कृष्णलता यादव का बाल हाइकु-संग्रह ‘रिमझिम फुहारें’ 256 हाइकुओं के माध्यम से बच्चों को प्रकृति के विविध रूपों से जोड़ता है। कवयित्री के अनुसार इन लघु कविताओं का उद्देश्य मनोरंजन के साथ प्रकृति के प्रति प्रेम और संरक्षण की भावना जगाना है। संग्रह में प्रकृति केवल सौंदर्य का विषय नहीं, बल्कि जीवन की सहचरी और शिक्षक बनकर उपस्थित होती है।
कवयित्री लोकविश्वासों को भी हाइकु में सहजता से पिरोती हैं—‘कागा कहता/ आएगा मेहमान/ रोटी मुझे भी।’ वहीं ‘मृग बेचारा/ फिरता मारा-मारा/ कस्तूरी कहां’ लोकप्रसिद्ध कस्तूरी-मृग प्रसंग को मार्मिकता देता है। पर्यावरण-संकट की तीखी अभिव्यक्ति ‘आदमी आए/ आरियां भी आ गईं/ तरु बेचारा’ तथा ‘नदी है गुम/ लापता हैं दरख्त/ लालची हम’ में दिखाई देती है।
गौरैया के लिए बचाए गए आंगन, कटते वृक्षों की आह, भूचाल और बादल फटने जैसी स्थितियों के माध्यम से कवयित्री प्रकृति और जीव-जगत के प्रति संवेदना जगाती हैं।
कवयित्री प्रकृति के माध्यम से मानवीय जीवन और संबंधों को देखती हैं। बेटी की विदाई को नदी के प्रवाह से जोड़ना अत्यंत मार्मिक है—‘मायका छूटा/ चलती चली गई/ नदी बेचारी।’ यहां नदी केवल प्राकृतिक उपादान नहीं रहती; वह बेटी के जीवन और उसकी विवश यात्रा का प्रतीक बन जाती है। इसी तरह मां को अन्नपूर्णा के रूप में प्रतिष्ठित करता हाइकु—‘मां की रसोई/ भरी है बटलोई/ पुष्ट आहार।’ मां के वात्सल्य, श्रम और पोषणकारी भूमिका को सहज शब्दों में सामने लाता है। वहीं सूरज और समय से जुड़े हाइकु जीवन-दर्शन प्रस्तुत करते हैं।
तीन पंक्तियों और सत्रह वर्णों में रचित ये लघु हाइकु बच्चों को प्रकृति के बिंबों, उसके अवयवों और गतिविधियों से रू-ब-रू कराने के साथ-साथ उनमें प्रकृति-संरक्षण की चेतना जगाने का प्रयास हैं।
सरल भाषा, चित्रात्मकता, मानवीकरण, लोक-संवेदना, बालसुलभ जिज्ञासा और पर्यावरण चेतना रिमझिम फुहारें की प्रमुख विशेषताएं हैं। यह संग्रह बच्चों को प्रकृति देखने, समझने, बचाने और स्वयं हाइकु रचने की प्रेरणा देता है।
पुस्तक : रिमझिम फुहारें (बाल हाइकु) कवयित्री : कृष्णलता यादव प्रकाशक : समदर्शी प्रकाशन, राजस्थान पृष्ठ : 72 मूल्य : रु. 150.

