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प्रकृति के प्रति कृतज्ञता की काव्य यात्रा

पुस्तक समीक्षा

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कवयित्री अर्चना कोचर का लघु कविता संग्रह ‘मैं पेड़ हूं’ अपने विषय, संवेदना और प्रस्तुति की दृष्टि से अत्यंत सार्थक एवं प्रभावशाली कृति है। यह संग्रह प्रकृति—विशेषकर पेड़ों के प्रति हमारी संवेदनहीन होती जा रही सोच पर एक गंभीर और जागरूक हस्तक्षेप है। कवयित्री ने पेड़ों को केंद्र में रखकर उनके सौंदर्य, उपयोगिता, सांस्कृतिक महत्व और मानवीय जीवन में उनकी अनिवार्यता को बेहद सरल, किन्तु प्रभावी भाषा में व्यक्त किया है।

अर्चना कोचर पेड़ों को केवल हरियाली का प्रतीक मानकर नहीं रुकतीं, बल्कि उन्हें जीवन का आधार, संवेदना का स्रोत और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में प्रस्तुत करती हैं। ‘मैं पेड़ हूं’ जैसी कविताओं में पेड़ स्वयं बोलते हुए प्रतीत होते हैं—वे अपनी पीड़ा, उपयोगिता और मानव से अपेक्षाएं व्यक्त करते हैं। यह मानवीकरण पाठक के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ता है और उसे प्रकृति के प्रति अधिक संवेदनशील बनने के लिए प्रेरित करता है।

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काव्य संग्रह में विभिन्न पेड़ों—जैसे नीम, पीपल, बरगद, अशोक, आम, अनार, नारियल आदि—के गुणों और उपयोगों का उल्लेख अत्यंत रोचक ढंग से किया गया है। इससे पाठक को न केवल साहित्यिक आनंद मिलता है, बल्कि ज्ञानवर्धन भी होता है। आयुर्वेदन, सांस्कृतिक और आर्थिक संदर्भों के माध्यम से कवयित्री ने यह स्पष्ट किया है कि पेड़ हमारे जीवन के हर पहलू से जुड़े हुए हैं—स्वास्थ्य, आस्था, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था तक।

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आज के समय में जब अंधाधुंध कटाई के कारण पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है, यह संग्रह एक चेतावनी भी है और एक प्रेरणा भी। लेखिका ने बड़े ही मार्मिक ढंग से यह दिखाया है कि पेड़ हमारे लिए कितना कुछ करते हैं, जबकि हम उनके अस्तित्व को ही खतरे में डाल रहे हैं। ‘मत काटो हमें’ जैसी भावनाएं पाठक के अंतर्मन को झकझोर देती हैं।

भाषा की दृष्टि से यह संग्रह अत्यंत सहज और संवादपूर्ण है। लघु कविताएं होने के कारण प्रत्येक रचना संक्षिप्त होते हुए भी सारगर्भित हैं। अलंकारों का प्रयोग जैसे अनुप्रास, पुनरुक्ति और मानवीकरण कविताओं को और अधिक प्रभावी बनाता है।

पुस्तक : मैं पेड़ हूं (काव्य संग्रह) कवयित्री : अर्चना कोचर प्रकाशक : इंडिया नेटबुक्स प्रा. लि. नोएडा पृष्ठ : 122 मूल्य : रु. 250.

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