धवल शिशिर के शीश पर फागुन डाले धूल,
मौसम को फिर मिल गए रंग-रंग के फूल।
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घोषित करता रह गया मौसम रेड अलर्ट,
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पेड़-पेड़ को छेड़ती हवा निगोड़ी फ्लर्ट।
दिल की डाली लचक कर हुई अचानक स्विंग,
मोबाइल पर जब बजी पहचानी-सी रिंग।
बीते बरस हजार हैं, लेकिन अब तक याद,
जंगल की झरबेर का खट्टा-मीठा स्वाद।
कॉल हमारी होल्ड पर दूर गई आवाज़,
पता नहीं अब कब मिले शब्दों को परवाज़।
सपने में भी सुन रहे इस गुड़हल के कान,
शेफाली जब मस्त हो छेड़े पंचम तान।
हाथ न आई छूट कर संबोधन की बांह,
सपनों के जंगल घने चकमा देती राह।
खेत-खेत में खिल रहा पीला सरसों रूप,
‘सतसैया’ के दोहरे मगन बांचती धूप।
धर कर नभ की देहरी चंदन-अक्षत-दूब,
सूरज सब को नमन कर गया सिंधु में डूब।
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