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बराबर

लघुकथा

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‘हेलो मां, कैसी हो’ निशा ने चहक कर पूछा।

‘अच्छी हूं। तू कब आएगी। कितने दिन हो गए।’ सरिता देवी ने अधीर होकर पूछा।

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‘अगले हफ्ते आऊंगी। मेरे लिए दही बड़े बनाकर रखना।’

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‘ठीक है। ठीक है। पहले आ तो सही,’ कहकर सरिता देवी ने फोन काट दिया।

कई दिनों से सरिता देवी के मन में एक बात चल रही थी। निशा की छोटी बेटी पिंकी तीन साल की होने को आई। लेकिन निशा अगले बच्चे के बारे में कुछ संकेत नहीं कर रही थी। इस बार आते ही उससे बात करेंगी।

अगले हफ्ते निशा पिंकी और जीवा के साथ आ पहुंची।

‘निशा, छोटी तीन साल की होने को आई। अगला बच्चा कब करेगी तू।’ बेटी के ससुराल से आते ही सरिता देवी ने सिक्के की माफिक प्रश्न उछाल दिया।

‘मां शुक्र मनाओ, मैंने तो दो बच्चियां कर ली। मेरी जेठानी को देखो, एक बच्चे के बाद ही ब्रेक लगा दिया,’ निशा ने बड़ी सहजता से कहा। इस पर सरिता देवी कुछ रोष से बोलीं, ‘जेठानी के तो लड़का है। अकेला ही सही। उनका वंश आगे बढ़ जाएगा। पर तेरे तो दो लड़कियां हैं।’

‘तो क्या मेरी दो लड़कियां एक लड़के के भी बराबर नहीं!’

‘लड़का लड़का होता है और लड़की लड़की। दोनों बराबर नहीं हो सकते,’ सरिता देवी गुस्से से उबल पड़ीं।

‘नहीं मां, लड़का और लड़की अब बराबर होते हैं और अगर नहीं, तो मेरी दो लड़कियां दस लड़कों के बराबर हैं मेरे लिए’ निशा ने दृढ़ता से कहा।

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