खालिद जावेद के उर्दू नॉवेल ‘अरसलान और बहज़ाद’ का हिंदी अनुवाद इ़क़बाल हुसैन ने किया है। समकालीन उर्दू साहित्य में खालिद जावेद को बड़ा मुकाम हासिल है। वह उन लेखकों में हैं जो उपन्यास में पारंपरिक तौर पर विषयवस्तु या यूं कह लें, प्लॉट को विनिर्मित नहीं करते, बल्कि कथा को पात्रों के चरित्र के माध्यम से बुनते हैं। खालिद जावेद के लिए कथा दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक विमर्श का आधार बन जाती है। दरअसल, अरसलान और बहज़ाद मात्र पात्र नहीं हैं; उनके चरित्र के माध्यम से उपन्यासकार ने कथा में अस्तित्व, मृत्यु, स्मृति, अवचेतन आदि अवधारणाओं को विकसित करते हुए ‘जीवन की संभावनाओं को समझने का माध्यम’ बनाया है। इसलिए कहा जा सकता है कि कथा घटनाओं के क्रम में विकसित नहीं हुई है।
अनुभव का प्रवाह अरसलान और बहज़ाद को दो अलग-अलग पात्र नहीं रहने देता; वह दोनों मानव चेतना के द्वैत बन जाते हैं। इन चरित्रों के माध्यम से उपन्यासकार ने आत्म बनाम पराया, स्मृति बनाम वर्तमान, जीवन बनाम मृत्यु की महीन व्याख्या अत्यंत सघन और काव्यात्मक भाषा में की है।
अस्तित्ववादी चिन्तन शैली में रचित यह उपन्यास मृत्यु को जीवन की गहरी समझ का उपकरण मानकर चलता है। इस उत्तर-आधुनिक जादुई यथार्थ के ताने-बाने में रचे-बुने उपन्यास को निर्मल वर्मा की भांति खालिद जावेद की भाषा और बिंब योजना प्रतीकात्मक है। परंतु साधारण पाठकों को यह भाषा असुविधाजनक लग सकती है। इस संदर्भ में उपन्यासकार का यह कथन गौर करने योग्य है कि, ‘जो चीज आसानी से समझ आ जाए, उसे संदेह की नजर से देखना चाहिए।’ अतः पाठकों से यह अपेक्षित है कि वे भाषा की ‘कठिनता’ अथवा निहित वैचारिक ‘जटिलता’ को सजगता के साथ समझते हुए पाठ पढ़ें। हम यह भी कह सकते हैं कि यह ‘कठिनता’ अथवा ‘जटिलता’ ही इस उपन्यास का सौंदर्यशास्त्र है।
इ़क़बाल हुसैन का हिंदी अनुवाद उर्दू भाषा की काव्यात्मकता अथवा कह लें नफ़ासत को खड़ी हिंदी में बनाए रखने में किसी हद तक सफल है। यह अनुवाद दोनों भाषाओं की संस्कृति को संजोकर रखने का महत्वपूर्ण प्रयास है। हालांकि हिंदी में उर्दू जैसी नज़ाकत और काव्यात्मकता बनाए रखना आसान नहीं है। पंडित नेहरू ने जिस उर्दू–हिंदी मिश्रित हिन्दुस्तानी भाषा की वकालत की थी, यह हिंदी अनुवाद उस गंगा-जमुनी तहज़ीब और संस्कृति को संरक्षित करने का गंभीर उद्यम है। फिर भी कहीं-कहीं कुछ स्तरों पर अर्थ बहुलता सीमित जान पड़ती है। उर्दू के सांस्कृतिक मुहावरों का तोड़ ढूंढ़ना या समतुल्य खोज निकालना हिंदी अनुवाद में संभव नहीं हो पाया है; फिर भी यह हिंदी अनुवाद कुछ सीमाओं के साथ ‘सृजनात्मक पुनर्संरचना’ के स्तर को छूने में सक्षम है।
पुस्तक : अरसलान और बहज़ाद उपन्यासकार : ख़ालिद जावेद अनुवाद : इक़बाल हुसैन प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन नयी दिल्ली पृष्ठ : 304 मूल्य : रु. 399.

