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अवरोह

लघुकथा

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चित्रांकन संदीप जोशी
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उनका अड़सठ साला शरीर दिल्ली से बंगलौर तक के सफर में एकदम चरमरा गया था। उन्हें चलने में दिक्कत आ रही थी। उनकी बेटी यहां बंगलौर में तीन-चार साल से जॉब कर रही थी। वे पहली बार बंगलौर आयेे थे और बेटी का घर ढूंढ़ रहे थे। दो दिन पहले यूएस में रह रहे उनके अपने बेटे विनय से फोन पर बात हुई थी। उनकी बातों को विनय ने मजाक में ही उड़ा दिया था।, ‘मैं अड़सठ साल का हो गया हूं पर अभी तक दोनों बच्चों की शादी नहीं कर पाया हूं। तुम सैंतीस के और तुम्हारी बहन एकतीस साल की हो गई है। तुम्हारी और तुम्हारी बहन की शादी करके अपना फर्ज पूरा कर लूं तो गंगा नहाऊं?’

हंसते-हंसते दोहरा हुआ जा रहा था विनय मेरी शादी और आपका फर्ज...? गंगा नहाना है तो आज ही हरिद्वार चले जाइये। और गंगा नहा लीजिये। कौन रोकता है। आप ही तो कहते थे तुम्हें बहुत ऊंचा उठना है। ऊंचाइयों को पावों के नीचे लाना है। मैं पांच करोड़ के पैकेज पर पहुंचा हूं। अब मेरा लक्ष्य दस करोड़ के पैकेज का है।

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‘ठीक है पर शादी भी जरूरी है। शादी करके सैटल हो जाओ फिर जो चाहो करो?’

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पापा मेरी लाइफ में एक लड़की है। अभी हम एक-दूसरे को जांच-परख रहे हैं। जब मन होगा तब शादी कर लेंगे। आप हमारी शादी क्या करेंगे? लाइफ हमारी है। मां-बाप का फर्ज-वर्ज ये सब बेकार पुरानी सोच है। फोन कट गया था।

बेटे के शब्दों ने उन्हें काट-छील कर ऊंचाइयों और गहराइयों के बीच लटका दिया था। अपने जीते जी वे बेटे की न सही कम से कम बेटी की शादी तो कर ही जायें यह सोचकर वे बंगलौर रह रही अपनी बेटी के घर चले आये थे। उन्हें आया देखकर बेटी हैरान हुई। उन्होंने अपने आने का मकसद उसे बताया तो वह खिलखिलाने लगी, ‘क्या पापा आप मेरा कन्यादान करेंगे? मैं कोई चीज हूं जो मेरा दान करोगे। मुझे किसी ऐरे-गैरे को दान में दे दोगे। शादी करके अपना फर्ज पूरा करके खुद स्वर्ग जाना चाहते हो और मुझे शादी के नर्क में धकेलना चाहते हो आपने ही तो हमें ऊंचाइयों से भी ऊंचा उठने के लिए प्रेरित किया और अब आप ही मुझे शादी करके सैटल हो जाने के लिए कह रहे हैं। सैटल मतलब नीचे बैठ जाना और बंध जाना? अभी तो मुझे बड़ी-बड़ी कंपनियों के ऑफर आने शुरू हुए हैं और अब आप...?’

‘उन्होंने समझाना चाहा शादी की भी एक उम्र होती है।’

‘नहीं पापा ये बेकार और पुरानी सोच है। शादी की कोई उम्र नहीं होती। कभी भी कर सकते हैं?’

उन्होंने इधर-उधर नजर दौड़ाई और कहा, ‘अकेली ही तो हो? इतना बड़ा फ्लैट लेने की क्या जरूरत थी?’

‘अकेली कहां? मैं तो पिछले तीन साल से मैं एक फ्रेंड के साथ लिव-इन में रह रही थी।’ एकाएक मर्यादाओं, मूल्यों, परंपराओं और संस्कारों के मजबूत शिखर टूट कर पिता के ऊपर आ गिरे।

बेटी ने आगे कहा एक हफ्ता पहले मेरा उस फ्रेंड से ब्रेकअप हो गया है। लेकिन डॉन्ट वरी पापा। मैंने ‘मूव ऑन’ कर लिया है। मेरा एक नया फ्रेंड दो-तीन दिन में मेरे साथ रहने आ जाएगा। आप अपनी पुरानी सोच छोड़ दीजिये।’

‘बेटी हमारी पुराने शादी-ब्याह, रीति-रिवाजों के पीछे बहुत पुख्ता वैज्ञानिक सोच थी। हमारी सोच पुरानी सही पर तुम्हारी तो कोई सोच ही नहीं है। उसी वैज्ञानिक दृष्टि से ही पता चलता है कि कहां, कब कितने पंख फैलाने हैं और कब कहां समेटने हैं। पहले देख तो लो ऊंचाइयों की तरफ उठ रहे हो या गहराइयों में गिर रहे हो?’

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