जीवन की राह में अनेक किंतु-परंतुओं से गुजरते हुए इंसानी कदम जब अंततः वास्तविक सुख को समझ लेते हैं, तो शायद पारिवारिक क्लेश में भी कमी आ जाती है। लेकिन अनेक बार प्यार-मनुहार से इतर मनमुटाव और छोटी-छोटी बातें बड़ी बनने लगती हैं या बना दी जाती हैं। ऐसे में स्थिति विकट हो जाती है। हालांकि, सुखांत को देखना, सुनना और पसंद करना हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति है। अंततः बात फिर ‘अंत भला तो सब भला’ पर आ टिकती है, जो सुकून देने वाली होती है।
जीवन के इन्हीं उतार-चढ़ावों और पारिवारिक पृष्ठभूमि पर बुना गया है उपन्यास ‘झीणा घूंघट’। इसकी लेखिका हैं डॉ. अंजु दुआ जैमिनी। यह उनके इसी शृंखला के पहले उपन्यास ‘बोरला कुंदन का’ की कहानी को आगे बढ़ाता है। यह दो स्त्रियों के बीच तालमेल स्थापित करने के प्रयास की गाथा है।
असल में, हम अपने आसपास के जीवन में भी देखते हैं कि घर को जोड़ने का श्रेय भी अक्सर स्त्री को ही दिया जाता है और घर टूटने की तोहमत भी उसी के सिर मढ़ दी जाती है। ‘जनरेशन गैप’ के मुद्दे और दंभ को थोड़ा पीछे छोड़कर यदि हम पारिवारिक मूल्यों पर गंभीरता से विचार करें तथा अपने व्यवहार और कर्म में सकारात्मक बदलाव लाएं, तो पारिवारिक माहौल उत्सव जैसा हो सकता है। हालांकि, यह कहना जितना आसान है, व्यवहार में उतारना उतना ही कठिन है। फिर भी, यह असंभव नहीं है।
सुषमा, सांची और प्रीति के बीच संवादों, मुलाकातों और बदलते हालात की कथात्मक यात्रा से गुजरते हुए इस उपन्यास की कहानी पाठक को अपने ही आसपास के किरदारों में दिखाई देने लगती है। मूलतः पूरी कथा इन्हीं पात्रों के इर्द-गिर्द घूमती है। राजस्थान के परिवेश से लेकर हरियाणवी माहौल तक फैला इसका कथानक अंततः पूरे समाज की पारिवारिक संवेदनाओं और रिश्तों की बात करता है।
पुस्तक : झीणा घूंघट लेखिका : डॉ. अंजु दुआ जैमिनी प्रकाशक : अयन प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ : 107 मूल्य : रु. 320.

