पुस्तक समीक्षा

मुट्ठी में आकाश समा लेने वाली पहेली

मुट्ठी में आकाश समा लेने वाली पहेली

सत्यवीर नाहड़िया

हाइकु आज जापान की सीमाएं लांघकर वैश्विक छंद बन चुका है। पांच-सात-पांच वर्णों की इस लघु कविता को आज विश्व की विभिन्न भाषाओं एवं बोलियों में विभिन्न प्रारूपों में तेजी से लिखा जा रहा है। इस लघुकाय छंद में रचना करना गागर में सागर भरना जैसा प्रयोग है। मुट्ठी में आकाश समा लेने की खूबी जिस रचनाधर्मिता में होती है, वही इस छंद के साथ न्याय कर पाती है। यदि इस छंद में पहेलियां रची जाएं तो छंद के अलावा पहेलियों के प्राथमिक पक्षों को भी प्रमुखता से निर्वहन करना होता है। आलोच्य कृतियां हाइकु पहेलियां (प्रथम एवं द्वितीय अंक) में आठ सौ से ज्यादा पहेलियां संकलित की गई हैं, जिनमें कलम एवं कूंची से जुड़े बहुमुखी प्रतिभा के दिवंगत रचनाकार राधेश्याम जी हाइकु छंद तथा पहेलियों के सभी मूल तत्वों को निभाया है, जिसके चलते हाइकु पहेलियां रोचक बन पड़ी हैं। इन हाइकु रचनाओं को उनके सुपुत्र रमाकांत ने प्रकाशित करवा, उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी है। स्व. राधेश्याम जी ने हिंदी के अलावा अंग्रेजी, हिंदी, उर्दू तथा संस्कृत में भी अनूठी रचनाधर्मिता से अपनी कलम का लोहा मनवाया है। प्रकृति, साहित्य, कला-संस्कृति, फल-फूल, देवी-देवता पौराणिक-ऐतिहासिक तथा सांसारिक पहलुओं पर रची इन पहेलियों में रोचकता एक विशेष तत्व है।

चार सड़क/ छोरियां बेधड़क/ दौड़ें कड़क (चौपड़), बावनी वाम/ राजा रानी गुलाम/चार सलाम (ताश), झोली में भरे/अजूबे खरे खरे/ बनिया फिरे(मदारी), जला तो कसा/ घी तेल में लसा/ नैनों में बसा (काजल) पिया उठाया/ मेरा भेद बताया/ नैना लजाया (घूंघट), पलटी मार/ सर पै बैठा यार/ जरा न भार (पगड़ी) जैसी पहेलियां हाइकु छंद में रच बस गई हैं। कुंडली मार/ चुरा मधु का प्यार/ बैठी छिनार तथा... पानी न पीता/ ताल में पड़ा जीता/ भरा न रीता नामक दोनों हाइकु क्रमश: इमरती व रसगुल्ला की पहेलियां हैं। इसी प्रकार हाइकुकार ने कुल्हड़ तथा चारपाई को हाइकु पहेलियों में बखूबी छंदबद्ध किया है :-

माटी का लाला/ जब काम निकाला/ घूरे पै डाला... चार तो खड़े/ वे चार लंबे पड़े/आठों ही भिड़े।

संग्रह में हाइकु के तीनों चरणों को तुकांत बनाकर हाइकुकार ने इनकी रोचकता को और बढ़ा दिया है। अर्जुन हेतु एक दो तीन/ बीबियां साढ़े तीन/ काठ प्रवीन, ऊधो के लिए श्याम दुलारा/ औरतों से भी हारा/ ज्ञान का तारा, कुबेर हेतु आठ रे दंतु/तीन पैर का जंंतु/है धनबंतु,चाणक्य के लिए चोटी क्या खुली/ अरे गद्दी बदली/ तो नींद खुली, रावण हेतु पंडित बड़े/ नाम सोने में जड़े/ नारी ले उड़े। इसी प्रकार जड़ न जात/नभ चढ़ सुहात/ अक्षय पात (अमरबेल), कर कस ले/अधर से रस ले/खूब मसले (आम), बेचे मिठाई/ यह लंबू हलवाई/ तोड़कर खाई (खजूर), आई हाथ में/ नंगी करी बात में/नाचे दांत में (मूंगफली) आदि हाइकु पहेलियां प्रभाव छोड़ती हैं।

विषय विविधता, सुंदर छपाई, आकर्षक आवरण तथा दोनों कृतियों के अंत में सरलार्थ व शब्दार्थ का होना कृति की अन्य विशेषताएं हैं। यह कृति बच्चों से बड़ों व आमजन से शोधार्थियों तक पसंद की जाएगी।

पुस्तकें : हाइकु पहेलियां (प्रथम एवं द्वितीय अंक) रचनाकार : राधेश्याम प्रकाशक : साइबर विट. नेट, इलाहाबाद पृष्ठ : 186 व 169 क्रमश: मूल्य : रु. 250 प्रति अंक

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