स्त्री विमर्श पर एक नयी दृष्टि : The Dainik Tribune

स्त्री विमर्श पर एक नयी दृष्टि

पुस्तक समीक्षा

स्त्री विमर्श पर एक नयी दृष्टि

इंद्रजीत सिंह

प्रोफेसर प्रेम चौधरी द्वारा लिखित अंग्रेज़ी की बहुचर्चित पुस्तक ‘द वेल्ड विमन : शिफ्टिंग जेंडर इक्वेशंज़ इन रूरल हरियाणा’ का पहला संस्करण 1994 में और दूसरा संस्करण 2004 में आक्सफ़ोर्ड से प्रकाशित हुआ था। वैसे तो यह पुस्तक हरियाणा पर केंद्रित है लेकिन भारत व समूचे दक्षिण एशिया में एक शताब्दी से अधिक तक फैले काल खंड के दौरान महिलाओं की दशा में हो रहे परिवर्तनों के समग्र अध्ययन की दृष्टि से भी प्रासंगिक रही है। रमणीक मोहन के सराहनीय प्रयासों की बदौलत ‘द वेल्ड विमन’ का अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद होकर प्रकाशित होना सुखद व सार्थक है।

स्त्री और लैंगिक विमर्श के समकालीन विषयों के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक अंतर्संबंधों व अंतर्विरोधों की बारीकियों पर पैनी दृष्टि रखने के मामले में अकादमिक क्षेत्र में प्रोफेसर प्रेम चौधरी अनूठे हैं। आक्सफोर्ड द्वारा ही प्रकाशित 2007 में आई उनकी ‘कन्टैनशियस मैरिजिज़ एंड इलोपिंग कपल्ज़’ और 2011 में उनके आलेखों के संकलन के रूप में प्रकाशित उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘पोलिटिकल इकानॉमी आफ़ प्रोडक्शन एंड रीप्रोडक्शन’ को भी विशेष महत्व प्राप्त है। इन पुस्तकों के साथ ‘द वेल्ड विमन’ को मिलाकर असल में शास्त्रीय शोध ग्रंथों की संज्ञा दी जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। .

‘ग्रामीण हरियाणा में घूंघट प्रथा : बदलते स्वरूप–1880 से मौजूदा दौर तक’ पुस्तक मूल रूप में केवल घूंघट प्रथा के विषय पर ही केंद्रित नहीं है। आम महिला की जिंदगी के कड़वे-मीठे अनुभवों व पितृसत्ता की सीमाओं के प्रति एक तरह की स्वीकार्यता व उल्लंघन दोनों के अनवरत संघर्षों की न दिखने वाली पूरी जद्दोजहद इस घूंघट की ओट में भी बाकायदा जारी रहती है। इस जद्दोजहद की प्रकृति का सशक्त अवलोकन यह पुस्तक करवाती है। हरियाणा की महिलाओं ने अतीत में जो कठिन रास्ते हमवार किए हैं, उनको भविष्य के परिप्रेक्ष्य में देखने की जो नज़र चाहिए, वो नज़र ये पुस्तक प्रदान करती है।

हाल के ऐतिहासिक किसान आंदोलन में हरियाणा की हजारों महिलाओं की सक्रिय हिस्सेदारी पर गौर करें तो घूंघट के बावजूद प्रकट हुई सशक्त प्रतिरोध की क्षमता को निश्चित तौर पर प्रेम चौधरी की पुस्तक के निष्कर्षों का साकार रूप कहा जा सकता है। यह सर्वविदित है कि हरियाणा के समाज का एक उल्लेखनीय अंतर्विरोध इसके आर्थिक विकास के अपेक्षाकृत ऊंचे स्तर और सामाजिक पिछड़ेपन के बीच का फ़ासला है।

लोकप्रिय स्तर पर प्रचलित महिला विरोधी मानसिकता को मौखिक किस्सों, लोकोक्तियों, चुटकुलों, गीत-रागनियों आदि के माध्यम कैसे जारी रखा जाता है, उसके संदर्भ सहित उद्धरण जितने इस पुस्तक में हैं, वह हरियाणा में महिलाओं की स्थिति पर प्रकाशित किसी अन्य शोध में संभवत: नहीं मिलेंगे। इसके लिए लेखिका ने अन्य स्रोतों के अलावा निजी साक्षात्कारों द्वारा भी वस्तुगत जानकारियां जुटाई हैं।

प्रेम चौधरी मानती हैं कि स्वयं महिलाओं को भी संस्थागत रूप में अपने ढंग से पितृसत्ता के वाहक की भूमिका में ढाला जाता है। उनका मत है कि प्रचलित रीति-रिवाज और परंपराएं कृषि समाज की उन भौतिक जड़ों से निर्धारित होती हैं जिसे प्राय: समाजशास्त्री ‘किसान मनोवृत्ति’ की संज्ञा देते आए हैं। पुस्तक उन जड़ों को उकेरने का काम करती है जहां घरेलू हिंसा और महिला उत्पीड़न के मूल स्रोत मौजूद हैं।

पुस्तक : ग्रामीण हरियाणा में घूंघट प्रथा : बदलते स्वरूप – 1880 से मौजूदा दौर तक लेखिका : प्रेम चौधरी प्रकाशक : आकार प्रकाशन, दिल्ली पृष्ठ : 392 मूल्य : रु. 595.

रिश्तों की सुंदरता की अभिव्यक्ति

एन. खान

संसार के सबसे अनमोल रिश्ते ‘मां’ से हमारा संबंध माना जाता है, जिसे शब्दों में गढ़कर, भावनाओं के सांचे में ढाल कर बार-बार व्यक्त किया गया है। ‘तुम जिंदा हो मां’ भी मां के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति है। यह अजय सिंह राणा का काव्‍य संग्रह है, जिसमें मां को समर्पित कविताएं ध्‍यान खींचती हैं। यह संग्रह इसलिए भी खास कहा जा सकता है, क्‍योंकि मां को समर्पित इन कविताओं को किताब का रूप देना कवि का स्‍वप्न रहा है।

संग्रह की शुरुआत में ही यह स्‍पष्‍ट नजर आ जाता है कि इस संग्रह की कविताएं मां के प्रति प्रेम को शब्‍दों में ढालने का एक सुंदर प्रयास है। अपनत्‍व और भावनाओं से लबरेज एक के बाद एक कविताएं मन पर गहरा असर छोड़ती हैं। इन कविताओं में गहरे भाव हैं। जैसे ‘जब से तुम सोई हो मां, तभी से ही तो मैं जाग रहा हूं’ और ‘तुम जिंदा हो मां...’ ऐसी ही सुंदर कविताएं हैं, जो मां से गहरे रिश्तों की खूबसूरती बयान करती हैं।

साथ ही इस संग्रह की अन्‍य कविताएं भी मन को छू लेने में कामयाब नजर आती हैं और ध्यान आकर्षित करती हैं। ‘बारिश की बूंदों ने छुआ’ ऐसी ही सुंदर कविता है। इसमें कवि ने मां की याद को बारिश की बूंदों में महसूस करते हुए लिखा है, ‘आज बहुत दिनों बाद, बारिश की बूंदों ने छुआ, बहुत ही नजदीक से मुझे जैसे मां का आंचल।’

इसके अलावा मां के प्रति अपनी भावनाओं को कवि ने कभी जिंदगी की किताब के तौर पर पेश किया है, तो कहीं बचपन की यादों को मां की यादों के साथ संजोया है। वहीं जीवन के संघर्षों के अलावा इसकी जरूरतों को भी उन्‍होंने सुंदर शब्‍दों में ढाला है।

पुस्तक : तुम जिंदा हो मां कवि : अजय सिंह राणा प्रकाशक : सृष्टि प्रकाशन, चंडीगढ़ पृष्ठ : 101 मूल्य : रु. 135.

अहसासों की यात्रा की मंजूषा

सुशील कुमार फुल्ल

‘चांदी की डिब्बी’ सीमा गुप्ता का दूसरा काव्य संग्रह है, जिसमें 102 कविताएं संकलित की गई हैं। कविताएं वस्तुतः अनुभूतियों के स्पंदन को व्यक्त करती हैं, रागात्मक वृत्तियों का प्रस्फुटन काव्य के रूप में होता है। लेखिका ने स्वीकार किया है कि ‘कविताएं बन्द मन को खोलती हैं, अतीत, वर्तमान या भविष्य को देखना, टटोलना, मन का उड़ना, स्मृतियों का रोशन हो जगमगाना केवल कविताओं के माध्यम से संभव है। कविताएं मेरे लिए यात्राएं हैं, मेरे अपने सुख-दुख को समझने के लिए।’ कवयित्री की संवेदनशील अभिव्यक्ति उसके मन की ऊहापोह ही है, जो अंतर्मन की परतों को खोलती हुई साकार हो उठती है। एक तड़प है, छटपटाहट है, जिसे शब्दों में बांधने का भरसक प्रयत्न लेखिका ने किया है परन्तु फिर भी लगता है कि भाव छिटक कर दूर खड़े जा होते हैं और लेखिका देखती रह जाती है। संग्रह की छोटी कविताओं को पढ़ते हुए बराबर यह लगता है कि द्वंद्वात्मक विरोधाभास सिर चढ़ कर बोलता है।

हर कोई जीवन में कुछ न कुछ ढूंढ़ने में लगा है, जैसे कुछ खो गया हो। संग्रह की एक कविता है ‘लालटेन’, जो अपनी भाव-भंगिमा, प्रतीकात्मकता एवं अर्थ के श्लेष के कारण संभवतः संग्रह की एक बेहतरीन रचना है। सीमा गुप्ता भावनाओं की पारखी हैं, शब्दों की सांठ गांठ की नहीं। फिर भी जहां भावनाओं के आरोह-अवरोह की बात होती है, वहां अनुभूति की तीक्ष्णता अभिव्यंजना में सहायक होती है।

संग्रह में शताधिक कविताएं मोतियों की तरह बिखरी पड़ी हैं, जो पाठक को कभी विचार के स्तर पर और कभी वेदना के स्तर पर स्पन्दित करती हैं। भयावह है अग्नि, सहेज लेना चाहिए, खुशी, पानी, मेला, एक सपना आदि शीर्षक अपने आप इन कविताओं का कथ्य खोल देते हैं। पूरे काव्य संग्रह में सुख-दुख, अपने-पराए, अकेलेपन, कुछ खो जाने का अहसास बिखरा हुआ मिलता है। कवयित्री भावनाओं को संतुलित रूप से व्यक्त करने का प्रयत्न करती है परन्तु भावनाओं के वेग को भी कभी रोका जा सका है, और यही लेखिका की सब से बड़ी उपलब्धि भी है। ‘चांदी की डिब्बी’ कविता संग्रह में सोने के विचार बन्द हैं जो बाहर निकलने के लिए आतुर हैं।

पुस्तक : चांदी की डिब्बी लेखिका : सीमा गुप्ता प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर पृष्ठ : 168 मूल्य : रु. 200.

महिला खिलाड़ियों का दस्तावेज

केवल तिवारी

खेल राष्ट्रीय स्तर के हों या अंतर्राष्ट्रीय स्तर के, हरियाणा के खिलाड़ियों ने हर जगह परचम लहराया है। हरियाणा की छोरियों ने तो कमाल ही किया है। विषम परिस्थितियों में जीवन यापन करते हुए भी इन्होंने खेलों की दुनिया में अपनी मेहनत, जुनून और हौसले का सिक्का जमाया है। खेल के हर स्वरूप में इन महिलाओं ने हरियाणा और देश का नाम रोशन किया है। नाम रोशन का यह प्रकाश हमारी जानकारी से इतर भी है। यानी हम जितनों को खबरों या सीधे तौर पर जानते हैं, उससे भी कहीं अधिक लंबी हरियाणा की छोरियों की सूची है।

खेलों से संबंधित इस जानकारी के ‘डॉक्यूमेंटेशन’ का काम किया है डॉ. प्रदीप शर्मा स्नेही ने। वर्ष 2020 तक हरियाणा की इन महिला खिलाड़ियों की उपलब्धियों के दस्तावेजीकरण के दौरान लेखक ने एक-एक खिलाड़ी की उपलब्धियों को ‘सर्च इंजन’ की तरह पेश किया है। यानी आपको किसी खिलाड़ी के पदक, स्थान के बारे में जानना है तो आप संबंधित पेज पर जाएं और आपको सारा विवरण मिल जाएगा।

विभिन्न खेलों में नाम कमाने वाली महिला खिलाड़ियों के अलावा प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजी गई खिलाड़ियों का भी किताब में जिक्र है। सरल भाषा में महिला खिलाड़ियों का दस्तावेज निश्चित रूप से सराहनीय है। डॉ. स्नेही ने गागर में सागर सरीखा काम किया है।

पुस्तक : देश का गौरव हरियाणवी महिला खिलाड़ी लेखक : डॉ. प्रदीप शर्मा स्नेही प्रकाशक : हरियाणा ग्रंथ अकादमी, पंचकूला पृष्ठ : 247 मूल्य : रु. 240.

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