भ्रष्टाचार की अमरबेल पर चोट

पुस्तक समीक्षा

भ्रष्टाचार की अमरबेल पर चोट

कमलेश भारतीय

सुनील प्रसाद शर्मा के नये उपन्यास ‘विद्रोही पथिक’ में भ्रष्टाचार की अमर बेल पर चोट की गयी है। इस उपन्यास का नायक विमल कांवट आखिर भ्रष्टाचार से बुरी तरह परेशान होकर इसके खिलाफ जंग लड़ने की शुरुआत करता है, अपनी पत्नी हरलीन से मिलकर। लेखक ने इसीलिए उपन्यास का नाम ‘विद्रोही पथिक’ दिया और नायक विमल को विद्रोही बनाया।

उपन्यास का नायक विमल छोटी जाति और परिवार से होने के बावजूद बड़े सपने देखता है और उसकी प्रेमिका हरलीन हर कदम पर उसका साथ देती है। कोचिंग का काम करते-करते विमल के मन में एक होम्योपैथिक काॅलेज खोलने का विचार आता है ताकि गरीब आदमी सस्ता सुलभ इलाज पा सके। बस, इसी को बनाने और इसे चलाये रखने में कदम-कदम पर भ्रष्टाचार से लोहा लेना पड़ता है विमल को। बैंक से लोन लेने, कॉलेज को मान्यता दिलवाने और इस मान्यता को नये साल में रिन्यू करवाने के हर कदम पर भ्रष्टाचार से सामना करना पड़ता है। कॉलेज के लिए जब ह्यूमन कैडेवर यानी इंसानी लाशों के भी सौदे करते हैं अस्पताल तब नायक हक्का-बक्का रह जाता है। वही गोलू जो कॉलेज निर्माण के समय चौकीदार था एक इंसानी लाश के रूप में बिक कर पहुंच जाता है। इसी प्रकार सुशीला का शव भी बिकता है। आखिर जब कॉलेज की मान्यता में डायरेक्टर वैद दामोदर दास अड़ंगा लगा देता है क्योंकि उसे दस लाख नहीं दिये थे तब फाइल रूपी इस अड़ंगे को दूर करने के लिए पचास लाख की मांग की जाती है और विमल इसे देने की बजाय कोर्ट चला जाता है और वह जीत जाता है और हरलीन को वहां से वाट्सएप मैसेज करता है- सत्यमेव जयते।

पुस्तक : विद्रोही पथिक लेखक : सुनील प्रसाद शर्मा प्रकाशक : साहित्यागार, जयपुर पृष्ठ : 122 मूल्य : रु. 200.

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