मुग़ल आक्रांता बाबर के एक सेनानायक मीर बाकी ने अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि मंदिर को खंडित कर उसके स्थान पर मस्जिदनुमा एक ढांचा खड़ा करवा दिया। इसमें कभी नमाज़ पढ़ी गई हो या नहीं, स्पष्ट नहीं। परंतु जैसा कि उर्दू शायर इक़बाल ने लिखा है—‘मस्जिद तो बना ली शब भर में ईमान की हरारत वालों ने, मन अपना पुराना पापी था, बरसों में नमाज़ी बन न सका।’ यह ढांचा बरसों तक वीरान और त्यक्त रहा। मुस्लिम पक्ष का दावा था कि यह मस्जिद है, जबकि हिन्दू पक्ष का विश्वास था कि यह भूमि रामलला की जन्मस्थली है।
मंदिर-मस्जिद का यह विवाद लगभग पांच सौ वर्षों तक चलता रहा। इस दौरान अनेक उतार-चढ़ाव आए। दोनों पक्षों ने अपने-अपने समर्थन में तथ्य, तर्क, पुरातात्विक साक्ष्य और ऐतिहासिक प्रमाण प्रस्तुत किए। हमारे कुछ सेकुलरवादियों ने तो श्रीराम और उनसे संबंधित उपलब्ध समस्त जानकारी को काल्पनिक और मिथ्या सिद्ध करने तक का प्रयास किया। किंतु ऐतिहासिक तथ्यों और पुरातात्विक साक्ष्यों ने इस धारणा का निर्मूलन कर दिया। डॉ. राकेश तिवारी ने अपनी पुस्तक ‘जिरह अजुधिया’ में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद से संबंधित संपूर्ण अदालती प्रक्रिया का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया है।
उक्त विवाद के सिलसिले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के आदेशानुसार किए गए विवादित स्थल के पुरातात्विक सर्वेक्षण से यह निष्कर्ष निकला कि वहां बना हुआ ढांचा बारहवीं शताब्दी के एक हिन्दू मंदिर की नींव पर खड़ा था। उसमें प्रयुक्त वास्तु-सामग्री का कुछ भाग भी खंडित मंदिर का ही था।
सम्यक प्रमाणों पर समुचित विचार के पश्चात सर्वोच्च न्यायालय ने मंदिर के पक्ष में अपना निर्णय सुनाया।
इस संदर्भ में पुराविदों और कुछ इतिहासकारों की भूमिका उल्लेखनीय रही, जिन्होंने पूर्ण निष्ठा और निष्पक्षता के साथ अपने दायित्व का निर्वहन किया। समीक्ष्य पुस्तक ‘जिरह अजुधिया’ में मंदिर-मस्जिद विवादित स्थल के उत्खनन से लेकर उसकी रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने तक की संपूर्ण प्रक्रिया का ब्यौरेवार उल्लेख है। यह सारा कार्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निदेशक डाॅ. राकेश तिवारी की देखरेख में हुआ। उन्होंने ही अदालत में इसकी पैरवी भी की। लेखक ने अपनी दलीलों को प्रासंगिक तथ्यों से पुष्ट करते हुए प्रस्तुत किया है, जिससे सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का मार्ग भी प्रशस्त हुआ।
बात को कहने का डॉ. तिवारी का अपना विशिष्ट ढंग है। अदालती कार्यवाही जैसे रूक्ष और नीरस विषय को भी किसी कथा-कृति की तरह रोचक और सरस बनाने का कौशल उनमें देखा जा सकता है। ‘जिरह अजुधिया’ इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। उनकी भाषा में अवध और अवधी की महक है, साथ ही उसमें तंज़ और व्यंग्य का भी पुट है। ये सभी तत्व मिलकर रचना की पठनीयता को बढ़ाते हैं।‘जिरह अजुधिया’ एक अदालती दस्तावेज़ तो है ही, साथ ही विषय से संबंधित सामान्य जानकारी प्रदान करने वाली एक महत्वपूर्ण कृति भी है।
पुस्तक : जिरह अजुधिया - एक पुरातत्वविद की क़लम से लेखक : राकेश तिवारी प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन नयी दिल्ली पृष्ठ : 374 मूल्य : रु. 499.

