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पर्यावरण का प्रश्न

कविता

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धूप अब सिर्फ धूप नहीं रही,

वह जलती हुई चेतावनी है,

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जो हर दोपहर

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धरती की छाती पर रख दी जाती है।

पेड़ों की छांव सिकुड़ रही है,

नदियां अपने ही किनारों में

प्यास से फट रही हैं।

हवा में अब वह गंध नहीं

जो बारिश से पहले

मिट्टी गुनगुनाती थी।

पक्षी

आसमान से गिर रहे हैं—

जैसे किसी ने

उनके पंखों से हवा छीन ली हो।

वे चुप पड़े हैं तारों के नीचे,

जहां कभी उनका संगीत

सुबहों को जन्म देता था।

पहाड़ भी अब अमर नहीं लगते।

उनकी देह में दरारें हैं,

पत्थरों के भीतर

बारूद और लालच का कंपन है।

वे टूटते हैं,

तो सिर्फ चट्टानें नहीं गिरतीं,

गिरता है सदियों का संतुलन।

खेतों में हरियाली कम,

कर्ज़ के कागज़ ज्यादा उग रहे हैं।

एक किसान

रात को बीज नहीं,

अपनी अंतिम उम्मीद बोता है।

सुबह अख़बार में

उसकी मौत एक छोटी-सी

खबर बन जाती है।

और शहर—

वे अब भी जगमगा रहे हैं,

मानो सब कुछ सामान्य हो।

मानो पृथ्वी का बुखार

एयर कंडीशनरों से

छिपाया जा सकता हो।

लेकिन धरती याद रखती है

हर कटे हुए पेड़ की चीख,

हर सूखे कुएं की खामोशी,

हर किसान की टूटी हुई नींद।

एक दिन,

जब आख़िरी पक्षी भी

उड़ना छोड़ देगा,

तब शायद मनुष्य समझेगा—

कि पर्यावरण कोई विषय नहीं था,

वह हमारा ही श्वास था।

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