व्यंग्य विधा के सरोकार : The Dainik Tribune

पुस्तक समीक्षा

व्यंग्य विधा के सरोकार

व्यंग्य विधा के सरोकार

यश गोयल

साहित्यकार प्रभात कुमार (उपनाम संतोष उत्सुक) का नया व्यंग्य संग्रह ‘हमारे संज्ञान में नहीं आया है’ बहुत रोचक और मन मस्तिष्क पर गहरा असर छोड़ने वाला है। प्रभात ने अपने इस संग्रह में 52 लेख समाहित किये हैं जिनमें भरपूर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों की विसंगतियां उजागर की हैं।

प्रस्तावना के लेखक और जाने-माने व्यंग्य के स्तंभकार राजेंद्र धोड़पकर ने बहुत सादगी से लिखा है : ‘मैं लेखक (प्रभात) के साथ इस किताब के पाठकों से भी क्षमाप्रार्थी हूं, कि इस प्रस्तावना में कोई काम की बात नजर न आए और इसे पढ़ने का उनका श्रम बेकार महसूस हो।’

लेखक से दोस्ती निभाते हुए राजेंद्र ने स्पष्ट लिखा है, ‘प्रभात ऐसे व्यंग्यकार नहीं हैं। वे ऐसी नौकरी करते रहे हैं जिसमें व्यंग्य लिखना उनकी नौकरी का हिस्सा नहीं था। इसके बावजूद वे व्यंग्य लिखते रहे। वे शौकिया व्यंग्यकार नहीं हैं यह इस बात से जाहिर है कि उन्होंने बड़ी संख्या में व्यंग्य लिखे हैं और छपवाए हैं और पहले भी उनकी एक किताब छप चुकी है। इससे यह स्पष्ट होता है कि वे बतौर व्यंग्यकार अपनी भूमिका को लेकर बहुत गंभीर हैं। मैं यहां लेखक की प्रशंसा करने या किताब की समीक्षा लिखने की औपचारिकता नहीं निभा रहा हूं। यह अधिकार पाठक का है कि वह पढ़े और अपनी राय बनाए।’

प्रभात की हिम्मत काबिले तारीफ है कि उन्होंने राजेंद्र की प्रस्तावना को हूबहू किताब के प्रथम पृष्ठों पर जगह दी। प्रभात ने एक लंबी प्रस्तावना अशोक गौतम से भी लिखवायी। अशोक ने लिखा है, ‘प्रभात अपने व्यंग्यों के माध्यम से अपने पाठकों के मन मस्तिष्क को हिलाते, गुदगुदाते रहे हैं। उनके व्यंग्य सरल-सहज भाषा में पाठकों के बीच अपना स्थान तो बनाते ही हैं, साथ ही साथ इनके व्यंग्यों में उठाई समस्याएं नितांत हमारे आसपास की होती हैं।’

पुस्तक : हमारे संज्ञान में नहीं आया है व्यंग्यकार : प्रभात कुमार प्रकाशक : इंडिया नेटबुक्स, नोएडा पृष्ठ : 128 मूल्य : रु. 250.

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