पुस्तक समीक्षा

बाल मनोविज्ञान की कहानियां

बाल मनोविज्ञान की कहानियां

सत्यवीर नाहड़िया

बाल-साहित्य की विभिन्न विधाओं में कहानियों का अपना विशेष स्थान है। दादी-नानी की कहानियों की तरह अच्छी कहानियां बालमन को सदा से ही प्रिय रही हैं। आजकल, सैनिक समाचार, बाल भारती जैसी पत्रिकाओं के संपादक रहे वरिष्ठ साहित्यकार द्रोणवीर कोहली की चुनिंदा बाल कहानियां ऐसा ही रोचक संग्रह है। संग्रह की कुल दस कहानियों में कुछ कहानियां लोककथाओं पर भी आधारित हैं।

संग्रह की पहली कहानी ‘धोबिन सवा सेर’ में जहां गुस्सा न करने के फायदे दर्शाए गए हैं, वहीं दूसरी कहानी ‘उल्लू भी बुद्धिमान होते हैं’ असम की एक रोचक लोककथा पर आधारित है। दूध में पानी मिलाने वाले दूधिये की कहानी ‘दूधवाला’ में ईमानदारी, पुलिस से हत्यारे को बचाने वाले पीड़ित पिता पर केंद्रित ‘एकलौता बेटा’ में क्षमाशीलता तथा राजा को सीख देने वाली कहानी ‘ढेला न कहो, पत्थर बोलो’ में जैसे को तैसा का भाव बेहद शिक्षाप्रद है।

कामचोर खरगोश तथा मेहनती हिरण पर केंद्रित कहानी ‘जब खरगोश की नानी मर गई’ तथा कौवे की चतुराई पर आधारित कहानी ‘सयाना कौवा’ बच्चों को खेल-खेल में श्रम का महत्व समझाने में सफल रही हैं।

संग्रह की तीन अन्य कहानियां मिट्टी के दीये, लंगड़ा खरगोश और भालू तथा मोती कथानक की दृष्टि से अच्छी कहानियां हैं, किंतु यदि ये सुखांत होती तो और बेहतर होता।

इन सभी कहानियों की भाषा बेहद सरल व सहज है। चित्रकार पार्थ सेनगुप्ता के मनोहारी चित्र कहानियों के दृश्यों को जीवंत करते प्रतीत होते हैं। बाल मनोविज्ञान पर आधारित ये कहानियां बच्चों को अवश्य पसंद आएंगी- ऐसी आशा है।

पुस्तक : द्रोणवीर कोहली की चुनिंदा बाल कहानियां रचनाकार : द्रोणवीर कोहली प्रकाशक : राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नयी दिल्ली पृष्ठ : 56 मूल्य : रु. 80

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