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यादों के उस पार

कहानी

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चित्रांकन संदीप जोशी
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रामबाबू की आंखों में हल्की-सी नमी थी पर इस बार वह नमी दुख की नहीं समय पर सही निर्णय लेने की थी। खिड़की से आती चांदनी अब धीरे-धीरे सरक रही थी पर उनके भीतर एक नया उजास जन्म ले चुका था। शकुंतला अब भी थी उनकी यादों में, स्पर्श में और उस मौन में जो अब अकेलापन नहीं रहा था। उन्होंने शकुंतला की तस्वीर पर नज़र डाली और धीरे से फुसफुसाया... ‘शकुन्तला तुम कहती थी पुरानी यादों को खत्म नहीं करोगे तो नई यादों के लिए जगह कहां से बनेगी। मैं जा रहा हूं तुम्हारे बेटे के पास रहने के लिए… नई यादें बनाने के लिए पर शकुंतला स्मृतियां कभी समाप्त नहीं होतीं। वे बस जीवन के दूसरे किनारे पर हमारा इंतज़ार करती रहती हैं।’

पूर्णिमा का चांद अपनी समूची आभा के साथ आकाश में निस्तब्ध टंगा हुआ था। खिड़की पर लगा पर्दा आधा खुला आधा ढका-सा था। मानो भीतर और बाहर के संसार के बीच कोई मौन संवाद चल रहा हो। उस खुले हुए हिस्से को छूती चांदनी झीने पर्दे को बिना किसी संकोच बिना किसी रोक-टोक के कमरे में प्रवेश कर गई और धीरे-धीरे अपने कदम बढ़ाते हुए शकुंतला की तस्वीर पर आकर ठहर गई। पता नहीं यह भ्रम था या सच शकुंतला के चेहरे पर मासूम मुस्कान बिखर गई।

कमरे में एक गहरा, ठहरा हुआ सन्नाटा था जिसे केवल दीवार पर लगी घड़ी की मद्धिम टिक-टिक भंग कर रही थी। हर टिक जैसे समय के आगे बढ़ने का प्रमाण दे रही थी, पर रामबाबू के भीतर का समय जाने कब का ठहर चुका था। तस्वीर में शकुंतला मुस्कुरा रही थी। सफ़ेद चांदनी के स्पर्श से वह मुस्कान और भी जीवंत हो उठी थी। लगा मानो वह अभी बोल पड़ेगी।

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रामबाबू ने करवट बदली उनके बगल के हिस्सा सूना पड़ा हुआ था ठीक उनके जीवन की ही तरह... आंसू का एक कतरा उनकी आंखों के कोर से ढुलक गया और उनके तकिये को भीगो गई। उन्होंने धुंधलाती आंखों से सामने की दीवार पर लगी अपनी पत्नी की तस्वीर की ओर देखा। सफेद सफ़ारी सूट पहने रामबाबू और सुनहरे पाड़ वाली छींटदार साड़ी पहने शकुंतला तस्वीर में मुस्कुरा रही थी। वह मुस्कान अब स्मृति का स्थिर बिंब बन चुकी थी।

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शकुंतला ने कितने मन से यह फोटो खिंचवाई थी पर क्या पता था यह उसकी आखिरी तस्वीर होगी।

‘सर! ज़रा मुस्कुराइए…।’

फोटोग्राफर ने कहा था। रामबाबू संकोच में स्थिर खड़े थे। शकुंतला ने कोहनी मारते हुए फोटोग्राफर की तरफ देख कर कहा था।

‘बेटा कभी किसी पति को पत्नी के साथ मुस्कुराते देखा है!’

शकुंतला की बात सुनकर रामबाबू मुस्कुराए बिना नहीं रह सके। उसने हौले से रामबाबू के कान में कहा था।

‘कम से कम आज तो मुस्कुरा दीजिए।’

उसकी हंसी में जीवन की सरलता थी, अपनापन था, और एक अदृश्य आग्रह भी। उस दिन रामबाबू के होंठों पर जो मुस्कान आई थी वही अब इस तस्वीर में कैद थी। उन्हें क्या पता था वह क्षण एक दिन स्मृतियों की गहरे पन्नों में छप जाएगा। उसी तस्वीर को सलीके से अलग करके शकुंतला की तेरहवीं के लिए तस्वीर बनवाई गई थी। ठीक बगल में लगी उसकी उस तस्वीर पर चंदन की माला सजी हुई थी। फोटोग्राफर ने तस्वीर तो अलग कर दी पर रामबाबू की शकुंतला से जुड़ी स्मृतियों को अलग करने का हुनर उसके पास भी नहीं था।

शकुंतला के जाने के बाद नींद जैसे उनसे रूठ चुकी थी। नींद का नामोनिशान नहीं था। तीन दिन हो गए थे पलकें थककर बोझिल हो चुकी थी पर नींद में तब भी उनकी आंखों में विश्राम नहीं किया था। घर का कोना-कोना किसी की अनुपस्थिति से भरा हुआ था। बेडरूम की वह आराम कुर्सी जहां वह बैठकर टीवी देखा करती थी। रसोई का वह कोना जहां चूड़ियों की खनक की आवाज के साथ उसके हाथों के बने स्वादिष्ट भोजन की महक पूरे घर में गमकती थी। सब कुछ अब मौन था पर उस मौन में भी सिर्फ़ उसका स्वर ही सुनाई देता था।

रामबाबू ने घड़ी की तरफ देखा आधी रात बीत चुकी थी पर नींद का पता नहीं था उन्होंने करवट बदल ली। तभी उन्हें कुछ याद आ गया और उस याद के साथ चेहरे पर एक मुस्कुराहट भी… यादों की परतें धीरे-धीरे खुलने लगीं। स्मृतियों का बिछौना उनकी आंखों के सामने बिछा हुआ था।

घर के कामों को निपटाते-निपटाते जब वह अपने कमरे में आती, दिनभर काम से बोझिल और थके रामबाबू उनका इंतजार करते मिलते।

‘ये रहा आपका गर्म दूध…!’

‘तुम यह क्या रोज-रोज दूध लेकर आ जाती हो!’

रामबाबू ने खींझकर कहा था।

‘खाना खाने के बाद पेट में जगह कितनी रह जाती है! ऊपर से एक गिलास दूध… तुम ही बताओ किस पेट में पियूं!’

रामबाबू ने शकुंतला की आंखों में आंखें डालकर पूछा था।

‘सुबह पेट साफ नहीं होगा तो दिन भर चिड़चिड़ मचाएंगे। कल से दूध नहीं लाऊंगी। अब चुपचाप दूध पी लीजिए और सो जाइए।’

रामबाबू उसके बाद बिना बहस किए एक सांस में दूध गले के नीचे उतार देते। जानते थे बहस का कोई फायदा नहीं था। कभी भी झूठ न बोलने वाली शकुंतला इस मामले में रोज़ झूठी साबित होती थी। वह रोज़ नियम से उनके लिए दूध लाकर देती। जब तक रामबाबू दूध पीते तब तक शकुंतला बाथरूम में कपड़े बदलने चली जाती। जब तक वह लौट कर आती रामबाबू सो चुके होते थे। दिनभर रामबाबू के आने का इंतजार करती हुई शकुंतला रामबाबू को सोता हुआ देख झुंझला जाती।

‘बच्चों जैसी नींद मिली है बिस्तर पर पड़े नहीं की तुरंत सो जाते हैं। यहां तो नींद को न्योता देकर बुलाना पड़ता है। तब भी पता नहीं होता।’

शकुंतला रामबाबू को सोता हुआ देखकर सोचती दिन भर के थके रहते हैं शायद इसीलिए नींद आ जाती होगी। कितनी ही रातों में जब प्यास से सूखते गले को तर करने के लिए उन्होंने हाथ बढ़ाया। शकुंतला ने झट से उन्हें गिलास पकड़ा दिया था।

‘अरे तुम सोई नहीं, अभी तक जाग रही हो!’

शकुंतला उनके सवाल को परे झटक तुरंत कहती

‘हमारी ऐसी किस्मत कहां कि तुरंत नींद आ जाए।’

फिर दूसरे ही पल उनकी सिर को सहलाते हुए कहती,

‘थक गए हैं न आप…...’

‘तुम भी तो थक गई हो।’

‘मेरा क्या है मैं तो घर पर ही रहती हूं। आप तो घर चलाने के लिए कितनी मेहनत करते हैं।’

रामबाबू कभी-कभी सोचते शकुंतला के अलावा किसी ने उनकी मेहनत को मेहनत कहां समझा था। बच्चों को हमेशा शिकायत ही रहती थी उनकी ज़रूरतें सुरसा के मुंह की तरह दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही थी। बच्चों की जरूरत को पूरा करने के लिए उन्होंने ओवर टाइम करना शुरू कर दिया था। अपनी जिंदगी के जिन घंटों पर शकुंतला का अधिकार था बच्चों की जरूरत और ओवरटाइम के नाम पर कुर्बान हो गई थी। सोचा था रिटायरमेंट के बाद सारा वक्त शकुंतला के नाम पर खर्च करेंगे पर शकुंतला अपना जीवन मृत्यु के नाम पर खर्च करके उन्हें अकेला छोड़ जा चुकी थी। शकुंतला अक्सर कहती थी।

‘पुरानी यादों को खत्म नहीं करोगे तो नई यादों के लिए जगह कहां से बनेगी।’

वह पूछना चाहते थे जब नई यादों को बनाने का वक्त आया तो तुम निर्मोही की तरह हाथ छुड़ाकर इस संसार से विदा हो गई। नई यादों को बनाने का तुमने वक्त ही कहां दिया! फिर पुरानी यादों को याद करना उनकी मजबूरी ही नहीं जरूरत भी थी।

आज शाम को ही निखिल का फोन आया था।

‘पापा बार-बार आपके पास दौड़कर आना संभव नहीं है। मेरी और ऋतु की नौकरी में छुट्टी मिलना संभव नहीं हो पाता। यहां हर तरह की सुविधा है। पहले की बात अलग थी, अब तो मम्मी भी नहीं रही। आप यहां आकर क्यों नहीं रहते?’

‘सुविधा…!’

जिस उम्र में इंसान को सुविधाओं से ज्यादा अपनों की जरूरत होती है उस समय वह पूरी तरह से अकेले थे। शकुंतला ने कितनी बार कहा था बीच-बीच में बच्चों के पास हो आया करें। वरना बुढ़ापे में उनके पास रहने जाएंगे तो उन्हें भी अच्छा नहीं लगेगा।

‘हम-तुम है न एक-दूसरे की सेवा के लिए…।’

और शकुंतला उनकी बात सुनकर खिल-खिलाकर हंस पड़ती। उसका हंसना जायज़ भी था।

‘आप! आप सेवा करेंगे! जिसने जिंदगी में अपनी पत्नी को एक गिलास पानी न दिया हो वह सेवा करेगा!’

सच ही तो कहा था शकुंतला ने… उस युग के बच्चों की परवरिश ही इस तरह से होती थी। लड़के घर का काम सीख नहीं पाते थे, सच कहूं तो कोई सीखने भी कहां देता था। रामबाबू अपने बेटे को बहू के साथ बराबर से घर का काम निपटाते देखते तो शुरू-शुरू में उन्हें अपने बेटे पर बहुत गुस्सा आता था पर बाद में उन्हें खुद पर बड़ी शर्म आई थी।

वह आत्मग्लानि से भर गए थे। काश! उन्होंने भी अपनी पत्नी के साथ कामों में हाथ बंटाया होता। जिंदगी की भाग-दौड़ में उन दोनों के साथ वक्त बिताने का वक्त ही नहीं मिला था। घर के छोटे-छोटे कामों में एक-दूसरे के साथ बिताए पल एक-दूसरे को समझने के लिए काफी थे। रामबाबू को यह बात समझ में आई तो थी पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। रामबाबू ने पलट कर देखा उन्हें अपने ही जीवन से शिकायत होने लगी थी। हज़ारों सवाल उनके वजूद पर डंक मारने लगे थे। क्या उन्होंने सचमुच जीवन जिया था या केवल जिम्मेदारियां निभाई थीं? उन्होंने कभी शकुंतला के साथ बैठकर दो पल बिताए थे, उसके अपने पल...…

अब जब वह नहीं थी, तब उसकी हर छोटी-छोटी बातें याद आ रही थीं। आज चाहकर भी वह वक्त वापस नहीं आ सकता था। वैसे भी वक्त अपने लिए निर्णय वापस नहीं लेता। चांदनी कमरे में फैली थी और शकुंतला के साथ बिताए दिनों की स्मृतियां पूरे घर मेरे यहां-वहां फैली हुई थी। रामबाबू चाह कर भी नई यादें नहीं बना पा रहे थे।

शकुंतला कहती थी, ‘गर्म दूध पीने से नींद अच्छी आती है रामबाबू धीरे से उठे। रसोईघर ने अजनबियत से उन्हें देखा। ऐसा नहीं था कि वह रसोईघर में आते-जाते नहीं थे। शकुंतला के इस दुनिया से जाने के बाद अक्सर उनका इस ओर आना होता था पर इस वक्त! रामबाबू ने कांपते हाथों से दूध गर्म किया और गिलास लेकर तस्वीर के सामने बैठ गए। वह सोच रहे थे किसी ने सच कहा है कि मकान को घर एक औरत ही बनाती है। इस मकान को घर बनाने में शकुंतला ने अपना सब कुछ दे दिया था पर उसके जाते ही यह घर फिर से मकान बन चुका था। वह इस घर से अकेले नहीं गई थी इस घर की आत्मा भी अपने साथ ले गई थी।

रामबाबू एकटक शकुंतला की तस्वीर को निहारते रहे। उनके होंठ धीरे से हिले और फुसफुसाए...

‘शकुंतला! तुम कहती थी न मुझे गैस भी जलाने नहीं आती। देखो मैंने दूध गर्म करना सीख लिया है।’

कहते-कहते उनकी आवाज़ भर्रा गई। उन्होंने ग़िलास अपने होंठों तक लाया पर गिलास होंठों तक लाते हुए उनका हाथ कांप गया और दूध की एक बूंद नीचे गिर पड़ी। वह महज़ एक बूंद नहीं मानो जैसे समय की किसी दरार से उनका अपना अतीत रिस कर सामने आ गया था। वे चुपचाप बैठे कुछ सोचते रहे और फिर उन्होंने एक गहरी लंबी सांस ली।

‘टक-टक...’

और जैसे मन के भीतर कोई गांठ एक-एक कर खुल गई। सब कुछ साफ़-साफ़ दिख रहा था। उन्होंने फोन उठाया।

‘हेलो निखिल…!’

‘पापा आपने इस वक्त फोन किया! आप ठीक तो हैं न...?’

निखिल की आवाज़ में अपने पिता के लिए चिंता थी, बेचैनी थी। इस चिंता इस बेचैनी ने रामबाबू को अंदर तक आश्वस्त किया था। रिश्तों की गर्माहट आत्मीयता अभी भी उन दोनों के बीच बाकी थी, जिंदा थी।

‘बेटा मैं तुम्हारे पास रहने आना चाहता हूं।’

निखिल की आवाज़ में आश्चर्य और खुशी दोनों थी।

‘सच पापा?’

रामबाबू की आंखों में हल्की-सी नमी थी पर इस बार वह नमी दुख की नहीं समय पर सही निर्णय लेने की थी। खिड़की से आती चांदनी अब धीरे-धीरे सरक रही थी पर उनके भीतर एक नया उजास जन्म ले चुका था। शकुंतला अब भी थी उनकी यादों में, स्पर्श में और उस मौन में जो अब अकेलापन नहीं रहा था। उन्होंने शकुंतला की तस्वीर पर नज़र डाली और धीरे से फुसफुसाया...

‘शकुन्तला तुम कहती थी पुरानी यादों को खत्म नहीं करोगे तो नई यादों के लिए जगह कहां से बनेगी। मैं जा रहा हूं तुम्हारे बेटे के पास रहने के लिए… नई यादें बनाने के लिए पर शकुंतला स्मृतियां कभी समाप्त नहीं होतीं। वे बस जीवन के दूसरे किनारे पर हमारा इंतज़ार करती रहती हैं।’

शकुंतला हमेशा की तरह तस्वीर में मुस्कुरा रही थी। शकुन्तला अब तस्वीर बन चुकी थी पर उसकी उपस्थिति अब भी घर के कोने-कोने में थी।

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