पाली अवाक्रह गया। सिर से पांव तक कांप गया। बड़ा आदमी बनने के लिए वह तितलियां पकड़ने का बहाना कर लोगों से लूटमार किया करता है। आज के घने कोहर में कहीं बापू की गर्दन पर उसकी उंगलियों के निशान तो नहीं पड़ गए? वह भीतर की ओर भाग जेब में रखा बटुआ निकाल देखने लगा। अरे, यह तो बापू का ही बटुआ है। पाली ने झट से पैंट की पिछली जेब से चाकू निकाला। एक पल तो मन में आया, इस चाकू को अपने सीने में उतार दे।
जोगिंदर रात देर तक सामान बटोरता रहा। कस्सी, खुरपा, दराती और बड़ी वाली कैंची।
यह सब तो ठीक, लेकिन किसी और औज़ार की ज़रूरत भी तो पड़ सकती है, जोगिंदर मन ही मन बुदबुदाया। अब इतना भी क्या सोचना। बाबू वहां होगा, उनसे कह देगा। जोगिंदर ने यह बात माया के आगे भी दोहरा दी तो माया खीझती-सी बोली, ‘तेरे को ये सब भी ले जाने की क्या ज़रूरत। नई जगह है, बाबू अपने-आप नया सामान दिला देंगे।’
‘अरी, कैसी बात करती है। यह सामान भी तो बाबूजी ने ही दिलाया था। अब हर दिन बाबूजी पैसे ख़र्च करते रहेंगे। जब कोई चीज़ टूट जाएगी, तब कह देंगे उनसे। दीवार की खूंटी से अपनी बनियान उतारता जोगिंदर बोला, ‘पैसा अपना हो या दूसरे का, इस तरह बर्बाद न करने का मैं।’
‘बस रे हरिश्चंद्र की औलाद। तेरी इसी बुद्धि करके तो मुझे भी नरक-सी ज़िंदगी जीनी पड़ रही है। पिछले माह देखा, क्या हाल रहा अपना। पूरा-पूरा दिन नाले की सफ़ाई करते-करते, बदन कोढ़ मारने लगा था। मच्छर, कीड़े मेरी बाजू के ऊपर तक चढ़े आते थे। सूरज को चुन्नी में लपेट पेड़ के नीचे सुला आती थी। यूं कह ले, पेड़ ने ही उसकी रक्षा की।’
माया पलभर को रुकी, फिर लंबी उसांस भरती बोली, ‘अब तो पाली दसवीं पास कर ले, उसे कहीं किसी दफ्तर में लगवा दो।’
‘किसी दफ्तर में! अफ़सरी करेगा क्या?’
‘नहीं जी, अफ़सरी तो नहीं कह रही मैं। चपरासीगीरी तो कर ही लेगा।’
जोगिंदर ने ठंडी सांस भरी, फिर बोला, ‘तेरी बात तो ठीक है री, परंतु मैं कुछ और सोचूं।’
‘तो अब तू क्या सोचे?’ माया उतावली-सी होती बोली।
‘मैं सोच रहा हूं, अगर वह दस पास कर सकता है तो बारह भी पास कर लेगा। और बारह पास को तो सरकारी नौकरी भी मिल जाए।’
‘सरकारी नौकरी! हम जैसों को सरकारी नौकरी कौन देगा। अपनी तो कोई न जान-पहचान, न कोई सिफ़ारिश।’
‘अरी, अभी दो साल हैं न! बाबूजी से कहेंगे, वह पहुंच वाले आदमी हैं, और फिर क़िस्मत पलटते देर न लगे। अब अपना ही देख ले, कल तक नाले की साफ़-सफ़ाई कर रहे थे, अब कल से बाग़-बग़ीचे की रखवाली करेंगे। मैं तो बाग़-बग़ीचा भी देख आया हूं।’
‘तू बाग़-बग़ीचा देख आया, मुझे क्यों नहीं बताया?’ माया ने उलाहना भरी।
‘अब हर बात के लिए तुझे साथ लेता रहूं?’ जोगिंदर ने अंगोछे से मुंह पोंछा और तंबाकू की पीक निगलता बोला, ‘बाबूजी ने बहुत बड़ा फ़ार्महाउस बनवाया है। अब अगले महीने वहीं काम करना है। बाबूजी ने यह भी बोला है, काम अच्छी तरह से किया, तो यहीं पर परमानेंट कर देंगे। छह महीने बाद पगार भी बढ़ा देंगे और रहने को पक्की छतवाला एक कमरा भी बनवा देंगे।’ माया को तो यक़ीन ही न आया। बोली, ‘एक बार पहले भी बाबूजी ने बाग़-बग़ीचे में काम दिया था, तब पाली तीन बरस का था।’ एकाएक माया का चेहरा खिल-सा आया। हंसते हुई बोली, ‘पाली के बचपन के साल तो वहीं निकले थे।’
‘याद है कैसे भाग-भागकर तितलियां पकड़ा करता था।’
जोगिंदर भी मुस्कुरा दिया, ‘हां, याद है मुझे। पर तुझे यह भी याद है, हर रोज़ वह दो-चार तितलियां अपनी स्कूल की कॉपी-किताबों के बीच दबा दिया करता था।’
‘मैं कैसे भूल सकती हूं।’ माया उदास होती बोली, ‘उसकी मैडम ने ही बताया था। मुई कहती थी, तुम्हारा बेटा बड़ा होकर ‘क्रिमिनल’ बनेगा। उस वक्त मुझे इस शब्द का क्या पता था। मैंने सोचा, कोई अच्छी बात कह रही होगी। लेकिन जब बाद में पाली ने इसका मतलब बताया तो मैंने उसे चांटा लगा दिया था। अरे, पहले बताया होता, तो मैं उस मुई का मुंह नोच लेती।’
‘हां!’ जोगिंदर भी आक्रोश से भर आया था।
मुट्ठियां भींचता बोला, ‘तभी तो हमने पाली को उस स्कूल से निकाल लिया था। अब देख, सरकारी स्कूल में ही सही, पास तो होता चला आया है। बुरा समय तो बीत गया। छह महीने बाद पाली दस पास कर लेगा और बाबूजी के बग़ीचे में हमारी नौकरी भी पक्की हो जाएगी।’
जोगिंदर की बात पर माया ने चेहरा आसमान की ओर उठाते हुए दोनों हाथ जोड़ दिए, और मन ही मन ईश्वर का धन्यवाद करने लगी। इस नई जगह पर माया की आंखें तो फटी-सी रह गईं। इतना बड़ा फ़ार्महाउस, ढेर सारे पेड़-पौधे तो पहले से भले लग रहे हैं। अब उसे क्या करना है, माया सोचने लगी। जोगिंदर ने उसका चेहरा पढ़ लिया। बोला, ‘हरी घास भी तभी अच्छी लगे, अगर वह मखमल जैसी हो। मैं घास में पानी लगाने जा रहा हूं, तू तब तक झाड़ू से सूखे पत्ते बुहार ले। सूरज को कहीं भी छोड़ दे, भागता-फिरता रहेगा। यहां किसी बात का डर नहीं, इतना बड़ा तो मैदान है।’
माया की समझ में कुछ-कुछ आने लगा था। जोगिंदर ने बताया था कि बाबूजी दिन में दो-तीन बार आ सकते हैं। हमें काम करता देख ख़ुश हो जाएंगे। जोगिंदर की बात तो सच्ची है, माया ने सोचा, इतनी बड़ी जगह है, कहीं न कहीं तो वह बुहारती रहेगी। बाक़ी आगे का तो बाबूजी आकर बताएंगे ही। सूरज का तो ख़ूब मन लग रहा बस, इधर-उधर दौड़ता रहा और आख़िर में माया के पास आकर बोला, ‘मैं कुछ लाया हूं... दिखाऊं क्या?’
‘क्या लाया है, दिखा तो।’ माया तो कभी सोच ही न पाती कि वह क्या लाया है। सूरज ने मुट्ठी खोली तो माया अवाक, ‘हे राम! तू भी तितली पकड़कर ले आया। अरे, क्या ज़रूरत थी। देख तो, बेचारी कैसे तड़प रही है।’ माया ने झट से तितली को अपने हाथों में लिया और गुलाब के बड़े से फूल के ऊपर रख दिया। सूरज की हथेली अपने दुपट्टे से पोंछती बोली, ‘तितलियां देखने के लिए होती हैं। पकड़ने के लिए नहीं।’
अब तक जोगिंदर पास आ गया था। माया की पीठ पीछे खड़ा सारा तमाशा देख रहा था। तपाक से माया के सामने आकर खड़ा हो गया और कमर पर दोनों हाथ रखता बोला, ‘कैसी बात करती है री तू! तितलियां पकड़ने के लिए ही होती हैं। वो तो हमारे हाथ आ नहीं पातीं, इसलिए हम ऐसा कह देते हैं।’
‘बस-बस, बाप-बेटे मिलकर तितलियां पकड़ते रहो।’
पाली स्कूल से आ गया था। जोगिंदर ने उसे समझा दिया था कि स्कूल के बाद सीधे बाबूजी के फार्म हाउस में आ जाएगा।
माया नाराज़ होती बोली थी, ‘बच्चा है, इतनी दूर अकेले कैसे पहुंचेगा।’
‘अरे, अब यह बच्चा नहीं रहा। मैंने इसे दो बार रीगल सिनेमा में घुसते देखा है। स्कूल के बाद दोस्तों के साथ वहां नई फ़िल्म के पोस्टर देखने जाता है।’ पाली झेंप-सा गया। कैसे तो उसके बाप ने उसकी चोरी पकड़ ली। रीगल तक का रास्ता तो उसे पता था, आगे का रास्ता जोगिंदर ने समझा दिया। जोगिंदर उसे समझा रहा था और पाली मन ही मन मुस्कुरा रहा था। ‘देख रे, कितना सुंदर फार्म हाउस।’ जोगिंदर अपनी ख़ुशी ज़ाहिर कर पाली को भी ख़ुश देखना चाहता था। पाली ने तो सीधे से मुंह बिचका दिया, ‘यह कौन-सा अपना है।’
‘अरे, कैसी बात करता है तू। ऐसी चीज़ तो बड़े लोगों की होती हैं। हम बड़े लोग नहीं है रे।’ जोगिंदर बुझी आंखों से पाली के चेहरे की ओर देखने लगा तो पाली एकाएक बोल उठा, ‘मैं तुम्हें बड़ा आदमी बनकर दिखाऊंगा।’ कहते हुए पाली वहां से भाग गया और सूरज के साथ-साथ वह भी तितलियों के पीछे दौड़ने लगा। माया तो उसे यूं दौड़ते देखा हंस-हंसकर पागल-सी हो आई, ‘इतना बड़ा हो गया यह, तितलियां पकड़ने से बाज़ नहीं आया।’
दिन, सप्ताह, महीने गुज़र गए। इधर पाली के इम्तिहान ख़त्म हुए, उधर बाबूजी ने जोगिंदर की पक्की नौकरी का ऐलान कर दिया। पगार भी बढ़ा दिया और अगले छह महीने के अंदर उनके लिए पक्की छत बनवा देने का भी वादा किया। जोगिंदर और माया ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे थे।
शाम को जोगिंदर और माया सामान समेट रहे थे तो बाबूजी आ गए। जोगिंदर कुछ अदब से खड़ा हो गया तो बाबूजी बोले, ‘तुम जा रहे हो क्या?’
‘हां साहब, पांच बज रहे हैं, कोई हुकुम हो तो कहिएगा।’ बाबूजी माया की ओर देखते बोले, ‘शाम को मेरे कुछ मेहमान आ रहे हैं। जोगिंदर थोड़ी देर रुक जाएगा, तुम अकेली जा सकती हो।’
‘कोई दिक्क़त नहीं साब।’ जोगिंदर और माया के मुंह से एकसाथ ये शब्द निकले तो बाबूजी मुस्कुरा दिए।
माया के चलते-चलते जोगिंदर ने उसे पचास का नोट पकड़ा बच्चों के लिए कुछ मीठा लेती जाने को कहा।
‘मैं तो रोटी-पानी ख़ाकर ही आऊंगा। तुम बच्चों को खिला देना, ख़ुद भी खा लेना।’ जोगिंदर की ज़ुबान से क्या-क्या शब्द फूट रहे थे, माया मन ही मन फूली न समा रही थी।
माया घर पहुंची तो पाली बाहर को निकल रहा था। उसे रोकती हुई माया बोली, ‘तू कहां जा रहा है रे?’
‘मैं!’ पाली की ज़ुबान लड़खड़ा-सी आई, ‘मैं तितलियां पकड़ने जा रहा हूं।’
‘इस वक्त कौन-सी तितलियां उड़ती हैं रे?’
‘आजकल तो तितलियां रात में भी उड़ती हैं, मां।’ पाली कहता हुआ भाग गया। माया देर तक हंसती रही, कैसा बावला हो गया है। कहता है, आजकल रात को भी तितलियां उड़ती हैं।
माया रसोई में आ दाल-भात बनाने लगी। दाल-भात बनाने में कौन-सा देर लगी। एक घंटे में सारा भोजन तैयार। पाली आ जाए तो उसे गरमा-गरम परोस देगी। बाद में मिठाई का डिब्बा खोलेगी। देखो, कैसे उछल पड़ेगा।
जोगिंदर पगार भी लाएगा, और बाबूजी कह रहे थे, कुछ बड़े-बड़े लोग आ रहे हैं। फिर तो बख़्शीश भी अच्छी मिल जाएगी।
नौ बज रहे हैं। पाली अभी तक न आया। बाहर ठंड और कोहरा भी ख़ूब पड़ने लगा है। कहीं बीमार हो गया तो जोगिंदर तो उसे ही डांटेगा। माया बार-बार दरवाज़े की ओर जा रही थी।
लो, पाली आ गया। कुंडी तो ऐसे खड़का रहा है, जैसे तोड़ ही डालेगा।
‘अरे आ रही हूं न। क्या दरवाज़ा तोड़ने का इरादा है?’
माया ने दरवाज़ा खोला तो एक लंबी चीख़ उसके मुंह से निकल गई। चार-छह लोग जोगिंदर को पकड़े बाहर खड़े थे। जोगिंदर की गर्दन से ख़ून टपक रहा था।
कोई एक आदमी बोला, ‘किसी ने इसकी गर्दन पर चाकू से रेत डाला है। हम इसे अस्पताल लेकर जा रहे हैं।’
माया छाती पर दोहत्थड़ मार फूट पड़ी, ‘हाय राम! किसने मार डाला मेरे आदमी को?’
गली-मोहल्ला इकट्ठा हो गया था। तभी भीड़ को चीरता हुआ पाली आगे आया तो माया चिल्ला पड़ी, ‘अरे तू तितलियां पकड़ता फिरता है, पकड़ना है तो उसे पकड़, जिसने तेरे बापू को मार डालने की कोशिश की।’
पाली अवाक् रह गया। सिर से पांव तक कांप गया। बड़ा आदमी बनने के लिए वह तितलियां पकड़ने का बहाना कर लोगों से लूटमार किया करता है। आज के घने कोहर में कहीं बापू की गर्दन पर उसकी उंगलियों के निशान तो नहीं पड़ गए? वह भीतर की ओर भाग जेब में रखा बटुआ निकाल देखने लगा। अरे, यह तो बापू का ही बटुआ है। पाली ने झट से पैंट की पिछली जेब से चाकू निकाला। एक पल तो मन में आया, इस चाकू को अपने सीने में उतार दे। लेकिन अगले ही पल मन ही मन खुद को गाली देता हुआ उसने चाकू दराज़ के पीछे छुपा दिया। एक बार उसने दीवार से सिर पटका, फिर बाहर की और लपकता चिल्लाया, ‘मैं अस्पताल जा रहा हूं मां!’

