थानेदार का चेहरा तमतमा आया जब कृतिका ने कहा कि वह घरेलू हिंसा के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाने आई है। थानेदार भुनभुनाया, ‘बस अब पुलिस का काम लोगों के घरेलू झगड़े निपटाने का रह गया है, जिसे देखो, मैडम घरेलू हिंसा की रिपोर्ट लिखवाने चली आ रही है।’ कृतिका के आगे कुछ कहने से पहले थानेदार ने एक महिला पुलिसकर्मी को बुलाया। वह आकर मेज के बाईं ओर पड़ी खाली कुर्सी पर बैठ गई। थानेदार ने पूछा, ‘अब बोलो क्या कम्प्लेन्ट है?’
‘सर, मैं एक एम.एन.सी. में काम करती हूं। साठ हजार महीना कमाती हूं। दस महीने पहले मेरी सुमित नाम के लड़के से लव मैरिज हुई थी। पहले वह भी नौकरी करता था। शादी के कुछ दिन बाद ही उसकी नौकरी छूट गई। तब से वह खाली घूम रहा है। पर ऐश-परस्ती में कोई कमी नहीं। घूमना-फिरना, मौज-मस्ती और रोजाना शराब पीने के बाद तो वह जैसे पागल ही हो जाता है। बात-बात पर मार-पिटाई करने लगता है। घर मेरा है। हर महीने किस्ते मैं भर रही हूं। कमाई मेरी। रोटी भी पका कर मैं ही देती हूं फिर भी मेरी पिटाई? मैं अपने घर पर सुरक्षित नहीं? कल वह अपने दो-तीन दोस्तों को भी बुला लाया। वो भी पीकर हल्ला-हुड़दंग करने लगे। मैंने विरोध किया तो मेरा पति मुझे डंडे से मारने लगा। मैं दो महीने की गर्भवती हूं। फिर भी...? इतना मारा कि मैं बेहोश हो गई। सुबह जाकर होश आई है?’
थानेदार नंगे सवालों पर उतर आया था, ‘फिर उन तीनों ने मिलकर क्या किया? शरीर पर नील और खरोचों के निशान...?’ उसने कहा, ‘वो तो नहीं पर शरीर पर जख्म मार-पिटाई के जख्म और नील के निशान हैं।’
थानेदार फिर बड़बड़ाया, ‘पहले पुरुष कमाते थे। औरतें दबकर रहा करती थीं। आजकल औरतें कमा रही हैं पर पुरुष...? दबकर रहने को तैयार नहीं? आगे का पता नहीं? देखते हैं इस केस में क्या कर सकते हैं...? इनका मेडिकल करवाना पड़ेगा?’
महिला पुलिसकर्मी ने कृतिका को परे ले जाकर समझाया। ‘सोच-समझकर कम्प्लेन्ट करो। एफ.आई.आर. रजिस्टर्ड न करवाना। वैसे इस कच्ची शिकायत पर हम थोड़ी-बहुत कार्रवाई तो करेंगे ही। थानेदार ने सुमित को बुलवा कर उसकी डंडा परेड कर देनी है। या कुछ ले-देकर छोड़ देना है। तुम अपना सोच लो। सुमित तुम्हारा दुश्मन बन जायेगा। फिर तुमसे बदला लेगा। फिर तुम्हारा घर कैसे बच पायेगा? आखिर तो वह तुम्हारा पति है? वैसे भी तुम प्रेग्नेंट हो? क्या करोगी? कहां जाओगी? रोज ऐसे केस आते हैं। यहां से जाने के बाद सुधरना तो दूर पति लोग और ज्यादा वॉयलेन्ट हो जाते हैं। औरत को और अधिक भुगतना पड़ता है। हमारी मानो तो शिकायत वापस ले लो?’ पुलिस वाली इधर-उधर खिसक गई थी। वह वहीं खड़ी थरथरा रही थी। जैसे वह खुद ही मुजरिम हो। उसे समझ नहीं आ रहा था। वह क्या करे?
कुछ ही देर में उसने देखा थानेदार एक-दो सिपाहियों के साथ जीप में बैठकर कहीं जा रहा है। पता चला आरती बंसल नाम की एक महिला का मर्डर हो गया है। आरती का पति गुस्सैल, शराबी और बददिमाग था। पहले खुद आरती भी थाने में तीन बार पति की कम्प्लेन्ट लिखवा चुकी थी। पुलिस अधूरी कार्रवाई करती रही और कुछ ले-देकर उसके पति को छोड़ती रही। आरती ने खुद ही कम्प्लेन्ट वापस भी ले ली थी। ताकि घर बना रहे। लेकिन आज वह अपने घर पर मृत पाई गई थी। और पति फरार था।
काफी देर सोचने के बाद कृतिका वापस अंदर जाकर बोली, ‘मुझे कम्प्लेन्ट वापस नहीं लेनी। आप कानूनी कार्रवाई पूरी नहीं करते? इसलिये औरतें न बाहर सुरक्षित हैं न घर में और न मां की कोख में? कार्रवाई पूरी करें वर्ना... घर सुरक्षित नहीं होंगे तो देश कैसे सुरक्षित होगा?’

