बचपन से ही सस्ती कीमत और समृद्ध सामग्री वाली पुस्तकों के रूप में सस्ता साहित्य मण्डल से परिचय रहा, तो अध्यापक बनने के बाद विद्यार्थियों को कम खर्च में दीर्घकालीन लाभ के पुरस्कार के रूप में पुस्तकें देते समय सस्ता साहित्य मण्डल ही ध्यान में आता था। अब प्रस्तुत पुस्तक ‘नानी की डायरी’ को देखकर लगा कि अब सस्ता साहित्य मण्डल भी उतना सस्ता नहीं बचा। यह बड़ी सोच वाली व्यवस्था का काम होता है कि वह भौतिक प्रदर्शन से बचते हुए अपने संसाधनों का उपयोग जनमानस की वैचारिकता को संवारने के लिए करे। इसी से कोई समाज सच्चे अर्थों में समृद्ध बनता है।
कृषि व्यवस्था से निकलकर यंत्रीकृत और केन्द्रीयकृत अर्थव्यवस्था में आने से सारे संसार में पारिवारिक और मानवीय मूल्यों का मजबूरन क्षरण हुआ है और उसी पीड़ा से उपजी हैं ये कहानियां। इनका मूल स्वर एक गहन पीड़ा है और इस पीड़ा का कोई तत्काल हल भी नजर नहीं आता। इसलिए ये कहानियां एक गहरी उदासी और थकान से भरी हुई लगती हैं और इसी कारण इनमें कहानी वाला परंपरागत रोमांच नहीं है। लेकिन इसी कारण ये कमतर नहीं मानी जा सकतीं क्योंकि ये सच्चाई और मानवीय पीड़ा से संपृक्त हैं।
‘नानी की डायरी’ वाली शीर्षक कहानी में जैसे नानी पुत्रों की तरह पुत्रियों के समान अधिकार तक की साहसिक यात्रा की मंजिल तक पहुंचती है, वह आशाजनक भी लगता है।
कहानियां कोई तत्काल हल देने की बजाय स्थिति की ओर ध्यान आकर्षित करती हैं, चाहे वे मुद्दे सामाजिक हों, पर्यावरण के हों या भावनात्मक; ये हमारे इसी जीवन-जगत से सीधे-सीधे जुड़े हुए हैं।
पुस्तक : नानी की डायरी लेखिका : उर्मिला शिरीष प्रकाशक : सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन, नयी दिल्ली पृष्ठ : 144 मूल्य : रु. 550.

