शतायु के पड़ाव में सरोकारों का सृजन : The Dainik Tribune

शतायु के पड़ाव में सरोकारों का सृजन

शतायु के पड़ाव में सरोकारों का सृजन

अरुण नैथानी

पटियाला के महेंद्रा कालेज में छात्र संपादक के रूप में रमेश चंद्र को जो लिखने की लगन लगी वो आज उम्र के दसवें दशक में भी बदस्तूर जारी है। रमेश चंद्र शर्मा 95 वर्ष की उम्र में सचेतन, लेखन में सक्रिय और जागरूक हैं। देश-दुनिया के एक ज्वलंत विषय पर केंद्रित अपने पांचवें उपन्यास को लिखने में रत हैं। जिंदगी से कोई-शिकवा शिकायत नहीं है। पुरस्कारों को लेकर कोई गिला-शिकवा नहीं है। आर.सी. शर्मा के नाम से भी लेखन करने वाले इस उदारमना लेखक का मानना है कि जिनको बड़े पुरस्कार मिले, जाहिर है उनका लेखन उम्दा होगा। मुझे जिन्होंने पुरस्कार दिये, वे विद्वान लोग थे। मैं सृजन को दैवीय आशीर्वाद मानता हूं। सरस्वती की कृपा मानता हूं। मैं किसी लेखन को अच्छा-बुरा नहीं कहता। जब व्यक्ति समय के समाज के बारे में सोचता है और उसे सरस्वती की कृपा मिलती है, तभी कोई लिख पाता है। मैं किसी के लेखन की आलोचना नहीं करता। लेखन करना हर किसी के बस की बात नहीं है। शिमला के प्रसिद्ध कथाकार एस.आर. हरनोट ने भी कहीं लिखा है कि मैंने आर.सी. शर्मा को किसी लेखक की बुराई करते नहींसुना है।

वैसे उनके बारे में यह कहना कठिन है कि वे अच्छे प्रशासनिक अधिकारी थे या अच्छे साहित्यकार हैं। परवाणु के निकट स्थित ऐतिहासिक गांव टकसाल में जन्मे रमेश चंद्र शर्मा के पिता महेश दत्त शर्मा इलाके के जाने-माने वैद्य थे। मां श्रीमती भागवंती शर्मा के जीवन व संस्कारों ने उन्हें गहरे तक प्रभावित किया। एक रचना पर उनकी मां का पूरा प्रभाव भी रहा। दो भाइयों व एक बहन में बड़े भाई शर्मा ने जीवन में कठिन मेहनत से अपना मुकाम हासिल किया। वे बताते हैं कि आजादी से पहले गांव में स्कूल नहीं था और हम पैदल पढ़ने कालका जाते थे। पिताजी का एक आयुर्वेदिक क्लीनिक था। एक बार मेरे घर मेरे शिक्षक आये थे तो पिताजी ने उनसे कहा कि मैं अपने बेटे को डी.सी. बनाना चाहता हूं। मैं पिता के साथ सख्त व्यवहार के चलते सहज नहीं था, लेकिन पिता की इच्छा को मैंने मन में गांठ बांध के रख लिया।

कालांतर में वे 1973 कैडर के आईएएस अधिकारी बने। उन्हें प्लानिंग व डेवेलपमेंट विभाग का ओएसडी बनाया गया। हिमाचल में कई जिलों में डीसी रहने के अलावा विजिलेंस व प्रशासनिक सेवा में उन्होंने कई महत्वपूर्ण दायित्व निभाए। इससे पहले कालका से मैट्रिक करने के बाद उन्होंने महेंद्रा कालेज पटियाला से स्नातक, शिमला से एमए अर्थशास्त्र तथा दिल्ली विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई पूरी की। मैट्रिक के बाद महेंद्रा कालेज को पढ़ाई के लिये चुनने की वजह वे यह बताते हैं कि मेरे ताया जी महाराजा पटियाला के राजवैद्य थे। चचेरे भाई हरि शर्मा महाराज के साथ मंत्री थे। उनका आग्रह था कि मैं उनकी छत्रछाया में पढ़ूं। वर्ष 1945 में स्नातक की पढ़ाई का जिक्र वे करते हैं। फिर उन्होंने देश की आजादी व विभाजन का दौर भी देखा।

अक्सर देखने में आता है कि छात्र जीवन के दौरान साहित्य सृजन करने वाले प्रशासनिक अधिकारी बड़ी जिम्मेदारी के बाद रचनाकर्म से दूर हो जाते हैं। लेकिन आप जीवन के दसवें दशक में भी सृजनरत हैं, ये कैसे संभव हुआ? इस पर वे पुराने काॅलेज-जीवन को याद करते हैं कि महेंद्रा कालेज में बीए करते वक्त मैं हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. माधव राम शैवाल के संपर्क में आया। वे हिंदी के अच्छे कवि और मान्य विद्वान थे। उन्होंने मुझे कॉलेज मैगजीन का संपादक बनाया। इससे मेरा जहां हिंदी के प्रति लगाव बढ़ा, वहीं सृजन के प्रति उत्साह जगा। उनकी विद्वत्ता का स्तर ये था कि उन्होंने गुरु रवींद्रनाथ टैगोर की नोबेल पुरस्कार-प्राप्त रचना ‘गीतांजलि’ को लेकर बहस की चुनौती को स्वीकार किया था।

रमेश चंद्र शर्मा ने कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक व साहित्य की अन्य विधाओं में अधिकारपूर्वक लिखा। यह पूछे जाने पर कि यदि वे पूर्णकालिक साहित्यकार होते तो बेहतर रचनाएं सामने आतीं? वे स्वीकारते हैं कि पूर्णकालिक सृजन से पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन होना आज भी मुश्किल है। बहरहाल, मुझ पर सरस्वती की कृपा सदा बनी रही। हां, वर्ष 1987 में प्रशासनिक सेवा से मुक्त होने के बाद में मन का लिख सका। इस बीच पत्नी के विछोह की टीस इस बातचीत में रह-रहकर उभर आती है। वे मानते हैं कि यदि मैं बेहद व्यस्तता की प्रशासनिक सेवा में इतना लिख पाया तो उसमें मेरी पत्नी की बड़ी भूमिका रही है। लेखक जब कुछ लिखता है तो यदि कोई सुनने वाला हो तो उसकी प्रतिक्रिया से उसमें गुणात्मक सुधार आता है। मेरी पत्नी पुष्पा शर्मा मेरी आलोचक भी थीं तो प्रोत्साहन देने वाली भी। घर-परिवार को उन्होंने संभाला और मुझे लेखन के लिये प्रेरित किया। मैं रात-रात जागकर लिखता क्योंकि आफिस में फाइलों में डूबा रहता था। बच्चों को पता भी नहीं चलता था कि मैं घर भी आया हूं। आज बेटा चेतन बड़ा इंजीनियर बना और बेटी वैज्ञानिक तो उसी का योगदान है। वे बताते हैं कि बेटे चेतन का एक नाटक आकाशवाणी से प्रसारित हुआ था। मेरी पोती भी साहित्य में रुचि रखती है।

बहरहाल, 95 वर्ष की आयु में आज वे पुरानी रचनाओं को छांटने में लगे हैं। कहते हैं इतना लिखा कि कई ट्रंक भर गये। बदलते वक्त में इनकी कौन रखवाली करेगा। पांडुलिपियां छांट रहा हूं। कुछ अच्छे निबंध प्रकाशक को भेजे हैं। मैं चाहता हूं कि मेरे बाद इन रचनाओं का समाज में उपयोग हो सके। दरअसल, बदलते वक्त के साथ लोगों की अभिरुचियों में बदलाव आया है। सूचना विस्फोट के युग में नकारात्मक की दखल भी बढ़ी है। शोर-शराबा ज्यादा है।

आपके जो लेखन की अभिरुचि है ये स्वार्जित है या आप इसे पूर्व के संस्कार मानते हैं। ऐसा क्या था जिसने आपको लिखने के लिये प्रेरित किया? शर्मा कहते हैं कि मैं इसे परिवार के संस्कार मानता हूं। जीन का प्रभाव है। परदादा कविता कहते थे। हिंदुस्तानी में कहते थे। वर्ष 1948 में उनका निधन हुआ तो यादें ताजा हैं। पिता जी को भी शायरी पढ़ने का शौक था। मुझे लगता है कि संस्कार व संवेदना सृजन को प्रेरित करती हैं।

आमतौर पर प्रशासनिक अधिकारी अंग्रेजी को ही सृजन का आधार बनाते हैं, आपने हिंदी को प्राथमिकता दी, क्या वजह रही? ऐसा नहीं था कि मेरी अंग्रेजी अच्छी नहीं थी। विभागीय काम अंग्रेजी में करता था। फाइलों पर नोट्स लिखता था। लेकिन जो अभिव्यक्ति हिंदी में संभव है, वह अंग्रेजी में नहीं। मैंने जो लिखा वह अंग्रेजी में संभव नहीं था। हां, एक कहानी महेंद्रा कॉलेज के दौरान अंग्रेजी में जरूर लिखी थी।

वे बताते हैं कि हिंदी का सृजन पाठकों के दिल को जोड़ता है। एक बार डायरेक्टर विजिलेंस था, एक जरूरी फैसला लिख रहा था। तभी एक आदमी आया और मेरे मेज के नीचे पैरों पर पड़ गया। मैंने पूछा बताओ क्या कोई तकलीफ। बोला- आपकी रचना ‘बर्फ की राख’ पर मुझे पीएचडी मिली है। मैं पहले आपके गांव गया था क्योंकि किताब में गांव का एड्रेस था। उसने मुझे जो इज्जत दी है, उसे मैं पुरस्कारों से बड़ा अचीवमेंट मानता हूं।

आपकी चर्चित रचना ‘परग्रही’ की कथावस्तु क्या थी? परग्रही के रूप में हम एलियन्स की कल्पना करते हैं। उसकी आदमी जैसी शक्ल नहीं। इस परिग्रही उपन्यास में मैंने परलोक से आने वाली अप्सराओं उर्वशी व मेनका को चुना है। मेरा मानना था कि परग्रही लोग सुंदर व संस्कारित थे।तीन नाटकों में मैंने नये विषयों को चुना है।

आप सौभाग्य से शतायु होने की ओर उन्मुख हैं। आप लंबी उम्र का क्या राज़ मानते हैं? मैं तो ईश्वर से कहता हूं कि लंबी उम्र दे, तो सचेत मस्तिष्क भी दे। चलने-फिरने की शक्ति भी दे। काबिल जीवन दे अन्यथा जीवन देने वाले को वापस बुला देना चाहिए।

आपने बाल साहित्य भी लिखा है। उनके लिये क्या कहना चाहते हैं? ये जो हमारे नई पीढ़ी के बच्चे हैं उन्हें स्कूल वक्त से ही हमारे पुराने साहित्य से परिचित कराया जाये। प्रार्थना के बाद छोटी-छोटी कहानियां सुनाई जायें। उससे उनमें साहित्य का शौक पैदा होगा। उनके संस्कारों में वृद्धि होगी। मैं चाहता हूं कि भारत के बच्चों के संस्कारठीक रहें।

सृजन-संसार

पहले उपन्यास ‘बर्फ की राख’ समेत शर्मा ने चार उपन्यास लिखे। पांचवें उपन्यास ‘एक अंगूठी तीन हाथ’ को वे अंतिम रूप देने के प्रयास में हैं। ‘परग्रही’ उपन्यास भी विषय को लेकर चर्चा में रहा। कथा अंत की ओर नाटक संग्रह भी पढ़ा गया। उनके कहानी संग्रह पगध्वनियां (1968), कैक्टस के फूल (1988) की भी चर्चा हुई। काव्य संग्रह निर्जीव चांदनी (1987) व एक स्वरता (1999) को पाठकों का अच्छा प्रतिसाद मिला। उनके रचनाकर्म पर पीएचडी व एम.फिल भी हुई है।

पुरस्कार

रमेश चंद्र शर्मा के सृजन को अनेक पुरस्कार मिले हैं। हिमाचल की कला, संस्कृति, भाषा अकादमी द्वारा 1983 में उपन्यास ‘बर्फ की राख’ के लिए ‘साहित्यकार पुरस्कार’ मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने प्रदान किया। उनके सृजन को हिमाचल के संस्थापक मुख्यमंत्री वाईएस परमार का सकारात्मक प्रतिसाद मिला था। वहीं राज्य सरकार के संस्कृति एवं भाषा विभाग की ओर से ‘पांचाली’ उपन्यास के लिये ‘श्री चन्द्रधर गुलेरी राज्य सम्मान’ 1997 में मिला।

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