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अंतिम दिन के लिए

कविता

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नहीं होगा अगर खेत,

तो किसी पगडंडी पर

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धान बो दूंगा,

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अपने हिस्से का,

मुट्ठी भर।

बूंद-बूंद जल संभाल लूंगा,

अंजुरी में, आँखों में भी,

इतना ही तो

आवश्यक है, जल।

संभाल लूंगा सांस,

हवा रोक लूंगा,

शरीर के किसी कोने में।

सब कुछ धीरे-धीरे खोते जाने,

विलुप्त हो जाने से पहले

इतनी ही ज़रूरत होगी,

उन वस्तुओं की, कि

जीवित रह सकूं, तब तक,

जब तक, धीरे-धीरे

कंक्रीट में बदलती धरती

फिर से हरी-भरी

हो जायेगी,

सिर्फ़ उस अंतिम दिन

के बाद की

पहली भोर के लिये,

जीवित रहूंगा मैं,

इतनी ही उम्मीद के साथ।

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