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पहाड़ के सामाजिक विमर्श का मनन

पुस्तक समीक्षा

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उत्तरकाशी अंचल की रवांल्टी लोकभाषा में रचित ‘ज आम्म छांट नई’ वरिष्ठ लोककवि महाबीर रवांल्टा का एक संवेदनशील और विचारोत्तेजक काव्य संग्रह है। इस पुस्तक में 40 से अधिक कविताएं शामिल हैं, जो पहाड़ के समाज, परिवार और बदलती जीवन-प्रणाली के भीतर छिपे दर्द, संघर्ष और यथार्थ को प्रभावशाली ढंग से सामने लाती हैं। यह संग्रह केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि संयुक्त परिवार के विघटन और उससे उपजे सामाजिक तथा मानसिक सवालों का सशक्त दस्तावेज भी बनता है।

संग्रह का शीर्षक ही इसकी आत्मा को उद्घाटित करता है। ‘ज आम्म छांट नई’ का अर्थ है ‘अरी मां, तूने क्यों छोड़ दिया’। यहां ‘मां’ केवल जननी नहीं, बल्कि घर, परिवार, गांव और वह सामूहिक सामाजिक संरचना है, जिसके टूटने से व्यक्ति भीतर तक असहाय और अकेला पड़ जाता है। यह प्रश्न पूरे संग्रह में एक टीस, एक शिकायत और एक मौन प्रतिरोध की तरह बार-बार गूंजता है।

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‘जब हम अलग हुए’ जैसी कविताएं परिवार के बंटवारे के बाद पैदा हुई ईर्ष्या, स्वार्थ, असंतोष और आत्मकेंद्रित जीवन-शैली को अत्यंत सहज और मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं। मोबाइल में उलझते रिश्ते, बंटे हुए चूल्हे, कंधों पर ढोया गया जिम्मेदारियों का बोझ और गांव से शहर की बढ़ती दूरी जैसे दृश्य इन कविताओं को गहरे सामाजिक यथार्थ से जोड़ते हैं। रवांल्टी भाषा की लय, उसकी ठेठ शब्दावली और अनुभवजन्य सच्चाई इस संग्रह की प्रमुख शक्ति है।

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कहीं-कहीं कुछ भाव एक-दूसरे से मिलते-जुलते प्रतीत होते हैं, फिर भी लोकभाषा में गंभीर सामाजिक विमर्श रचने वाली यह पुस्तक एक सार्थक प्रयास है।

पुस्तक : ज आम्म छांट नई लेखक : महाबीर रवांल्टा प्रकाशक : समय साक्ष्य, देहरादून पृष्ठ : 80 मूल्य : रु. 120.

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