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हर बार

कविता

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भीड़ में हाजिर नहीं था वह।

ढूंढ़ रहा था घर लौटने की वजह।

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वह था कहीं जरूर,

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चौराहे ने कहा, ‘यहां कोई नहीं!’

धूल गिन चुकी थी कई जोड़ी पांव,

एक जैसी थी जिनकी गंध।

सबको लगा वह अपना चेहरा

दरवाजे के पीछे खूंटी पर छोड़ आए हैं।

कीचड़ सने जूतों के साथ

सूख रहे थे उनके नाम,

रोटियां सिक रही थीं।

बोलती नहीं थी भूख।

न्यायाधीश वकील बनकर

ताकतवरों के पक्ष में दहाड़ रहे थे।

सबसे बेखबर किसी और की हंसी

हंस रहे थे बच्चे।

उनींदे थे चुप्पी के कंबल ओढ़े बूढ़े।

उस अनुपस्थित आदमी ने

जिस आदमी को खोजा,

वह माफी मांग रहा था अपनी परछाई से।

कॉरपोरेटर ने’ ‘कहा सब कुशल है!

वह लोकसभा में जाकर रहेगा।’

केवल हवा थी जो असहमत थी।

वह अधेड़ उस दिन समझा कि

घर के भीतर होता निर्मम निर्वासन,

कतई अकेला होता है वह

जिसे हर कोई पहचानता है।

घर वहीं था,

वहां से सबसे पहले चले गए थे लोग।

एक दरार थी जिसे भरना संभव नहीं,

वहां छुपा हुआ था घर का पता।

या तहखाना जहां पिंजर दफन थे कई,

या सोया हुआ ज्वालामुखी, जिसके अतल में खदकता रहता था लावा,

या सूखा कुआं, जो कभी नहीं भरता था।

घर जैसा कुछ था,

वहां लोग बोलते नहीं, टकराते थे।

ऐसी आवाजें आती थीं कि

गंदगी फ्लश कर रहे हो!

उस मकान के खुले रहते थे दरवाजे,

भीतर नहीं आना चाहता था कोई।

वहां लौटते थे सब

अपने-अपने दुख लेकर।

किसी के काम नहीं आया

किसी का दुख।

चुपचाप बर्तन समेट देती थी रात,

खाली कटोरियों में उजाला

रख देती थी सुबह।

सोचते थे सब यही जीवन है।

जीवन था जो कहता था,

तुम मुझे जीते नहीं हो,

बस इंतजार करते हो मेरा।’

घर लौटने की वजह ढूंढ़ रहा था वह

और जीवन का इंतजार करने के बाद भी

घर कभी पूरा नहीं लौटता था!

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