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विसंगतियों पर प्रहार से उपजी चेतना

पुस्तक समीक्षा

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व्यंग्य सिर्फ हंसाने के लिए नहीं होता। उसे पढ़कर हंसी आ जाए, वह अलग बात है। व्यंग्य का काम है विसंगति को खोलकर पेश करना। व्यंग्यकार अनिल सोनी यही करते हैं। समाज का पोस्टमार्टम ऐसे करते हैं, जैसे शव का पोस्टमार्टम किया जाता है। उनके व्यंग्य संग्रह का नाम है - शव संवाद।

शव के जैसी जड़ हो चली सामाजिक चेतना, बौद्धिक चेतना को रेखांकित करता यह व्यंग्य संग्रह कुछ अलग कुल-शील के व्यंग्य लेख प्रस्तुत करता है। अनिल सोनी लिखते हैं- ‘व्यंग्य ने बुद्धिजीवी को कड़वाहट से भर दिया या वह व्यंग्य को कड़वा बना रहा है, इसी छटपटाहट का नाम है—शव संवाद।’

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आश्चर्य यह कि मतभेद के श्मशानघाट नहीं होते, विडंबनाओं के कब्रिस्तान नहीं मिलते, फिर भी ढेरों विसंगतियां, खोखलेपन और पाखंड हमारी सामाजिक और राजनीतिक चेतना में अतिक्रमण कर चुके हैं। व्यंग्यकार कोई हंसने-हंसाने वाला प्राणी नहीं होता, भले उसकी बातें पढ़कर औरों को हंसी आ जाए। व्यंग्यकार मूलत: बेचैन आत्मा है, जो नाराज रहती है विसंगतियों को देखकर। अनिल सोनी बुद्धिजीवी पर व्यंग्य यूं करते हैं-‘बुद्धिजीवी यूं तो जिंदगी भर किसी तरह के झगड़े, पंगे और लड़ाई में नहीं पड़ा, लेकिन उसकी आंखों में आकर इक्का-दुक्का सपने आपस में उलझते रहे। यही वजह रही कि धीरे-धीरे बुद्धिजीवियों ने सपने छोड़े ताकि आंखें वास्तविकता को ही ठीक से देख लें। आजकल बुद्धिजीवी इसलिए परेशान है कि अब ऐसा समय आ गया है कि सही सोचना भी सपना लगता है।’

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सपने अब सामूहिक नहीं रहे, व्यक्तिगत हो गए । बचकर सुरक्षित निकल लें, यही अभीष्ट हो गया है। अनिल सोनी बुद्धिजीवी पर गहरा व्यंग्य कर रहे हैं। लेखक शव संवाद-19 में गहरी बात कहते हैं-‘कुछ लोगों का मानना है कि भारत में व्यस्तता के दो कारण हैं। या तो मनोरंजन में व्यस्त हैं या किसी त्रासदी से भी व्यस्त हो सकते हैं।’

यह लाइन बहुत गहरी है। त्रासदी को भी मनोरंजन बनाने में हमारे टीवी चैनल माहिर हैं और लोग उन पर चर्चाओं में फंसे रहते हैं, लगातार फंसे रहते हैं। नए-नए मुद्दे उछलते रहते हैं।

शव संवाद-37 में अनिल सोनी लिखते हैं—

‘एक उड़ता हुआ पोस्टर बुद्धिजीवी के करीब आया और उसके साथ ही चलने लग पड़ा। पोस्टर पहले भी बुद्धिजीवी के आसपास से गुजरे हैं, लेकिन इस बार यह अति गतिशील था। बुद्धिजीवी आज तक वहीं का वहीं , लेकिन तरह-तरह के पोस्टर उससे कहीं आगे निकल गए।’

मुद्दे असली हों, फर्जी हों, आगे निकल गए हैं, बुद्धिजीवी वहीं पर खड़ा हुआ है। ठिठका हुआ है। अनिल सोनी का यह व्यंग्य संग्रह बिल्कुल अलग तरह का है। मोटे तौर पर इसे व्यंग्य की शव साधना कहा जाना चाहिए।

पुस्तक : शव संवाद, व्यंग्यकार : अनिल सोनी प्रकाशक : साहित्य भारती, दिल्ली पृष्ठ : 168 मूल्य : रु. 595.

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