नहीं होगा अगर खेत,
तो किसी पगडंडी पर
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धान बो दूंगा,
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अपने हिस्से का,
मुट्ठी भर।
बूंद-बूंद जल संभाल लूंगा,
अंजुरी में, आँखों में भी,
इतना ही तो
आवश्यक है, जल।
संभाल लूंगा सांस,
हवा रोक लूंगा,
शरीर के किसी कोने में।
सब कुछ धीरे-धीरे खोते जाने,
विलुप्त हो जाने से पहले
इतनी ही ज़रूरत होगी,
उन वस्तुओं की, कि
जीवित रह सकूं, तब तक,
जब तक, धीरे-धीरे
कंक्रीट में बदलती धरती
फिर से हरी-भरी
हो जायेगी,
सिर्फ़ उस अंतिम दिन
के बाद की
पहली भोर के लिये,
जीवित रहूंगा मैं,
इतनी ही उम्मीद के साथ।
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