डॉ. जयभगवान शर्मा ने अपने नवीनतम खंडकाव्य ‘पुरंजन’ में श्रीमद् भागवत के भूप पुरंजन जैसे रसहीन और कठिन आख्यान को रसवान काव्यकृति में ढालकर निश्चय ही अनुकरणीय कार्य किया है। इस वृत्तांत में पुरुष (जीव) और प्रकृति (माया) को पुरंजन और पुरंजनी यानी नर और नारी के रूप में रूपायित करके सृष्टि के उपक्रम का निरूपण किया गया है। लेखक ने दर्शन-शास्त्र संबंधी इस रम्य रचना में आत्मा, अनात्मा, ब्रह्म, जगत, धर्म, मृत्यु और मोक्ष आदि विषयों का सांगोपांग विवेचन किया है।
अध्यात्म जैसे वृहद विषय पर केंद्रित इस कविताई को काव्यानुवाद की बजाय काव्य-भावानुवाद कहना ज्यादा सही है। सांख्य में वर्णित सृष्टि के सृजन, संचालन और संहार की स्थिति को कृति में सरल एवं संक्षिप्त ढंग से समझाया गया है, जिससे पता चलता है कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड किसी दिव्य ऊर्जा का प्रत्यक्षीकरण है और प्रकृति सबसे बड़ी रचयिता है।
सात सर्गों में बंटी इस रचना के पहले सर्ग में प्रकृति की सोहन और रंजक छवि का अंकन देखने योग्य है। इसमें प्रकृति के सौंदर्य, जैसे वृक्षों, लताओं, पुष्पों, कीट-पतंगों, झरनों, सरोवरों, नदियों और विभिन्न पशु-पक्षियों आदि की चेष्टाओं का वर्णन आलंकारिक शैली में किया गया है।
दूसरे सर्ग में पुरुष एवं प्रकृति की विलासमयी क्रीड़ाओं का चित्रण है, जिसमें संयोग-शृंगार का बाहुल्य है। तीसरे सर्ग में सुख-चैन संबंधी सुखानुभव का चरम बिंदु दर्शाया गया है। चौथे सर्ग में पुरुष की निर्दयता और उसकी कामुक वृत्ति चित्रित हुई है। रूठने-मनने और मिन्नत-समाजत के भाव भी इसमें प्रमुखता से उभरे हैं। पांचवें सर्ग में सांसारिक प्रेम और व्यामोह का अंत दिखाकर वृद्धावस्था की कष्टकारक खींचातानी का ख़ाका खींचा गया है। छठे सर्ग में काम-लिप्सा से वृद्ध, जर्जर और शिथिल हुए पश्चातापी पुरुष की अधोगति दिखाई गयी है। अंतिम सर्ग में सारांश के तौर पर सांख्य की कठिन गांठों को सहजता से सुलझाने की कोशिश की गई है।
पुस्तक : पुरंजन (खंडकाव्य) लेखक : डॉ. जयभगवान शर्मा प्रकाशक : निर्मला प्रकाशन, चरखी दादरी पृष्ठ : 100 मूल्य : रु. 300.

