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दूसरे छोर पर

कहानी

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चित्रांकन संदीप जोशी
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सहसा बेटी का मोह भरा रूप, उसकी कोमल कामना जैसे उसके मन में भी झांक उठी और मन ममता से भीग उठा। वे कैसे अपनी सुविधा को दुःखी कर सकेंगी। तभी घरघराती हुई मेट्रो ट्रेन से उनकी तंद्रा भंग हुई। उन्होंने अपने आप को समेटा। वे झट से उठकर खड़ी हुईं। अपने आपको व्यवस्थित किया। हरदम की तरह एक मुस्कान उनके होंठों पर खेल गई। उनके हाथ कुर्सी का हत्था छोड़कर आशीर्वाद देने की मुद्रा में हिले और मानो हर तरह से अपने को प्रस्तुत कर लिया था सुविधा के स्वागत के लिए।

मौसम में ठंडक बढ़ने लगी है। दूर-दूर तक खामोशी है। लगता है कि उदासी सशरीर शाम के रूप में आकर फैल गई है। बरामदे में आरामकुर्सी पर अधलेटी-सी मिसेज खन्ना मानसिक तपिश से अकुला रही हैं। दूर, बहुत ऊंचे तारों की ओढ़नी का चमकीलापन समेटे आकाश की ओर देखती उनकी आंखें, उनके होंठ आज इस तरह मौन हैं, जिनमें शाम की उदासी का आभास होता है, परंतु मन में खौलता बवंडर अब शांत हो चला है।

कामवाली बाई दूसरी बार चाय लाई।

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‘मेम साहब, चाय लीजिए। दूसरी बार लाई हूं।’ उसके स्वर में बेचारगी स्पष्ट है।

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‘ना, काकी। चाय नहीं चाहिए। बड़ी तपिश लग रही है।’ एक हल्की दर्दभरी मुस्कान उनके होंठों पर उभरी।

‘तो कुछ ठंडा बना दूं क्या?’ उसने फिर पूछा।

‘नहीं, रहने दो।’

नौकरानी ने अचकचा कर उनकी ओर देखा। फिर मन ही मन कुछ बुदबुदाते हुए लौट गई।

वे आज किस गहन चिंता में हैं, कोई नहीं समझ सका। समझे भी कौन? नौकरानी, रामू कौन है, जो उनके व्यक्तित्व को पढ़ सके। हां, पास मेज पर पड़ा वह अधखुला पत्र उनकी समस्त चेतना को जकड़े हुए है।

मिसेज खन्ना का हाथ अचानक अपने माथे पर जा टिका। हल्की सिकुड़न से भरा माथा और दो-चार चांदी से सफ़ेद बाल, जो सहसा ही अंगुलियों को छू गए। आज आंसू भी उमड़ते हैं तो जैसे बीच में ही कोई उन्हें मोती-सा चुग लेता है। जीवन का एक-एक पृष्ठ खुलता है और पहलू बदलती वे मिसेज खन्ना, सुविधा की मां नहीं, आज बस मधु बन गई हैं। आज का जीवन विगत जीवन की प्रतिच्छाया से दूर एक नवीन सृष्टि की तरह है। किन्तु क्या वे स्वयं को सचमुच विगत की छाया से बचा पाई हैं! शून्यता और अकेलेपन से भरते मन को धीरे कांपते हाथों का स्पर्श देती उनकी आंखें फूट पड़ने को हो गईं, पर अपने को संयत करते हुए वे सोचने लगी हैं : अब तो सब कुछ समाप्त हो गया—किसके लिए रोएं? क्यों रोएं? दर्द से भीगे ठंडे उच्छ्वास हवा में वाष्प बनकर उड़ने लगे...

सुविधा ने पत्र में लिखा है—

‘मम्मी! बीते महीने से ही यथासमय मैं तुम्हें पत्र नहीं लिख सकी। बाईगॉड, बहुत व्यस्त रही। मम्मी, वो जो हमारे साथ सूरज था न, इसी सप्ताह विदेश जा रहा है। हम दोनों काफी समय से लिव-इन में थे। अच्छी तरह जानते हैं एक-दूसरे को! इतने बड़े महानगर में सहारे को कोई तो चाहिए था न—बस्स!! वैसे भी वह हमारे मेडिकल कॉलेज का हीरो है, ममा। उसकी जिद थी कि विदेश जाने से पहले हम शादी कर लें। इतनी जल्दी में हो भी क्या सकता था! हमने कोर्ट मैरिज कर ली है। ओह मम्मी! डोंट माइंड प्लीज़। छोड़ो इन झूठे रीति-रिवाजों को। हां, यदि तुम्हारी बड़ी इच्छा होगी तो उसके लौट आने पर फेरे भी लगवा लेना। क्यों, ठीक है न ममा? कॉलेज बंद होगा और मैं शीघ्र ही घर के लिए चल दूंगी। सूरज को हमने सी ऑफ कर दिया है।’

मिसेज खन्ना के मन में पत्र की पंक्तियां पानी में डोलते दीयों-सी झिलमिलाती हैं और उनकी कांपती लौ में मन जैसे आगे कुछ पढ़ ही नहीं पाता! उनकी बेटी ने विवाह कर लिया! सूचना भी भेज दी है!!! मन में दबी कुंठा उभर आई। क्यों नहीं!! उनके विगत जीवन के इतिहास को भी निर्ममता से कुरेद दिया है। बस, एक पत्र ने—मन अपने धुंधलाते से अतीत में भटक गया है...

वे भी अपने मां-बाप की लाडली इकलौती संतान थीं। दिनेश से जब उन्होंने विवाह किया था, तब उनकी परिस्थिति में इतना भर ही तो अंतर था कि मां-बाप ने दबी जुबान से असहमति दिखलाई थी—

‘बेटा, तुम पढ़ी-लिखी हो, समझदार हो, अपना अच्छा-बुरा समझती हो। पर...’

‘पर क्या मां? मैं भी तो अपना भला सोच सकती हूं न!’

उन्होंने अपनी आवाज़ दबने नहीं दी थी। यही आशंका तो आज उनके मन में उठी न! कहीं उनकी बेटी भी ठगी न जाए!

दिनेश के परिवार ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। इसे वे विषपान की तरह गले से नीचे उतार गईं। कई तरह का अपमान सहने की प्रक्रिया में एक दिन उन्हें पता चला कि दिनेश पूर्वविवाहित है। अपनी सफाई में दिनेश ने बहुत कुछ कहा था।

‘मधु, वह रिश्ता तो कहने भर को ही था। मन और शरीर तो उससे अबंधा और अछूता ही रहा—’

‘इतना बड़ा अविश्वास! मुझे पहले क्यों नहीं बताया?’ वह लगभग चीख पड़ी थीं।

वह चुप हो गया था। और दोनों ने अपने रास्ते अलग-अलग कर लिए थे। तब सुविधा नन्ही-सी ही थी।

मन की शून्यता के रहते उन्होंने सुविधा को अमिट दुलार देकर पाला-पोसा था। अपना सर्वस्व उन्होंने अपनी सुविधा पर ही केंद्रित कर दिया था। जीवन की हारी बाज़ी को मानो विजय में बदल डालना चाहती थीं। दिनेश ने कई बार सुलह की कोशिश की, पर उस छलना में वे दोबारा नहीं पड़ना चाहती थीं।

उनकी सुविधा बड़ी हो रही थी। कितनी रातें चिंताओं में कट जाती थीं। अपना क्या है, पर सुविधा को कोई दुःख न हो। अपनी बेटी में ही वह अपने आप को देखती थीं—किंतु वे ठिठकीं : भूल कहां हो गई, वे समझ नहीं पा रही थीं। उन्होंने शायद अति-आदर्श के पीछे ही तो नहीं अपने को खो दिया है, यानी इस बार फिर वो छली गईं।

मन का पोर-पोर जैसे व्यथा से भर उठा, किंतु अब वे बिखरेंगी तो फिर अपने को सहेज भी न सकेंगी। चेहरे पर विषाद फैलता जा रहा था। मन के कोने हल्के दर्द से पीड़ित होकर सिसकने लगे थे।

जब सुविधा नन्ही-सी थी, तब कैसी बातें किया करती थी। और फिर उम्र के विकास के साथ-साथ वयस्क और गंभीर होती सुविधा—यादें क्रमवार उमड़ने लगी थीं—

कितनी संयत, कितनी धीर! कभी-कभी उसके गांभीर्य से वे घबरा उठतीं। वे चाहती थीं कि वह खूब चहके, ताकि उनका रंगहीन जीवन मूकता की निस्पंदता से न सोया रहे। सुविधा की हंसी की खातिर वे बार-बार हंसती थीं और आज वही सुविधा—!! वे सोचते-सोचते क्षण भर को ठहरीं! अपने भाग्य की विडंबना को याद कर मन तल्खी से भर उठा। कहीं सुविधा को भी उन लोगों ने न अपनाया तो! उस अभागिन के साथ तो उसकी बदनसीब मां का इतिहास भी है, पर सुविधा तो बड़े विश्वास से कहती है—

‘सूरज के पिता उसे बेटी की तरह दुलराते हैं।’

सहसा बेटी का मोह भरा रूप, उसकी कोमल कामना जैसे उसके मन में भी झांक उठी और मन ममता से भीग उठा। वे कैसे अपनी सुविधा को दुःखी कर सकेंगी। तभी घरघराती हुई मेट्रो ट्रेन से उनकी तंद्रा भंग हुई। उन्होंने अपने आप को समेटा। वे झट से उठकर खड़ी हुईं। अपने आपको व्यवस्थित किया। हरदम की तरह एक मुस्कान उनके होंठों पर खेल गई। उनके हाथ कुर्सी का हत्था छोड़कर आशीर्वाद देने की मुद्रा में हिले और मानो हर तरह से अपने को प्रस्तुत कर लिया था सुविधा के स्वागत के लिए।

वातावरण में हल्की-सी चांदनी फैल चुकी थी। झटके से उठने पर कुर्सी देर तक हिलती रही। बादलों का एक गुच्छा पश्चिम से उभरने लगा था, शायद बारिश भी हो। देर तक उसे देखते हुए वे अंदर की ओर बढ़ गईं। कमरे में पहुंचकर उन्होंने आवाज लगाई :

‘काकी, जरा एक कप चाय दे जाना।’

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