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दिसंबर

कविता

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मुझे तुम फिर

रुलाने आ गए हो,

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जनवरी के बहाने,

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आ गये हो।

कहां टूटा, कहां ख़ाली,

मुझे फिर से

बताने आ गये हो।

मिला था जो,

जनवरी में पिछली वाली,

वो वापस जा चुका,

अब उसको क्यों

बुलाने आ गये हो।

तुम्हारा नाम लेकर

सोचता हूं,

लुट गये ख़्वाब सारे

जनवरी के,

मुझे क्यों ये

बताने आ गये हो।

मोहब्बत के गिले-शिकवे,

अदावत की कहानी,

फ़रवरी में ही छूटी,

निभ ना पाई , मार्च तक भी,

अब उसको दोहराने

आ गये हो।

गर्मियां क्या बतायें

कैसी बीतीं, शहर में

आग बरसी, और फिर

बाढ़ का ग़म,

उन यादों को

जगाने आ गये हो।

मैं इतना बेरहम तो था नहीं,

पर याद रखा,

मुझे मुझसे मिलाने

आ गये हो।

जरा-सा वक्त तो देते,

अभी तो सर्दियां हैं,

रुक के जाना,

ये कैसा खेल है,

की, फिर रुलाने

आ गये हो।

अब तुमको क्या बतायें,

कहां से गुजरता आया है,

मौसम ज़िंदगी में,

जनवरी को

जगाने आ गये हो।

दिसंबर,

मुझे तुम फिर

रुलाने आ गए हो,

जनवरी के बहाने,

आ गये हो।

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