शिवाकांत शुक्ल की पुस्तक ‘देहात से डीयू तक’ उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव की धूल भरी गलियों से निकलकर दिल्ली विश्वविद्यालय तक पहुंचने की कहानी है। यह सफर केवल स्थान बदलने की कथा नहीं, बल्कि दो बिल्कुल अलग सामाजिक और सांस्कृतिक दुनियाओं के बीच की दूरी तय करने का अनुभव भी है। पुस्तक पढ़ते हुए लगता है कि लेखक अपनी कहानी के साथ-साथ उन लाखों युवाओं की कहानी भी कह रहे हैं, जो छोटे शहरों और गांवों से बड़े सपने लेकर महानगरों की ओर आते हैं।
पुस्तक का शुरुआती हिस्सा गांव के परिवेश, पारिवारिक माहौल और उन परिस्थितियों को सामने लाता है, जिनके बीच लेखक के सपनों ने आकार लिया। गांव की मिट्टी, खेत, चौपाल और परिचित चेहरों की स्मृतियां आगे चलकर दिल्ली के अनजान और तेज़ रफ़्तार माहौल के बरक्स खड़ी दिखाई देती हैं। यही भावनात्मक द्वंद्व पुस्तक को महज़ आत्मकथा या संस्मरण बनने से बचाता है। लेखक के लिए डीयू केवल एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि एक बिल्कुल नई दुनिया है। यहां भाषा, परिवेश, जीवनशैली और सामाजिक व्यवहार के स्तर पर सामने आने वाली चुनौतियां उन्हें लगातार अपने भीतर झांकने के लिए मजबूर करती हैं।
पुस्तक में दिल्ली की चकाचौंध के साथ-साथ उसकी कड़वी सच्चाइयों को भी जगह मिली है। महानगर का अकेलापन, भाषा की बाधा और अस्तित्व का संकट उन विद्यार्थियों की वास्तविक परेशानियां हैं, जिन्हें लेखक अपने व्यक्तिगत अनुभवों के ज़रिए पाठक के करीब ले आते हैं। इस तरह, दिल्ली केवल सपनों की मंज़िल के रूप में सामने नहीं आती, बल्कि वह संघर्ष और आत्मखोज की ऐसी भूमि भी बन जाती है, जहां नए परिवेश में अपने लिए जगह बनाने की चुनौती लगातार बनी रहती है।
पुस्तक : देहात से डीयू तक लेखक : शिवाकांत शुक्ल प्रकाशक : प्रवासी प्रेम पब्लिशिंग, भारत, गाजियाबाद पृष्ठ : 96 मूल्य : रु. 275.

