हेरम्ब चतुर्वेदी का ऐतिहासिक उपन्यास ‘सुल्तान रज़िया : रज़ियात-उद-दुनिया वा-उद-दीन’ केवल एक शासक की जीवनी नहीं, बल्कि मध्यकालीन भारतीय समाज, सत्ता-संघर्ष और स्त्री-अस्मिता की मार्मिक दास्तान है। लेखक ने इतिहासकार होने के नाते तथ्यों की विश्वसनीयता को बनाए रखते हुए रज़िया सुल्तान के व्यक्तित्व को संवेदनात्मक और मानवीय धरातल पर प्रस्तुत किया है। यह उपन्यास इतिहास और साहित्य के संतुलन का उत्कृष्ट उदाहरण बनकर सामने आता है।
उपन्यास में रज़िया को केवल एक महिला शासक के रूप में नहीं, बल्कि एक सक्षम, दूरदर्शी और संघर्षशील व्यक्तित्व के रूप में चित्रित किया गया है। रज़िया सुल्तान भारतीय मध्यकालीन इतिहास की वह अद्वितीय शासक हैं, जिन्होंने पुरुष-प्रधान सत्ता-व्यवस्था को चुनौती दी। सुल्तान रज़िया के जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष उनका ‘महिला होना’ था। उनके पिता शम्सुद्दीन इल्तुतमिश ने उनकी योग्यता को पहचानते हुए उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया, लेकिन तत्कालीन अमीरों, तुर्क सरदारों और उलेमाओं ने इसे स्वीकार नहीं किया। लेखक ने इस सामाजिक और राजनीतिक विरोध को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है।
हेरम्ब चतुर्वेदी की भाषा में इतिहास की गंभीरता के साथ कथा का प्रवाह भी बना रहता है। उपन्यास में संवाद और प्रसंग इतने जीवंत हैं कि पाठक स्वयं को दिल्ली सल्तनत के दरबार में उपस्थित महसूस करता है।
लेखक ने रज़िया की त्रासदी को केवल व्यक्तिगत नहीं रहने दिया, बल्कि उसे पूरे मध्यकालीन समाज की मानसिकता से जोड़ दिया है। सत्ता के केंद्र में बैठी एक महिला को किस प्रकार संदेह, षड्यंत्र और सामाजिक पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ा, इसका प्रभावशाली चित्रण उपन्यास में मिलता है। कुल मिलाकर, ‘सुल्तान रज़िया’ इतिहास, नारी संघर्ष और सत्ता की विडंबनाओं का सशक्त आख्यान है।
पुस्तक : सुल्तान रज़िया : रज़ियात-उद-दुनिया वा-उद-दीन लेखक : हेरम्ब चतुर्वेदी प्रकाशक : लोक भारती, प्रयागराज पृष्ठ : 160 मूल्य : रु. 250.

