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जीवन की सांझ

कहानी

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चित्रांकन संदीप जोशी
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‘चलिए, आज से हम अपना-अपना स्थान बदलकर सोचें, दोनों रिश्तों के साथ नई पीढ़ी के व्यवहार के विषय में। आपको पता है, जंवाई के मुंह से जो बात अच्छी नहीं लगती, वह बेटे के मुंह से अच्छी हो जाती है, और बेटी के मुंह से जो बात ठीक लगती है, वह बहू के मुंह से कड़वी ज़हर समान लगती है।’ ‘इसलिए हमें आपस में एक-दूसरे के संस्कारों पर अंगुली उठाने के बजाय, एक साथ एक-दूसरे का सहारा बनना है। हमें बच्चों का भी सहारा बने रहना है। आज हम बच्चों की किसी जिम्मेदारी को उठा लेंगे, तो कल बच्चे हमें संभाल ही लेंगे। इसलिए भगवान के लिए गुस्सा त्याग दो और अपनी अर्चना सखी की बात मान लो।’

अर्चना जी इधर-उधर मुझे ही ढूंढ़ रही थीं। एक बार मन किया हाथ हिला कर बता दूं कि मैं यहां पर बैठी हूं… बेचारी, वो कौन-सी जवान हैं, मेरी उम्र की महिला ही तो हैं। चल-चल कर हलकान होंगी, मुझे ही तो ढूंढ़ने निकली हैं, अपनी परेशानी के बावजूद पूरा प्रयास तो करेगी ही, फिर चाहे घुटनों पर घंटों मालिश करती रहें। पर कुछ सोचकर मैं चुपचाप बैठी रही, क्योंकि मेरा आवेश अभी मुझ पर हावी था। पर किसी तरह उन्होंने अंत में मुझे ढूंढ़ ही लिया था। मैंने एक विरक्ति भरी नजर से उन्हें देखा और जैसे थीं, वैसे ही बैठी रही।

वो आकर मेरे पास धम्म से बैठी, अर्चना जी अपनी थकान और उतरती चढ़ती सांसों को संयत करने के प्रयास में लगी थीं। फिर उन्होंने धीरे से मेरा हाथ अपने हाथ में लिया और सहलाने लगीं। कुछ समय बाद बोलीं, ‘जा रही हैं आप?’

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मैं रोष में भरी बैठी थी, बोली, ‘हां, जा रही हूं...’

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‘पर कहां?’ और उनकी बात पूरी होने से पहले ही मैंने बोल पड़ी, ‘जहां मेरा मन करेगा।’

उनका स्नेह भरा स्पर्श पाकर, मेरी आंखों में उमड़ आए आंसुओं को रोकने का भरसक प्रयास भी असफल हुआ, और मेरी आंखें सारा भेद खोल गईं। और उसके साथ बहता चला गया मेरा सारा गुस्सा, जबरन ओढ़ा मेरा सारा आत्मविश्वास डगमगा गया। कुछ देर दोनों ओर से चुप्पी, अर्चना जी ने मेरा हाथ धीरे-धीरे सहलाना जारी रखा और कहना शुरू किया, ‘रिक्शे से उतर कर यहां तक आने में मेरा क्या हाल हुआ, आप देख रही हैं। शोभाजी, आपकी हालत भी मुझसे कुछ विशेष अच्छी नहीं है। उस पर इतना आवेश... जो स्वास्थ्य के लिए बिल्कुल उचित नहीं है।’

‘क्या कहती हैं आप?’ अर्चना जी ने मेरी ओर बड़े प्यार से देखा। मैंने फिर भी उग्र अंदाज से ही कहा था, ‘तो क्या करूं, बार-बार अपमानित होती रहूं?’

अर्चना जी कुछ समय तक मेरा मुंह तकती रहीं। उन्होंने पूरे धैर्य का परिचय दिया, इंतजार करती रहीं कि मेरा मन शांत हो, तभी वह अपनी बात कहें। चाय वाले को दो कप चाय लाने को कहकर अर्चना जी फिर चुप हो गईं। मुझे चाय पकड़ा कर फिर से वो मेरी बगल में ऐसे बैठ गईं, जैसे मुझे जानती ही नहीं हैं। पर चाय का कप खत्म होते-होते मैं संयत हो चुकी थी। अर्चना जी ने बड़े प्यार से पूछा, ‘शोभाजी, अब कुछ अच्छा लग रहा है? यहां से चलें या हम यहीं कुछ देर बैठे रहें?’

ना जाने क्यों मुझे भीड़ में इस तरह बैठे रहना अच्छा लग रहा था। मेरी वृद्धावस्था, असुरक्षा की भावना और अकेलापन, और उस पर नकारात्मक सोच... ये सब किसी भी समझदार मनुष्य का मनोबल कमजोर करने के लिए काफी हैं, और आज मैं भी तो इसी का शिकार थी।

अर्चना जी ने कहना शुरू किया, ‘शोभा जी, मेरी नजर में आप विदुषी हैं। आपकी सोच और आपके परिवार के प्रति निष्ठा की मैं सदा से कायल रही हूं। आपने सदा परिवार को बांधकर रखने का प्रयास किया है। अति सक्रिय रहकर अपने समय का अधिकतम उपयोग करते हुए जीवन जीया। उस जीवन शैली के बाद इस तरह का जीवन... अचानक आपका अकेलापन, समाज से अलग-थलग हो जाना और घर में भी आपकी पग-पग पर कसौटी होना, यह सब मैं भी देख और सुन रही हूं।’

‘मैं तो सदा आपको भाग्यशाली मानती आई थी कि आप दो पुत्रों की माता हैं। आप दोनों अपनी सारी जिम्मेदारी पूरी कर चुके थे। अब आपको अपने लिए ही जीना था। पर अचानक आपका अकेला हो जाना, आपको ही नहीं, हम सब को झकझोर रहा था। पर यह तो संसार चक्र है, समाज में चारों ओर हो रहा है। कभी न कभी तो इससे प्रभावित सभी होते हैं, आप पर भी असर होना स्वाभाविक है। सराहना करती हूं कि इस परिस्थिति में आपने स्वयं को संभाला।’

‘मैं जब इस दौर से गुजरी थी, तब मेरे बच्चे बहुत छोटे थे। मैं संयुक्त कुटुम्ब में थी। मुझे भिन्न परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। सच है, जिन्हें हम अपना समझते हैं, जिनके संबल की आशा हमें होती है, उन्हीं की नजरों में जब हम बेकार समझे जाने लगें, तब मन का आहत होना स्वाभाविक है। मेरी भी संयुक्त कुटुम्ब में रहने की आदत हो गई थी। मुझे भी संयुक्त कुटुम्ब छोड़कर इन परिस्थितियों में से पुत्री के साथ रहने इसलिये आना पड़ा कि परिवार में जो मेरे हमउम्र थे, वो स्वयं ही अपनी संतानों पर निर्भर हो गए थे। नई पीढ़ी के साथ तालमेल बिठाने में लगे थे। ऐसे में मुझे भी अपना भविष्य देखना था। इकलौती पुत्री के अलावा मैं किससे आस करती? आप सोचकर देखिए, इस तरह यहां आना और जीवनभर इसी की आस रखना कितना कष्टकारी है।’

‘कभी-कभी मान, अपमान तो हमें लगता है, लेकिन नई पीढ़ी के लिए तो यह सच को सच कहना है। आज की पीढ़ी में संबंधों को लेकर कोई दिखावा नहीं है। कभी-कभी मुझे भी लगता है कि यदि ये पीढ़ी प्रैक्टिकल है, तो क्यों न हम भी प्रैक्टिकल हो जाएं? हम भी किसी वृद्धाश्रम में अपना नाम दर्ज करवा के आजीवन वहां रहें।’

मैं बीच में बोलना तो नहीं चाहती थी, लेकिन मैंने तपाक से कहा, ‘क्यों पराए लोगों के बीच रहें? सारी जिंदगी अपनों के साथ रहे हैं, वहां तो इन्हें देखने को भी तरस जाएंगे।’

अर्चना जी ने कहा, ‘हां, ये सोच हमारी है, और इसी सोच के कारण ही तो हम सकारात्मक सोच के साथ अपने बच्चों से बंधे, उनके पास रहकर अच्छा-बुरा सहते जाने के लिए मजबूर हैं।’

अर्चना जी ने फिर कहा, ‘बुरा कुछ नहीं है। जो बात आज आपको मुंह खोल कर कही गई है, वह मुझे कितनी ही बार आंखें तरेर कर समझाई गई है। मेरी सलाह है, ‘एक बार भूल जाइए कि आप बेटे के घर में हैं।’ मैं भी भूल जाती हूं कि मैं बेटी पर आश्रित हूं। हम अपने घर में हैं, अपनों के बीच हैं। एक बात याद रखिए, हमारे किसी भी गलत निर्णय पर सदा अंगुली हमारी संतान पर ही उठेगी। क्या हम वह सह पाएंगे? हम इतने स्वार्थी कैसे हो सकते हैं?’

‘रही बच्चों की बात, आप और मैं इसे इतना सोचते हैं, बच्चे तो अपनी बात कहकर भूल भी जाते हैं। एक कटु सत्य शोभाजी हमारे बड़े-बूढ़े कह गए हैं कि सास तो मिट्टी की भी हो, तो बहू उससे दूर ही रहना चाहती है। हमें हमारी सोच बदलनी होगी। हम अपने शरीर से जितना कर सकते हैं, करते रहें। स्वयं को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रखने का प्रयास करें। हमारी सोच को और विचारों को हमारे तक ही रखें और नई पीढ़ी के साथ तालमेल बैठाने का प्रयास जारी रखें। बैठा सकें तो ठीक, अन्यथा उन्हें अपने हाल पर छोड़कर खुश रहने का प्रयास करें।’

‘आप जब घर से गुस्से में निकल आईं तो मैं विचार करने लगी, ‘अरे, मैं तो अब अकेली हो गई!’ और अपने अकेलेपन की कल्पना से घबरा उठी। नहीं, मैं आपको नहीं जाने दूंगी। आप भी यहीं रहेंगी। इसी घर में रहकर बहू को बेटी मानने का प्रयास करें, मैं जंवाई को बेटा मानने का प्रयास कर रही हूं।’

‘चलिए, आज से हम अपना-अपना स्थान बदलकर सोचें, दोनों रिश्तों के साथ नई पीढ़ी के व्यवहार के विषय में। आपको पता है, जंवाई के मुंह से जो बात अच्छी नहीं लगती, वह बेटे के मुंह से अच्छी हो जाती है, और बेटी के मुंह से जो बात ठीक लगती है, वह बहू के मुंह से कड़वी ज़हर समान लगती है।’

‘इसलिए हमें आपस में एक-दूसरे के संस्कारों पर अंगुली उठाने के बजाय, एक साथ एक-दूसरे का सहारा बनना है। हमें बच्चों का भी सहारा बने रहना है। आज हम बच्चों की किसी जिम्मेदारी को उठा लेंगे, तो कल बच्चे हमें संभाल ही लेंगे। इसलिए भगवान के लिए गुस्सा त्याग दो और अपनी अर्चना सखी की बात मान लो।’

शांत मन और प्रफुल्लित हृदय से दोनों सखियां हंसती-खिलखिलाती स्टेशन के बाहर निकलकर रिक्शे में बैठ गईं। अपने सुंदर नीड़ में लौटने के लिए। कहते हैं, नज़रिया बदलो, नज़ारे बदल जाएंगे। सोच बदलो, परिस्थितियां बदल जाएंगी। आज जीवन की संध्या में यही कहना चाहती हूं, समझौता, समर्पण, मजबूरी जैसे नकारात्मक शब्दों को परिवार से दूर रखें, देखें, जिंदगी कितनी आसान हो जाएगी।

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