पंकज बिष्ट पर संस्मरण लिखते हुए डरता हूं क्योंकि वह केवल एक आदमी पर नहीं होगा। पंकज बिष्ट कई आदमियों को मिलाकर बनाए गए हैं। पहला आदमी है प्रताप सिंह बिष्ट। दूसरा आदमी है पीएस बिष्ट। तीसरा है पंकज बिष्ट। जो आदमी तीन आदमियों को मिलाकर बनाया गया हो उसके बारे में लिखना कितना मुश्किल है?
सबसे पहले प्रताप सिंह बिष्ट के बारे में लिखना चाहता हूं। वे कुमाऊं क्षेत्र के दबंग ठाकुर हैं। जान चली जाए पर बात न जाए। अच्छे-खासे धाकड़ हैं। कोई बात अच्छी नहीं लगी तो आस्तीनें चढ़ा लेते हैं। साहस और नैतिक बल गज़ब का है।
उनके अंदर न्याय के प्रति एक बलवती प्रवृत्ति है। वह अन्याय और अत्याचार को सहन नहीं कर सकते और जवानी की बात छोड़ दीजिए, प्रताप सिंह बिष्ट बुढ़ापे में भी चोर-उचक्के को पानी पिला देते हैं। प्रताप सिंह दोस्ती और दुश्मनी को बहुत अच्छी तरह समझते हैं, इसलिए उनके दोस्त दोस्त हैं और दुश्मन दुश्मन।
बहुत पुरानी बात है। लगभग सन सत्तर के आसपास, मैं पंकज बिष्ट से मिला था। किसने मिलवाया था? कब मिला था? यह सब याद नहीं है। पंकज बिष्ट स्वतंत्र वामपंथी थे और मेरे विचार से आज भी स्वतंत्र वामपंथी हैं। मैं भी वामपंथी था और थोड़ा बहुत आज भी हूं।
कुछ दोस्तों के पास नौकरियां थीं और कुछ के पास नहीं थी। पंकज बिष्ट राजपत्रित अधिकारी रहे हैं। इसलिए वे अक्सर उन दोस्तों की कॉफी का पैसा दे दिया करते थे जिनके पास पैसे न होते थे।
वामपंथी राजनीति और साहित्य तथा समाज के बाद फिल्में हमारे लिए आकर्षण का बहुत बड़ा विषय थीं। हम सब छड़े थे। किसी की गर्लफ्रेंड होना हमारे लिए इतनी बड़ी बात थी कि हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते थे। पंकज बिष्ट की गर्लफ्रेंड जब कॉफी हाउस आती थी तब वे उनके साथ फैमिली सेक्शन में चले जाते थे और हम लोग उनको केवल आते-जाते देखते थे। मित्र मंडली में यह भी पता चला था कि पंकज बिष्ट की प्रेमिका गुजराती है। गुजराती है और डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही है—ये दोनों तथ्य भी हम लोगों के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण थे।
उस जमाने में और आजकल भी पंकज बिष्ट बहुत स्मार्ट और आकर्षक व्यक्ति हैं। वह अपना ध्यान भी रखा करते थे। जवानी के जमाने में उन्हें अच्छे कपड़े, सुरुचिपूर्ण कपड़े पहनने और ढंग से रहने का शौक था।
कॉफी हाउस के ज़माने में मैं काफी समय तक बेकार रहा। कोई नौकरी नहीं थी। फ्री-लांसिंग करता था। उस ज़माने में पंकज बिष्ट ने मेरा साथ दिया। ‘आजकल’ पत्रिका में यदा-कदा छाप कर मेरी मदद की और दूसरी पत्रिकाओं में लिखने के लिए भी प्रेरित किया। सन 1971 में मुझे जामिया में नौकरी मिल गई थी और उसके बाद स्थिति कुछ सामान्य हो गई थी। पंकज बिष्ट के ऑफिस भी आना-जाना कायम था। पंकज बिष्ट ‘आजकल’ के लिए किताबों की समीक्षाएं कराते थे और कभी-कभी मेरी रचनाएं भी छाप देते थे। पंकज बिष्ट ‘आजकल’ में नौकरी तो करते थे लेकिन खुश नहीं थे। उन्हें लगातार यह लगता था कि जो करना चाहिए वह काम नहीं कर रहे। सरकारी दफ्तरों की उठापटक और छल प्रपंच से वह दुखी रहते थे।
इमरजेंसी के जमाने की बात है। हम कुछ दोस्तों के दिमाग में यह खयाल आया कि हमें एक कहानी संकलन छपाना चाहिए। योजना बनी कि पंकज बिष्ट, मंगलेश डबराल, मोहन थपलियाल तथा मेरी कहानियों का एक संकलन बनाया जाए। एक नए मित्र प्रकाशन का काम शुरू करने वाले थे। उन्होंने हमारी किताब छापने का आश्वासन दिया, लेकिन यह बात भी तय हो गई कि सभी लोग दो-दो सौ रुपए देंगे तब किताब छप पाएगी। योजना आगे बढ़ती रही। धीरे-धीरे मंगलेश डबराल और मोहन थपलियाल इस योजना से अलग होते चले गए। मैं और पंकज बिष्ट रह गए। यह संकलन ‘अंधेरे से’ के नाम से प्रकाशित हुआ था। संकलन का उम्मीद से अधिक स्वागत किया गया था। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने ‘दिनमान’ में इसकी समीक्षा की थी जो उन दिनों बड़ी बात थी।
धीरे-धीरे मेरी और पंकज बिष्ट की दोस्ती एक मिसाल बन गई। साहित्य के सर्किल में समझा जाने लगा कि मैं और पंकज बिष्ट एक सिक्के के दो पहलू हैं। इस दोस्ती से कुछ लोगों को ईर्ष्या होने लगी और ऐसा करने वालों में सबसे प्रमुख थे राजेंद्र यादव।
हक, इंसान, सच्चाई, ईमानदारी के लिए पंकज बिष्ट का ‘कमिटमेंट’ बड़ा पक्का है। इसकी दो मिसालें दी जा सकती हैं। कोई पच्चीस-तीस साल पहले की बात है, हिंदी के कवि मान बहादुर सिंह की बड़ी निर्मम हत्या उनके ही इलाके के एक बाहुबलि नेता ने कर दी थी। लेखक संगठन इस अपराध पर केवल बयान देकर खामोश हो गए थे। हत्यारा छुट्टा घूम रहा था। पुलिस सब कुछ जानते हुए भी अनजान बनी हुई थी। यह स्थिति पंकज बिष्ट के लिए असहनीय बन गई थी। एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि ये लेखक संगठन कुछ न करेंगे। लेखकों को आगे आना पड़ेगा। बातचीत के बाद तय किया गया कि लेखक मान बहादुर सिंह के गांव जाकर प्रतिरोध सभा करें। पुलिस पर दबाव बनाएं कि हत्यारे को गिरफ्तार किया जाए। पंकज बिष्ट की सक्रियता में और लोग भी जुड़ गए। सबने अपना-अपना किराया दिया। गांव में बहुत बड़ी सभा हुई। निशांत ग्रुप ने नाटक किए। इस प्रदर्शन का प्रभाव यह पड़ा कि पुलिस ने अपराधी को गिरफ्तार किया।
पंकज बिष्ट शायद 1965-66 से कहानियां लिख रहे हैं। उनकी कहानियों में सामाजिक जीवन की विसंगतियों के मार्मिक चित्र उभरते हैं। ‘अंधेरे से’ की कहानियों के बाद उनकी रचनाओं में एक नया मोड़ आया था। इसी दौरान उनका उपन्यास ‘लेकिन दरवाज़ा’ छपा।
पंकज बिष्ट जादुई यथार्थवाद से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने एक खास तरह की कहानियां लिखना शुरू कर दिया, लेकिन अपने पहले उपन्यास की सफलता ने उन्हें दूसरा उपन्यास लिखने की प्रेरणा दी और ‘उस चिड़िया का नाम’ से उनका एक और उपन्यास सामने आया।
अपने आप से किए गए वायदे कम ही लोग निभाते हैं पर पंकज बिष्ट ने निभाया—मतलब बीस साल की नौकरी के बाद जब उनके कैरियर का स्वर्णिम युग शुरू होने वाला था, तब उन्होंने स्वैच्छिक रिटायरमेंट ले लिया और अपनी पत्रिका ‘समयांतर’ निकालना शुरू किया। यह काम वे बड़ी लगन और मेहनत से करते रहे और आज भी कर रहे हैं। ‘समयांतर’ ने हिंदी जगत और विशेष रूप से बौद्धिक जगत में अपना एक स्थान बनाया है।
(लेखक हिंदी के चर्चित साहित्यकार हैं। साभार : आजकल)

