साल की पहली कविता में
होना चाहिए इस बात का जिक्र कि
साल के बदल जाने के बाद
क्या क्या बदलेगा,
और क्या क्या रह जायेगा
पहले जैसा?
रोटी की गोलाई
बढ़ेगी या वह छोटी हो जाएगी
पिछले साल की तुलना में,
इस बात का जिक्र जरूर होना चाहिए
साल की पहली कविता में!
बीते साल में अंधेरा
कितना कम हुआ,
या कितना बढ़ा?
किसके हिस्से आये रोशनी के टुकड़े,
किसके कोने रह गए अंधेरे?
कितने हाथों को मिला काम,
कितने हाथ करते रहे इंतजार
शहर के लेबर चौक पर,
इस बात का हिसाब-किताब
यदि लगाता कोई
साल की पहली कविता में,
तो कितना ही अच्छा होता!
कितने पेड़ कटे,
नदियों का जल कितना हुआ कम,
मछलियां कितनी घटी,
कितनी घटी ऊंचाई
पर्वत होने की पात्रता के लिए
और कितना बढ़ा हवा में जहर,
नहीं मालूम कि ये सब बातें
नए साल में
कविता के विषय होंगे या नहीं?
किसके साथ भीड़ ने किया इंसाफ,
किसे भून दिया गया पूछ कर धर्म,
न्याय की देवी कब रहीं मौन,
और न्याय करता रहा बुलडोज़र
पूरी गर्जना के साथ...
क्या होगा इन बातों का जिक्र,
साल की पहली कविता में?

