पुस्तक समीक्षा

बचपन की आकांक्षाओं के चित्र

बचपन की आकांक्षाओं के चित्र

गोविंद शर्मा

सुपरिचित बाल-साहित्यकार राजपाल सिंह गुलिया की बाल-कविताओं के संग्रह ‘निर्मल देश हमारा’ में 39 कविताएं हैं। लघु आकार, सरल शब्दों की इन कविताओं में बच्चों की पूरी दुनिया काे समेटा गया है। दादा-दादी, नाना, चूहा, बंदर, पानी, बादल... अब कंप्यूटर, इंटरनेट सब बच्चों की दुनिया के महत्वपूर्ण अंग हैं। आजकल जब भी बच्चों के स्कूल बैग का जिक्र आता है, पहले उसके भारी वजन की बात होती है और कहा जाता है कि इस बस्ते के बोझ से सुकुमार बचपन परेशान है। पर गुलिया जी ने कविता में बस्ते को मित्र बताया है। हम दोनों मित्र निराले/कभी करें न कुट्टी। दोनों ही आराम करें हम/ हो जिस दिन भी छुट्टी।

बाल-कविताओं में भरपूर मनोरंजन है वह ‘नादान कौआ’, हो या ‘मोटू फिसला’। मजे की बात यह है कि कविता हंसाती है तो सीख भी देती है। ‘थैला लेकर भागा भालू’, ‘खाना खूब दवाई’, ‘चिड़िया घर की सैर’ और भी कई ऐसी कविताएं हैं जो मनोरंजन और सीख-सबक का अद्भुत संगम है। कंप्यूटरजी, पानी, पेड़ अगर जो, आओ करें सफाई, वन में इंटरनेट आदि कविताओं में रोचकता के साथ जानकारी को भी कुशलता से पिरोया गया है।

गुलिया अध्यापक रहे हैं, इसलिये उनका बच्चों की दुनिया से निकट संपर्क रहा है। बच्चों की पसंद, नापसंद, जिज्ञासा और उत्सुकता की उन्हें जानकारी रही है। उन्होंने अपनी कविताओं की रचना में इसका उपयोग किया है। बच्चों को खेलने के लिये सब से पहले दोस्त के रूप में दादा-नाना ही मिलते हैं। दादा-दादी भी उनके लिये उन जैसे बच्चे बन जाते हैं।

पुस्तक : निर्मल देश हमारा लेखक : राजपाल सिंह गुलिया प्रकाशक : श्वेतवर्णा प्रकाशन, नयी दिल्ली पृष्ठ : 48 मूल्य : रु. 100.

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