हिंदी साहित्य की लोकप्रिय प्राचीन विधा ‘गीत’ के बाद नवगीत ने साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान बना ली है। संस्कृति और लोकमूल्यों के धरातलीय संस्कार, समय-सापेक्षता, प्रकृति से लगाव, विपुल शब्द भंडार, सहज प्रतीकों का इस्तेमाल तथा सामाजिक सरोकारों और जीवन संघर्षों की कलात्मक अभिव्यक्ति नवगीत को वह नयापन देती है, जिसके चलते वह गीत से नवगीत में परिवर्तित हुआ था। आलोच्य कृति ‘चन्दन वन’ के नब्बे गीत-नवगीतों से गुजरते हुए माटी की सौंधी महक से सरोबार जीवन संघर्षों और निरंतर हो रहे सामाजिक अवमूल्यन की पीड़ा को सहज ही महसूस किया जा सकता है।
दोहाकार राजपाल सिंह गुलिया की रचनाधर्मिता में गीत-नवगीत विधाओं के मूलभूत तत्वों के अलावा विशिष्ट नवाचारी प्रयोग देखे जा सकते हैं। इन रचनाओं में कहीं सूक्ष्म मानवीय संवेदनाओं का भावपूर्ण चित्रण है, तो कहीं किसानों और मजदूरों की व्यथा-कथा के मुंहबोलते शब्दचित्र हैं। कहीं बढ़ती अपसंस्कृति को प्रमाण के साथ रेखांकित किया गया है, तो कहीं मानवीय मूल्यों में गिरावट का मार्मिक चित्रण है। दूसरी ओर, रचनाकार ने कुछ रचनाओं में अपनेपन, भाईचारे और प्रेम का संदेश दिया है।
रचनाकार ने सामाजिक विसंगतियों और विद्रूपताओं को संजीदा प्रतीकों के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। संग्रह के नवगीतों में लोकोक्तियों और मुहावरों का सहज प्रयोग हुआ है। इसी प्रकार साहित्य, कला, संस्कृति और राजनीति की चर्चित शब्दावली पर भी अच्छे नवगीत रचे गए हैं।
संग्रह में दैनिक जीवन की परिस्थितियों और कड़वी सच्चाइयों को नवगीतों में अभिव्यक्त किया गया है। कुल मिलाकर, ‘चन्दन वन’ गीत-नवगीत साहित्य को समृद्ध करते हुए अपने युगबोध की महक से विशिष्ट उपस्थिति दर्ज कराएगा।
पुस्तक : चन्दन वन रचनाकार : राजपाल सिंह गुलिया प्रकाशक : श्वेतवर्णा प्रकाशन, नोएडा पृष्ठ : 120 मूल्य : रु. 299.

