल के लिए असमंजस में पड़ गया। फिर बोला, ‘एक्सक्यूज मी, मैडम, यह रुपये रखिए। फॉर्म मैं भरकर देता हूं।’
‘सॉरी सर, फॉर्म जरूरी है। मरीज को कुछ हो जाए तो बहुत लफड़ा होता है।’ नर्स ने सख्ती से कहा।
‘गिरीश, इधर आ। मां को अभी कहां रहना था? रमेश के पास या महेश के पास?’ शिवप्रकाश ने गिरीश को बुलाकर पूछा।
‘महेश भैया के पास।’ गिरीश ने जवाब दिया। शिवप्रकाश ने महेश का पता फॉर्म में भरा और महेश वर्मा के नाम से दस्तखत कर दिए। नर्स ने फॉर्म लिया और मरीज को भर्ती करने का आदेश दिया। वार्ड ब्वॉय और नर्स ने स्ट्रेचर लाकर वृद्ध महिला को जनरल वार्ड के बेड नंबर चार पर ले गए। असिस्टेंट ने उनका ब्लड प्रेशर नापा, थर्मामीटर लगाया और ग्लूकोज की बोतल चढ़ा दी।
शिवप्रकाश, सविता और गिरीश कोने में खड़े थे। तभी रमेश अपनी पत्नी शैलजा के साथ वापस आया और शिवप्रकाश व सविता के पैर छुए।
‘क्यों रमेश, कैसे हो?’ शिवप्रकाश ने पूछा। ‘बस भैया, क्या बताऊं, धंधे में लगातार घाटा हो रहा है। आपके पैसे भी नहीं लौटा पा रहा। आज मेरी लाचारी देखिए, मां के भर्ती के पैसे भी मेरे पास नहीं हैं।’ रमेश ने लाचारी भरे स्वर में कहा।
‘फोन पर तो तुम पैसे लेकर आने की बात कह रहे थे।’ शिवप्रकाश ने तंज कसा।
‘घबराहट में बोल गया होगा भैया। वरना मेरी स्थिति तो गिरीश से भी बदतर है। लेकिन यह वक्त इन बातों का नहीं। अभी मां की जान बचाना जरूरी है।’ रमेश ने कहा।
‘जान बचाने के लिए तुम्हारे बड़े भैया हैं। लेकिन उसके बाद कौन देखेगा? महेश को भी बुला लो, ताकि वह यह न कहे कि उसे बताया नहीं गया।’ सविता, जो अब तक चुप थी, बोली।
‘वह जोरू का गुलाम क्या पूछेगा, भाभी? मां को रखने की जिम्मेदारी उसकी थी, लेकिन ताला लगाकर भाग गया।’ गिरीश ने गुस्से में कहा।
‘देखो, हम तीनों यहीं हैं। मां की देखभाल का नियम हम चारों ने मिलकर बनाया था। महेश को भी बात माननी होगी। सबसे पहले वह गिरीश को एक महीने का खर्च दे दे। मां ठीक होती हैं तो तीन महीने अपने पास रखे।’ शिवप्रकाश ने बड़प्पन दिखाते हुए कहा।
‘और अगर वह नहीं रखेगा तो?’ रमेश ने पूछा।
‘कैसे नहीं रखेगा? मां सबकी है, जिम्मेदारी भी सबकी है।’ शिवप्रकाश ने जोर देकर कहा।
‘बड़े भैया, मेरी कमाई इतनी नहीं कि मैं तीन महीने भी मां को रख सकूं। लेकिन अगर सब पैसे की मदद करें तो मैं मां को जिंदगी भर अपने पास रख सकता हूं।’ गिरीश ने भावुक होकर कहा।
तभी महेश और उसकी पत्नी नर्सिंग होम पहुंचे। महेश ने बिना किसी अभिवादन के पूछा, ‘मां कैसी हैं, भैया?’
‘तुम्हें मां से क्या? अपने घर में नहीं रख सकते। ताला लगाकर भाग जाते हो। बड़े आए पूछने वाले।’ गिरीश ने नाराजगी दिखाई।
‘मैं तुम जैसे छोटे लोगों के मुंह नहीं लगता। जरूरी काम था, इसलिए गया था।’ महेश ने तल्खी से कहा।
‘एक महीने से इसी शहर में हो। मां का ख्याल था तो लेने क्यों नहीं आए?’ गिरीश ने सवाल किया।
‘मैंने ठेका नहीं ले रखा है। मेरी अपनी परेशानियां हैं। मैं मां को नहीं रख सकता। हां, पैसे की मदद कर सकता हूं।’ महेश ने अकड़ के साथ कहा।
‘महेश, पैसे का घमंड ठीक नहीं। फिर भी अगर तुम्हारे पास पैसे हैं तो गिरीश को मां के एक महीने का खर्च और दवा-दारू का खर्च दे दो।’ शिवप्रकाश ने कहा।
‘कितना खर्च हुआ तेरा, बता?’ महेश ने गिरीश की ओर देखकर पूछा।
‘भैया, यह जगह हिसाब करने की नहीं है। मां को बचाने की है।’ गिरीश की आंखें भर आईं और वह रो पड़ा।
तभी नर्सिंग होम में डॉक्टर की कार रुकी। डॉक्टर ने कार से उतरते ही सबको देखा और मुस्कुराते हुए कहा, ‘आज सारा वर्मा परिवार एक साथ! अच्छी बात है।’ वह जनरल वार्ड में गए और बेड नंबर चार पर रुके। उन्होंने मां की नब्ज टटोली और वार्ड ब्वॉय को कहा, ‘विवेक, टॉर्च लेकर आओ।’ वार्ड ब्वॉय टॉर्च लेकर पहुंचा। डॉक्टर ने मां की आंखें खोली और टॉर्च से रोशनी डाली, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। उन्होंने पलकें बंद कीं और चादर ओढ़ा दी। बाहर निकलकर उन्होंने शिवप्रकाश को बुलाया और धीमे स्वर में कहा, ‘सॉरी शिवप्रकाश, मां मर चुकी हैं। गर्मी का मौसम है, लाश ज्यादा देर नहीं रखी जा सकती। सुबह जल्दी अंतिम संस्कार करवा देना, वरना दुर्गंध आने लगेगी।’
‘जी, डॉक्टर साहब।’ शिवप्रकाश ने भारी मन से कहा।
‘मैं डिस्चार्ज पेपर बना देता हूं। मैडम, शिवप्रकाश जी ने जो पैसे दिए हैं, वापस कर दो,’ डॉक्टर ने रिसेप्शन पर कहा।
‘सर, एक ग्लूकोज की बोतल लगी थी,’ नर्स ने याद दिलाया।
‘कोई बात नहीं। शिवप्रकाश जी पैसे वापस ले लेंगे। घर की बात है।’ डॉक्टर ने कहा और चले गए।
शिवप्रकाश भारी कदमों से भाइयों के पास लौटा। ‘मां हम सबको छोड़कर चली गईं। डॉक्टर साहब का कहना है कि गर्मी का मौसम है, अंतिम संस्कार सुबह जल्दी करना होगा, वरना दुर्गंध आएगी। मेरे घर में अंतरा और मिनी की पीएमटी की परीक्षा एक हफ्ते बाद है, इसलिए अंतिम संस्कार और बाकी कार्यक्रम तुम तीनों में से किसी एक के यहां कराना ठीक रहेगा।’
‘मेरी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। आपके पैसे भी नहीं लौटा पा रहा हूं।’ रमेश ने तुरंत हाथ खड़े कर दिए।
‘मैं भी पंद्रह दिन का समय नहीं दे पाऊंगा। हां, पैसे की मदद कर सकता हूं।’ महेश ने पल्ला झाड़ते हुए कहा।
‘बस भैया, बहुत सुन लिया। बाबूजी के गुजरने के बाद मां ने हमें भूखे रहकर पाला। आज वह मर गईं, तो तुम लोगों के पास जगह नहीं है। मैं ले जाऊंगा मां को। मैं करूंगा सब काम। हां, अगर तुम लोगों के पास वक्त हो तो आ जाना! वरना लोग कहेंगे कि चार बेटों ने मां की अर्थी को कंधा भी एक साथ नहीं दिया।’ गिरीश की आंखें छलक पड़ीं और वह फफक पड़ा।

