दीवार में एक खिड़की रहती थी,
अनगिन नज़ारे देखना चाहती थी,
पर देख पाती थी बस इमली का पेड़,
इमली के पेड़ पर पड़ा झूला और
सुहावने मौसम में उस पर झूलते बच्चे।
कभी-कभी एक हाथीवाला
निकलता था वहां से,
अक्सर अमावस या एकादशी पर;
एक सुन्दर-सा युवक,
भगवा चोले में थैला लिए,
कभी-कभी हाथी पर बैठा होता,
तो कभी उसके साथ चलता।
कई बार दो-तीन औरतें हफ्ते दो हफ्ते में,
बातें करते-करते खिड़की के पास ठहर जातीं,
बातों-बातों में सिर पर रखे
भारी-भरकम बोझ भूल कर,
मन हल्का करने में मग्न रहतीं।
कभी-कभी शादी-ब्याह के दिनों में,
बारात, विदाई भी गुज़रती वहां से,
खूब भाती थी बारातें खिड़की को।
कभी बारिश तूफ़ान में, तो कभी तेज़ धूप में,
खिड़की को खुला रहना ही भाता था।
हां, कभी-कभी किसी मृत व्यक्ति को
ले जाते समूह को देख,
खिड़की दुखी हो जाती थी,
और चाहती थी कि ये कपाट बंद कर लूं,
और ये दयनीय दृश्य कभी न देखूं।
पर ऐसा कभी हुआ है भला?
सुख-दुःख तो दुनिया की रीत हैं,
कितना भी भागो-चाहो,
पर ये कभी छूटते नहीं।
खैर, खिड़की को झूले पर झूलते,
हंसते-खेलते, एक-दूसरे से
ठिठोली करते बच्चे, बड़े भाते थे।
उसका भी मन करता था बाहर जाकर
उनके साथ खेलने, हंसने, बातें करने का।
फिर एक दिन एक बूढ़ी अम्मा ने
उसके पास आकर पूछा,
‘बाहर जाकर झूले पर
बच्चों के साथ खेलोगी?’
खिड़की झट से बोली,
‘हां, जाना तो है पर कैसे?
तुमने कैसे जाना मेरे मन की इच्छा को?’
‘और हां, जाऊंगी कैसे? न मुंह, न सिर, न पैर,
न हाथ, न बाजू, जाऊंगी कैसे, झूलूंगी कैसे?’
अम्मा बोली, ‘मैं परियों के देश से आई हूं,
चाहो तो जादू से भेज दूंगी तुम्हें।’
खिड़की की ख़ुशी का कोई ठिकाना न रहा,
पूछा, ‘अभी चलें?’
अम्मा बोली, ‘न रे, रात में जब सब सो जाएं,
मुझे पुकारना, मैं आ जाऊंगी...’
रात घिरी और खिड़की ने अम्मा को पुकारा,
अम्मा ने वादे के मुताबिक,
एक छोटी-सी लड़की बनाकर
उसे झूले के पास छोड़ दिया,
फिर बोला, ‘सुबह आऊंगी तुम्हें लेने...’
भोर होते ही अम्मा उसे लेने पहुंची,
खिड़की तो नहीं, पर देखा,
बालों के गुच्छे, और सने हुए कपड़े,
खिड़की के ठिकाने पहुंची तो,
टूटी हुई खिड़की के किवाड़ अंदर से बंद थे।
अब खिड़की दीवार में
आंख-मुंह बंद करके
बस अंदर रहती थी, पर अभी भी
दीवार में एक खिड़की रहती थी।

