‘पहले आई तो थी। तेरे सामने की बात है, उसका यहां दिल ही नहीं लगा। उसने जो दो-चार साल जीने हैं, वे भी नहीं जी सकेगी। रिश्तों को जितनी आज़ादी देंगे, वे मोह की हवा में उतना ही लहलहाएंगे। यदि इनको अमरबेल की तरह अपने बाहुपाश में कसकर रखने की कोशिश करेंगे तो ये मुरझा कर सूख जाएंगे।’
‘दो महीने इंडिया में रहोगे? तुम्हारा दिमाग तो सही है। वीक दो वीक के लिए तो चलो हुआ, ये तो तुमने हद कर दी। मैं अकेली नहीं रह सकती।’ दो महीने इंडिया जाकर रहने के मेरे फैसले को सुनकर बलजीत हैरान होकर एकदम भड़क उठी।
‘वो जो वहां इतने सालों से अकेली रहती है। कभी उसके अंदर भी झांककर देखा है?’ मैंने उदास और गंभीर होकर पत्नी को समझाने का यत्न किया।
‘जो चाहे करो…, तुम कौन-सा किसी की बात मानने वाले हो।’ वह गुस्से में मेरे पास से उठकर किचन में जाकर टैली लगा लेती है।
मुझे पता है, यह उसका गुस्सा नहीं, प्यार है। वह मेरे बिना नहीं रह सकती। मैं पहले भी हर साल चार सप्ताह से कम इंडिया नहीं जाता। इस बार दो महीने की छुट्टी लेकर जा रहा हूं। चार हफ़्ते की तो मेरी छुट्टी बनती थी, बाकी चार हफ्ते की बिना वेतन की छुट्टी ले ली थी। मैं जानता था कि यह सुनकर बलजीत एक बार तो आगबबूला होगी, फिर धीरे-धीरे ठंडी हो जाएगी। उसको पता है, मैं इस मामले में किसी की परवाह नहीं करता। हालांकि, बढ़ती उम्र को देखते हुए बच्चे भी अधिक दिन इंडिया में न रहने की हिदायतें देते रहते हैं। उन्हें वहां के प्रदूषण की समस्या, स्वास्थ्य सुविधाओं, ट्रैफिक और सिस्टम की खामियों से डर लगता है। लेकिन, आदमी करे तो करे क्या। एक तो आदमी की अपनी परेशानियां, दूसरे ये सोशल मीडिया पर बैठे विद्वान परेशान किए रखते हैं। इन्हें तो कोई मुद्दा चाहिए। रोज कोई न कोई ऐसी वीडियो देखता हूं—
‘एनआरआई के माता-पिता गांव में कष्ट भोगते फिरते हैं।’
‘एनआरआई ने अपने मां-बाप को अपने पास बुलाकर कैदियों की भांति रखा हुआ है।’
‘बुजुर्ग माता के बेटे सरकारी पदों पर हैं, पर मां को नहीं संभाल सकते।’
मैं जब भी कोई ऐसी वीडियो देखता, मुझे मां याद आ जाती। कहीं उसके साथ कोई ऐसी-वैसी घटना घट गई तो मैं स्वयं को माफ़ नहीं कर सकूंगा। ऊपर से ऐसे लोग मेरा जीना दूभर कर देंगे। संवेदनशील व्यक्ति हर घटना अपने ऊपर घटित होता महसूस करता है। पहले समय में ऐसी बातों का पता नहीं लगता था। मगर अब तो चुगलख़ोर बेबे की तरह इन लोगों का पता नहीं चलता, कब किसको हीरो और किसको ज़ीरो बना दें। फ़िर, ऐसी-ऐसी वीडियो पर फेसबुक पर डाल कर उपदेश देंगे। ख़ुद भले अपनी मां को पूछते न हो।
एनआरआइज़ ने गांव का सुधार किया, स्कूल की मदद की, मेडिकल कैंप लगाए, गरीब की मदद की और कितने एनजीओ इन एनआरआइज़ के पैसों से चलते हैं। उनकी वीडियोज गांव या शहर स्तर तक ही सीमित रहती हैं, पर माता-पिता से जुड़ी कोई ऐसी वीडियो हाथ आ जाए तो उसकी वो रेल बनाते हैं कि लगने लगता है, सभी एनआरआइज़ अपने माता-पिता के साथ ऐसा ही करते होंगे। वहां रहते पढ़े-लिखे लोग भी अपने मां-बाप के साथ बहुत बुरा बर्ताव करते हैं, यह देखकर भी दिल में कचोट उठती है। ऐसी एक वीडियो ने मुझको हिलाकर रख दिया था।
वीडियो में पोता अपनी दादी के बिस्तर पर खुद पानी उड़ेल कर इल्ज़ाम लगाता है कि दादी ने बेड पर पेशाब कर दिया है। बेटा, बुज़ुर्ग मां को बुरी तरह पीटता है। ये देखकर मेरे अंदर एक डर सिर उठाता है। मैं अपने भानजे को सीधी वीडियो कॉल लगाता हूं।
‘मां कहां है?’ मेरे लहजे में तल्ख़ी देख वह डर-सा जाता है।
‘यहीं है, मेरे पास।’ वह मां पर कैमरा फोकस करता है। वह सोई हुई है।
‘उठा कर मेरी बात करा।’ मैं उसको यूं हुक्म देता हूं, मानो वह मेरा बंधुआ मज़दूर हो।
अस्सी वर्ष पार कर चुकी मां उठने में देर लगाती है। मैं कैमरे में आसपास के हालात को ग़ौर से देखने की कोशिश करता हूं। सोकर उठी मां होश संभालने में समय लगाती है। मैं हालचाल पूछता हूं, पर दिल को संतोष नहीं होता। मन में अजीब-अजीब से विचार आते हैं।
‘क्या पता मेरे इंडिया जाने पर दिखाने के लिए अच्छी सेवा करते हों।’ मैं सोचता हूं, क्यों न सीसीटीवी कैमरे लगवा दूं, फिर जहां मर्जी देख सकता हूं, पर फिर वे क्या सोयेंगे? बहन जीवित होती तो और बात थी। अब बहनोई है। वह नाराज हो गया तो मां को कौन संभालेगा? मैं इस वीडियो बनाने वाले को मन ही मन बुरा-भला कहता हूं। मानो उसने मेरे अंदर भ्रम पैदा करके अभी-अभी मेरे से कुछ गलत करवा दिया हो। मैं खुद को शांत करता हूं। एक फैसला करता हूं—इस बार दो महीने इंडिया रहकर आऊंगा। अब जब भानजी का विवाह हो गया, मेरी चिंता और बढ़ गई है। बेशक कामवालियां लाख बढ़िया से संभालती हों, पर फिर भी मां को हमारी कमी हमेशा ही चुभती होगी।
मां से जब भी बात करता हूं तो वह यही पूछती है, ‘तुम कब आओगे? मेरा मन नहीं लगता।’ हम पति-पत्नी दोनों जाते हैं तो कहेगी, ‘तुम जल्दी लौट जाओ, घर पर लड़का अकेला होगा।’ फिर उसको पोते की चिंता सताने लगती है। हम कैसे टुकड़ों में बंट गए हैं। हमारा कोई हिस्सा सम्पूर्ण नहीं है। मैं जब इन बातों के बारे में सोचता हूं, पागल-सा होने लगता हूं।
‘बेटा, लंच में क्या खाना है?’ बलजीत की आवाज़ मेरे कानों में पड़ती है। बेटे की ओर से कोई जवाब नहीं आता। मुझे पता है, वह कानों में ईयरफ़ोन ठूंसे काम कर रहा होगा। उसका ब्रेक टाइम होने वाला है। बलजीत उसके लिए लंच तैयार करेगी। उसको सीढ़ियां चढ़कर बेटे से पूछने के लिए जाते हुए देखता हूं। मुझे अपने गांव के चौबारे की सीढ़ियां याद आ जाती हैं। हाथ में थाली पकड़े मां सीढ़ियां चढ़ती दिखती है। चौबारे के दरवाज़े के बीच खड़ी होकर कहती है—
‘रोटी तो नीचे आकर खा लिया कर…, मैं आवाज़ें लगा लगाकर पागल हो गई।’
‘रख दे, खा लेता हूं।’
‘खा लेता हूं नहीं, खा ले। नहीं तो पड़ी-पड़ी ठंडी हो जाएंगी।’
मां मेरी आदत को जानती है। बचपन में खेल में मस्त रहता था, खाने-पीने की सुध-बुध भुला देता था। बड़ा होकर पढ़ने-लिखने में मस्त होकर खाना-पीना भूल जाता। या कह लो, मां मुझे भूख लगने से पहले ही खिला देती थी। मेरा वह ज़रा भी भरोसा नहीं करती थी। पहले स्कूल से या कॉलेज से लेट हो जाता तो कोठे पर बैठी रहती। पंजाब में अतिवाद के दौर ने ऐसा मजबूर किया कि वह स्वयं मिन्नतें करती मुझे मुल्क छोड़कर चले जाने को कहती।
‘तुझे तो मैं एक मिनट के लिए भी आंखों से दूर न करती, पर अब तेरी सलामती चाहती हूं। तेरे सही-सलामत होने की खबर ही मेरे लिए सब कुछ है।’ उसके ये शब्द मेरे सीने में उकरे हुए हैं।
मां की छाती से लगकर कितना सुकून आता। अब भी बचपन याद आ जाता है। उसके बदन की महक सम्मोहक नींद सरीखी है। अब भी वहां जाकर कितनी नींद आती है। यहां विदेश में कितने भी थके-टूटे हों तो भी बार-बार उठते रहते हैं। तभी तो कहते हैं, मां के पैरों में जन्नत है।
स्वर्ग-नरक तो यहीं पर है, इसी धरती पर। आदमी उम्रभर अपना भविष्य संवारने के लिए दौड़ा फिरता है। हम भी कहां से कहां आ गए कि बच्चों का भविष्य संवर जाए। हमारा बुढ़ापा अच्छा बीते। हमारे मां-बाप ने भी यही सब सोचकर सारी उम्र देह तोड़ मेहनत की। बापू तो बुढ़ापे की दहलीज नहीं चढ़ सका। मां अब बुढ़ापा भोग रही है। क्या उसका बुढ़ापा सुखी है? क्या उसने अपने बुढ़ापे की ऐसी कल्पना की थी? ये सवाल मुझे और अधिक तंग करते हैं।
मन को तसल्ली देने के लिए सोचता हूं, मैंने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी। मैंने तो मां को अपने पास इंग्लैंड बुलाया था, पर उसका यहां मन ही नहीं लगा। स्थायी वीज़ा के लिए इधर आवेदन किया हुआ था, वह उसका यूं इंतजार करती थी, जैसे कोई क़ैदी अपनी रिहाई के फ़ैसले की प्रतीक्षा करता है। कभी उसकी शुगर कम हो जाती, कभी ब्लड-प्रेशर। इंडिया फोन पर बात करवाते। वह कट्टे-कटियों, भैंसों और फ़सलों के हाल-चाल पूछती रहती। घर के पीछे लगी बेरी के पेड़ पर किसी ने अमरबेल फेंक दी थी। पहले उस बेरी को बहुत बेर लगते थे। मां उस सूखती जाती बेरी को याद करती उदास हो जाती। मुझे लगता, मेरी मां भी उस बेरी की तरह बिना जड़ वाले हमारे प्यार में जकड़ी घुटती जा रही है। दोहते-दोहतियों के साथ उसकी छोटी-छोटी बातें ख़त्म ही न होतीं। बातें करते हुए उसके चेहरे पर रौनक आ जाती थी।
पोते-पोतियाें से अधिक दोहते-दोहतियों के साथ उसका मन अधिक रमता था। पोते-पोतियां तो छोटे होते ही इधर आ गए थे। अब इनके गेम्ज़ और टीवी प्रोग्राम मां की समझ में न आते। इनकी बातें उसको अच्छी न लगतीं। उधर इंडिया में दोहते-दोहतियां बचपन से ही मां के साथ रहे थे। मैं उलाहना देता—
‘बीबी, पोते-पोतियों के संग तेरा ज्यादा मोह नहीं।’
‘बेटा, मोह तो है, पर मुझे झिझक-सी आती रहती है। ये मेरे पास नहीं रहे न।’
छह महीने बाद जब स्थायी वीजा लगकर आया, वह तंदुरुस्त लग रही थी। इंडिया जाने की उतावली थी। मैंने उसको नहीं रोका। वह लौटकर पंजाब गई तो मानो सारी बीमारियां ही कट गई। पांच साल के अंदर उसका लौटकर आना और यहां रहना ज़रूरी था, पर उसने पासपोर्ट ही नहीं दिया। मैंने भी जिद नहीं की। मैं तो उसको खुश देखना चाहता था। उस दिन से अपने आपसे वायदा किया था कि साल में एक महीना मैं मां के पास अवश्य रहूंगा, पर अब यह समय भी कम लगने लगा। यूं लगता, जैसे वह जिन दोहते-दोहतियों के मोह में इतना बड़ा फ़ैसला करके वापस पंजाब आई थी, अब उनके दूर हो जाने के कारण वह अकेली पड़ी मुझे कोसने लगी हो, ‘जब अपना पेट जाया ही पास न रहा, इन पर क्या जोर!’
यही सोचकर इस बार मैंने इंडिया में दो महीने रहने का मन बनाया था।
‘लंच कर लो।’ बलजीत ने आवाज़ दी।
मैं डायनिंग टेबल पर जा बैठा। हम दोनों के बीच एक चुप पसरी है। बलजीत का गुस्सा है और मेरा सोचना।
‘पक्के तौर पर ही जाकर रह लो वहां, यहां तो तुम्हारा कोई है ही नहीं।’ वह फिर अपना राग अलापने लगी।
‘बल्ली, समझा कर…मां से मिलने जा रहा हूं।’
‘मां से मिलने जाने का तो बहाना है। उसके पास तो तुम बैठे नहीं रहोगे। इधर-उधर ही घूमते फिरोगे। इतने दिन वहां क्या करना है? दो-चार वीक की छुट्टी बहुत होती है।’ वह छुट्टी कम करने की जिद पकड़े बैठी थी।
‘देख बल्ली, हम साठ को पहुंचने वाले है। न महंगे कपड़ों का शौक और न महंगी गाड़ियों का। और कोई ऐब मैंने पाला नहीं। देहतोड़ कमाई की, घरबार बनाया। बच्चों की ज़रूरतें पूरी कीं। अब बच्चे बड़े हो गए। अपना बोझ उठाने योग्य हो गए हैं।’
‘अभी बेटियों की शादी की है, बेटा ब्याहने वाला है। कल को लड़कियों के दिन-त्योहार आएंगे, अभी सब कुछ छोड़ देंगे तो गुज़ारा नहीं होगा।’ मैं उसको और वह मुझको समझा रही थी।
‘यदि ये अपने फर्ज़ हैं तो वह सबसे पहला और बड़ा फर्ज़ है। हम आज अपने मां-बाप के दिल की थाह पाने की कोशिश करेंगे, तभी कल हम अपने बच्चों से भी उम्मीद कर सकते हैं। लड़कियां विवाह करवा कर अपने घर चली गईं। लड़का भी करवा कर अपने घर चला जाएगा। अपने लिए बहुत है।’
‘लड़के ने कहां जाना है? मैं तो उसको अपने से दूर न करूं।’
‘तू अपने बेटे को आंखों से दूर होने नहीं देना चाहती और खुद किसी मां के बेटे को साल में दो महीने भी अपनी मां के पास रहने नहीं देना चाहती। कभी उस मां की जगह भी खड़ी होकर देख, कल को अपनी बहू-बेटे को हमारे पास न आने दे, तब तेरे दिल पर क्या बीतेगी?’
‘मैं तो मर जाऊंगी।’ बलजीत उदास हो गई।
‘उधर वो मां हर साल मुझसे बिछड़ते हुए मरती है कि पता नहीं, अगली बार मिलूंगी भी या नहीं।’
‘तुम उसे यहां बुला लो।’ वह मेरी वेदना को समझ रही थी।
‘पहले आई तो थी। तेरे सामने की बात है, उसका यहां दिल ही नहीं लगा। उसने जो दो-चार साल जीने हैं, वे भी नहीं जी सकेगी। रिश्तों को जितनी आज़ादी देंगे, वे मोह की हवा में उतना ही लहलहाएंगे। यदि इनको अमरबेल की तरह अपने बाहुपाश में कसकर रखने की कोशिश करेंगे तो ये मुरझा कर सूख जाएंगे।’
‘मैं भी छुट्टी का पता करती हूं। मैं भी मिल आऊंगी।’ उसने मेरा हाथ पकड़कर सहमति दी।
उसकी आंखों में माफ़ी के भाव थे और बेटे से बिछुड़ने का डर भी।
अनुवाद : सुभाष नीरव

