अंधेरे से सितारे का द्वंद्व : The Dainik Tribune

पुस्तक समीक्षा

अंधेरे से सितारे का द्वंद्व

अंधेरे से सितारे का द्वंद्व

सुशील ‘हसरत’ नरेलवी

पेशे से पत्रकार व हृदय से कवि राम जन्म पाठक का प्रथम काव्य-संग्रह ‘डूबता है एक सितारा और’ में 74 कविताओं का समावेश है, जिनमें एकाकीपन की ज़मीन पर उदास पलों की नमी, चुभन, कचोट, खीझ, अपना दामन पसारती है तो प्रेम-वेदना से ग्रसित कविमन इन कविताओं में प्रेयसी के लावण्ययुक्त हृदय-स्पर्शी शाश्वत मर्म को नकारते हुए प्रेम-पीड़ से उत्पन्न क्षुब्धता को माथे से लगाता है।

कृषक, मज़दूर वर्ग की विभिन्न विषम परिस्थितियों में जन्म लेती जिजीविषा का सुन्दर व सकारात्मक पक्ष उजागर करता है कवि। हलवाहा’, ‘कामवालियां’ तथा अन्य कविताएं इस मत को सार्थक करती हैं।

महानगर की व्यथा-कथा भी इन कविताओं में अंगड़ाई लेती है और ऐसे दृश्य मस्तिष्क-पटल पर अंकित करती है कि लगने लगता है चहूं ओर मायूसी, संघर्ष, उठापटक, बहुत कुछ पीछे छूटने की कसक, आगे बढ़ने की ललक जीवन के पर्याय बन चुके हैं किन्तु कुछ कविताओं में निहित कंगाली की ठसक कुछ ओर ही बयां करती है।

कविता ‘रात’ से कवितांश- ‘सुलतानी शमशीर रही सपनों का सीना चीर/ और, रात लट लटकाए शयनातुर हो गई है’ तथा ‘रात अभी अपना रातपन बढ़ाएगी, गढ़ाएगी अभी और दुख की चासनी’ तो ‘जिन्हें काटनी होती होगी रात/ रात कितना काटती होगी उन्हें।’ कविता ‘वह’ से- ‘वह पहली बार रोई/ तो अपने लिए प्रेम/ पाना चाहती थी/ और दूसरी बार रोई/ तो प्रेम लौटाना।’

ये कविताएं नगण्य की ओर सांकेतिक तारतम्य भी बैठाती नज़र आती हैं। काव्यानुरूप भाषा और इसमें कुछ आंचलिक शब्दों का इस्तेमाल बहुत खूबसूरती से हुआ है।

पुस्तक : डूबता है एक सितारा और कवि : राम जन्म पाठक प्रकाशक : परिन्दे पब्लिकेशन, नयी दिल्ली पृष्ठ : 88 मूल्य : रु. 250.

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