मुझे तुम फिर
रुलाने आ गए हो,
जनवरी के बहाने,
आ गये हो।
कहां टूटा, कहां ख़ाली,
मुझे फिर से
बताने आ गये हो।
मिला था जो,
जनवरी में पिछली वाली,
वो वापस जा चुका,
अब उसको क्यों
बुलाने आ गये हो।
तुम्हारा नाम लेकर
सोचता हूं,
लुट गये ख़्वाब सारे
जनवरी के,
मुझे क्यों ये
बताने आ गये हो।
मोहब्बत के गिले-शिकवे,
अदावत की कहानी,
फ़रवरी में ही छूटी,
निभ ना पाई , मार्च तक भी,
अब उसको दोहराने
आ गये हो।
गर्मियां क्या बतायें
कैसी बीतीं, शहर में
आग बरसी, और फिर
बाढ़ का ग़म,
उन यादों को
जगाने आ गये हो।
मैं इतना बेरहम तो था नहीं,
पर याद रखा,
मुझे मुझसे मिलाने
आ गये हो।
जरा-सा वक्त तो देते,
अभी तो सर्दियां हैं,
रुक के जाना,
ये कैसा खेल है,
की, फिर रुलाने
आ गये हो।
अब तुमको क्या बतायें,
कहां से गुजरता आया है,
मौसम ज़िंदगी में,
जनवरी को
जगाने आ गये हो।
दिसंबर,
मुझे तुम फिर
रुलाने आ गए हो,
जनवरी के बहाने,
आ गये हो।

