होली की नज़र

अवसरवाद की भंग में काला रंग

अवसरवाद की भंग में काला रंग

गिरीश पंकज

होली आते ही सबसे अधिक घबराहट होती है, हमारे नेता चुगली प्रसाद को। होली का बहाना लेकर हर कोई अपनी भड़ास निकालता है। कोई रंग लगाने के बहाने उनकी पिटाई कर देता है। कोई महामूर्ख सम्मेलन के बहाने उन्हें गरियाने वाली उपाधियां समर्पित कर देता है। पिछले साल की बात है। होली के दिन लोग उनसे मिलने आए, लेकिन सबके हाथों में लाल गुलाल की जगह काला रंग था। नेता जी ने देखा, तो मुस्कुरा कर बोले, ‘क्या मुझे यही रंग लगाया जाएगा?’ एक व्यक्ति ने जवाब दिया, ‘सुना है कि आपका प्यारा रंग है काला।’

नेताजी गंभीर हो गए। बोले, ‘भाई, लाल लगाओ, तब तो होली की सार्थकता है।’

एक आगंतुक ने मुस्कराते हुए कहा, ‘आप जैसों की कृपा से हमारे जीवन के सारे रंग गायब होते जा रहे हैं। बस यह काला ही बचा है। काला दिल, काले कानून, काले वादे, काले इरादे, काली राजनीति : हर तरफ तो काला ही काला है तो ऐसे में रंगों का उजाला कहां से होगा? इसलिए हम सबने सोचा कि आपका बहुत प्रिय रंग काला ही ले जाएं।’

नेताजी खामोश थे। उन्होंने जनभावना के आगे सिर झुकाकर कहा, ‘जैसी जनता की इच्छा।’

लोगों ने काला गुलाल लगाया और कहा, ‘बुरा न मानो होली है। होली में इतना मजाक तो चलता ही है। अगली बार आएंगे तो लाल गुलाल लगाएंगे।’

इतना बोलकर सब चले गए। चुगली प्रसाद ने खुद को दर्पण में देखा। उनका चेहरा काला ही काला नजर आ रहा था। उनकी पत्नी ने मन ही मन हंस पड़ी। फिर प्रकट में बोली, ‘कीड़े पड़ें इन काला लगाने वालों के जीवन में। आपके साथ ऐसा मज़ाक ठीक नहीं।’

नेताजी बोले, ‘कोई बात नहीं। राजनीति में यह सब चलता है। कुछ लोग तो जूते भी खाते हैं। गनीमत है, हम काले में ही निपट गए। इसे ही स्वीकार कर लेने में भलाई है क्योंकि ये सब हमारे वोटर हैं। काला लगाकर संतुष्ट हो गए और मैंने कुछ नहीं कहा। इसका असर यह होगा कि अब वे आपस में चर्चा करेंगे कि बेचारा कितना सीधा है। हमने कालिख पोती, फिर भी उसने कुछ नहीं कहा। लगता है आदमी ठीक-ठाक है। अगली बार हम इसे ही वोट देंगे। अपने दुश्मनों को भी बड़े प्रेम से निपटाओ। मैंने एक-दो को पहचान लिया है। इनसे बाद में निपट लूंगा।’

पत्नी मुस्कुरा कर बोली, ‘मानना पड़ेगा आपको। तुसीं ग्रेट हो जी। हमारे बापू ने आप के पल्ले बांध कर गलत नहीं किया।’

चुगली प्रसाद एकांत में सोचने लगे, एक बार कालिख लग गई। दुबारा नहीं लगनी चाहिए। यही सोच कर नेताजी होली के दिन गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो जाते हैं और बयान जारी करते हैं कि होली अज्ञातवास में मनाएंगे। गरीबों के बीच। काले कारनामों के लिए मशहूर नेताजी को काले रंग से डर लगता है। यह उलटवांसी लोगों को अब तक समझ में नहीं आई।

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