समकालीन हिन्दी कविता में वे रचनाकार विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करते हैं जो बड़े विमर्शों के साथ-साथ मनुष्य के दैनिक जीवन और अनुभूतियों को भी कविता का विषय बनाते हैं। इन अनुभवों में मनुष्य की वास्तविक भावभूमि और जीवन की आंतरिक सच्चाइयां छिपी होती हैं।
कवि पवन करण के कविता-संग्रह ‘प्रतिनिधि कविताएं’ में 157 विविध विषयों से जुड़ी उत्कृष्ट रचनाएं संकलित हैं। आज बाज़ारवाद के प्रभाव में व्यक्ति बहुत बातें सीधे-सरल ढंग से सोच नहीं पाता। ऐसे में कवि उन पक्षों पर ध्यान आकर्षित करते हैं, जहां आत्मीयता और सरल संवेदनाएं सघन अनुभूतियों के रूप में प्रस्तुत होती हैं।- ‘फिर बड़े के आंसुओं को रौंदते हुए/ दुल्हन की डोली उस घर में पहुंची/ जो छोटे ने लिया था.../ किसी को नहीं थी खबर...।’
‘स्कूटर’, ‘छोटा भाई’, ‘पहलवान’ जैसी कई कविताओं में दिनचर्या और साधारण क्रियाकलाप सहज रूप से अभिव्यक्त हुए हैं।
‘पहलवान, इस एक संबोधन में/ उनका मूल नाम कहीं खो गया है... सभी उन्हें पहलवान साब कहते हैं...’
कविताओं के अंत पाठक को सोचने पर विवश भी करते हैं- ‘लेकिन तुम ही बताओ यार,/ ज़िंदगी के अंधेरे को काटने के लिए/ रात और यह आकाश/ कितना छोटा है।’
‘संदेश’ कविता में प्रकृति और विश्वास के संबंध को सुंदर प्रतीकों से अभिव्यक्त किया-‘धरती के कानों में/ बीज फुसफुसाए/ पानी.../ आसमान के कानों में/ पक्षी चिल्लाए/ पानी/ संदेश कानों-कान पहुंचा,/ पानी दौड़ा-दौड़ा आया।’
‘अपने विवाह की तैयारी’, ‘प्यार में डूबी हुई मां’, ‘मां का सावन’, ‘भाई का हाथ’, ‘त्योहार’ आदि में पारिवारिक संबंधों से जुड़े मार्मिक प्रेम भाव हैं। वहीं ‘एड़ियां’, ‘काली-मिर्च’ व अन्य में प्रेम भाव को अनूठे ढंग से प्रस्तुत किया है।
‘उस भले आदमी’, ‘अपने विवाह की तैयारी’, ‘बड़ी बुआ’, ‘बंटवारा’ में कहानी-सा अनुभव मिलता है। ‘नब्बे लाख’, ‘ताकतें’, ‘यदि’, ‘लड़ना’, ‘अपने भीतर’ जैसी कविताओं की वक्रोक्ति सुंदर है। राजनीति से जुड़े भाव प्रभावशाली हैं। कवि की गहन मानवीय दृष्टि पाठक मन को स्पर्श करती है।
पुस्तक : प्रतिनिधि कविताएं लेखक : पवन करण प्रकाशक : राजकमल पेपर बैक्स, नयी दिल्ली पृष्ठ : 160 मूल्य : रु. 199.

